सूर्य देवता को अर्ध्य क्यों दिया जाता है

सूर्य देवता को अर्ध्य

सूर्य देवता को अर्ध्य सबको देना चाहिए। बड़ा कौन? बड़ा वह है जो धर्म की मर्यादा को तनिक भी भंग नहीं करता। बहुत से पढ़े-लिखे लोग सुबह सूर्यनारायण के सम्मुख खटिया में पड़े रहते हैं, सूर्योदय होने के उपरान्त भी खटिया छोड़ते नहीं। सूर्यनारायण के सम्मुख खटिया में लेटने के समान कोई पाप नहीं।

सूर्यनारायण तुम्हारे घर आयें और तुम्हारा स्नान भी न हो, इसके समान क्या पाप हो सकता है? सूर्यनारायण के उगने से पहले स्नान करो।

रामायण में लिखा है कि रामजी महाराज सूर्य उगने से पहले स्नान करते थे। भगवान् श्रीकृष्ण सूर्य उगने से पहले स्नान तथा सूर्यनारायण को अर्घ्य देते थे।

यह लाइट तुम जलाते हो, सरकार तुम्हारे पास उसका बिल भेजती है। अमुक दिनों की मोहलत देती है, उतने ही समय में बिल भर देना पड़ता है, नहीं तो पीछे दण्ड होता है। आज तक सूर्यनारायण ने किसी के घर बिल भेजा हो, ऐसा सुना नहीं।

सूर्यनारायण के प्रकाश का तुम उपयोग करते हो, बदले में तुम सूर्यनारायण को क्या देते हो? दीपावली में तुम छुट्टी लेते हो, परन्तु दीपावली के दो चार दिन सूर्यनारायण छुट्टी ले लें तो तुम्हारी दीपावली कैसी हो? सूर्यनारायण कोई दिवस छुट्टी लेते नहीं। वे नित्यप्रति प्रकाश देते हैं। तुम्हारे पास में सूर्यनारायण और कुछ नहीं माँगते। केवल एक अपेक्षा रखते हैं कि मानव सूर्य उगने से पूर्व स्नान कर लें।

किसी-किसी को बहुत ऊँचा ओहदा (पद) मिल जाय तो उसको ऐसा लगता है कि मैं बहुत बड़ा साहब हूँ, मुझसे कौन पूछनेवाला है? भगवान् कहते हैं, तू ऊपर आ। पीछे तुझको बतलाता हूँ। क्या मैने तुझे इसलिए धन- मान पदवी दी है कि तू मेरी धर्म की मर्यादा को भंग करे?

कुछ लोग भक्ति का बहाना करते हैं कि मैं भक्ति करता हूँ, मैं चाहूँ जब उठू तो कोई बाधा नहीं। क्या भक्ति ऐसे की जाती है? भक्ति का बहाना करके धर्म छोड़े, धर्म की मर्यादा को भंग करे, उसकी भक्ति भगवान् को सहन नहीं होती। भक्ति का बहाना करके जो स्वेच्छाचारी जीवन जीता है, धर्म को एक तरफ उठाकर रख देता है, वह ईश्वर को जरा भी सुहाता नहीं ।

अपना सनातन धर्म अतिशय श्रेष्ठ है। अपनी धर्म की मर्यादा छोड़ो नहीं, रात को देर तक जागो नहीं। दस-साढ़े दस बजे सो जाओ।

रात ग्यारह बजे के बाद जागते मत रहो और प्रातः काल चार-साढ़े चार बजे के बाद सोओ नहीं। कुछ लोग तो रात्रि के ऐसे राजा होते हैं कि ये रात्रि के बारह एक बजे तक गप्प न मारें तो इनको नींद ही न आवे। पीछे सुबह छः-सात बजे उठते हैं।

रामायण हमको राक्षसों का लक्षण बताती है। एक लक्षण यह है कि राक्षस लोग रात साढ़े दस बजे के बाद जागते और सुबह चार बजे के बाद शय्या पर सोते पड़े रहते हैं। इस स्थान पर कोई राक्षस हो, ऐसा मत समझो, तुम तो सब ऋषियों की तरह हो। अरे, राक्षसों के क्या कोई दो-चार सींग होते हैं? रामायण के बताये हुए लक्षण जिनमें हों, वे सब राक्षस हैं।

सूर्यनारायण प्रत्यक्ष परमात्मा हैं। अन्य बहुत से देवता प्रत्यक्ष दर्शन नहीं देते, परन्तु सूर्यनारायण प्रत्यक्ष दर्शन देते हैं। दूसरे बहुत से देवता भावना से दिखाई पड़ पाते हैं। ‘यह गणपति है’ ‘यह हनुमानजी हैं’ अपने को ऐसी भावना रखनी पड़ती है। भावना न हो तो केवल मूर्ति दिखाई पड़ती है, परन्तु सूर्यनारायण में भावना करने की जरूरत नहीं पड़ती।

तुम नित्य- प्रति सूर्य उगने से पहले स्नान करो, तुम्हारा कल्याण होगा। तुम्हारे ऊपर सूर्यनारायण की कृपा उतरेगी। सूर्यनारायण बुद्धि शुद्ध करते हैं। सूर्यनारायण आरोग्य प्रदान करते हैं। हमें निरोग बनाते है।

अपने भारत में पहले इतना अधिक रोग नहीं था, आजकल रोगों की संख्या बहुत बढ़ गई है, दवाखाने में जहाँ देखो, वहाँ बहुत भीड़ दिखाई देती है। पहले भारत के लोग सूर्यनारायण की उपासना करते थे। लोगों में संयम था।

आज तो भोगों का साधन बढ़ गया है, विकार-वासनाएँ बढ़ गयी हैं। जीवन बहुत विलासी हो गया है। जीवन में संयम रहा नहीं, सदाचार रहा नहीं, सूर्य नारायण की उपासना रही नहीं, इससे रोग बढ़ गये हैं।

श्रीरामचद्रजी सूर्यवंश में प्रकट हुए हैं। सूर्यनारायण तन-मन और बुद्धि तीनों को सुधारते हैं। सूर्य उगने से पहले स्नान करो, सूर्यनारायण को अर्घ्य दो। तुमको दूसरा कोई मन्त्र न आता हो तो ऐसा बोलो –

सूर्य देवता को अर्ध्य देते समय इस मन्त्र का उच्चारण करें

श्रीसूर्यनारायणाय नमः।

सूर्य को अर्ध्य क्यों दिया जाता है, इसका कारण सुनो।

मन्देह नाम के महापराक्रमी तीस करोड़ राक्षस हैं। वे सूर्य को खा जाना चाहते हैं।

ऐसी परिस्थिति में, सम्पूर्ण ऋषि-मुनिगण भगवती महासंध्या की उपासना करते हैं, साथ ही अंजलि में जल भरकर उसे छोड़ते हैं। वही

जल वज्र के समान हो जाता है, जिससे वे दैत्य भस्म हो जाते हैं। इसीलिए द्विज संध्योपासना करते हैं।

यह संध्योपासन क्रिया महापुण्य की जननी है। नारद! अर्घ्यदान का यह मंत्र कहा गया है, इसके उच्चारण मात्र से सांगोपांग संध्या का फल प्राप्त हो सकता है।

‘वह सूर्य मैं ही हूं। मैं ही आत्मज्योति हूं। मैं ही शिव-सम्बन्धी ज्योति हूं। मैं सर्वशुक्र ज्योति हूं। मैं रसस्वरूप हूं। वरदायिनी भगवती गायत्री ! तुम ब्रह्मस्वरूपिणी हो। मेरे इस जपमय अनुष्ठान को सिद्ध करने के लिए तुम यहां पधार कर मेरे हृदय में प्रवेश करो। देवी! उठो तथा इस अर्घ्य के जल में पधारने की कृपा करो। देवी! पुनः मुझे दर्शन देना ।’

इस तरह अर्ध्य देकर पवित्र स्थान में विद्वान पुरुष अपना आसन लगावे। उस पर बैठकर वेदमाता गायत्री का जप करे। मुने! यही प्राणायाम के बाद खेचरी मुद्रा करने का विधान है।

मुनिवर ! प्रातः काल की संध्या के समय इस मुद्रा की ज़रूरत होती है। नारद! इसके नाम की व्याख्या करता हूं। जिसके प्रभाव से चित्त तथा जिह्वा आकाश में जाकर विचरण करते हैं, उसका नाम ‘खेचरी’ है। साथ ही, जिसकी प्रेरणा से दृष्टि दोनों भौहों के अन्तर्गत रहती है, वही मुद्रा खेचरी है।

नारद! सिद्धासन के समान न कोई आसन है, कुम्भक वायु के समान न कोई वायु है तथा खेचरी मुद्रा के समान न कोई मुद्रा है इसे ध्रुव सत्य समझना चाहिए। वायु को रोककर घण्टाध्वनि के समान प्लुत स्वर से प्रणव का उच्चारण करे। उस समय अहंकार तथा ममता को हृदय से निकालकर स्थिर भाव से आसन पर बैठे रहना चाहिए।

सिद्धासन के किसे कहते है

मुनिवर नारद! अब सिद्धासन का लक्षण कहता हूं, सुनो। एक पैर का मूल लिंग के मूल पर तथा दूसरे पैर का मूल अण्डकोश के नीचे दृढ़ स्थिर रहे और हृदय आदि शरीर दण्ड की भांति सीधे हों। इसी को सिद्धासन कहते हैं।

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