घोर कलियुग के लक्षण

घोर कलियुग के लक्षण

घोर कलियुग के लक्षण

घोर कलियुग के लक्षण

वेदों के सार रूप ग्रंथराज श्रीमद् भागवत में प्रथम स्कन्ध के प्रथम अध्याय में पहले ही प्रश्न के रूप में नैमिषारण्य में एकत्रित ऋषि-मुनि श्रील सूत गोस्वामी से कलियुग की पतित जीवात्माओं एवं उनके लक्षणों के विषय में चिंतित होकर जिज्ञासा करते हैं और पूछते हैं कि उन्होंने (श्रील सूत गोस्वामी ने) इन जीवों के कल्याण के लिए क्या निर्णय किया है?

प्रायेणाल्पायुषः सभ्य कलावस्मिन् युगे जनाः । मन्दा: सुमन्दमतयो मन्दभाग्या ह्युपद्रुताः ।।

(श्रीमद् भागवतम् 14.100)

हे विद्वान, कलि के इस लौह युग में लोगों की आयु न्यून है। वे झगड़ालू, आलसी, पथभ्रष्ट, अभागे होते हैं तथा साथ ही साथ सदैव विचलित रहते हैं।इस श्लोक के तात्पर्य में श्रील प्रभुपाद कहते हैं कि, ‘भगवद्भक्त सामान्य जनों की आध्यात्मिक उन्नति के लिए सदैव चिन्तित रहते हैं।

जब नैमिषारण्य के मुनियों ने इस कलियुग के लोगों की अवस्था का विश्लेषण किया, तो उन्होंने देखा कि इन लोगों की आयु कम होगी। कलियुग में आयु कम होने का कारण अपर्याप्त आहार नहीं, अपितु अनियमित आदतें हैं।

आदतों को नियमित करके तथा सादा भोजन करके कोई भी व्यक्ति अपना स्वास्थ्य बनाये रख सकता है। अधिक भोजन करना, अधिक इन्द्रियतृप्ति, दूसरों की दया पर अत्यधिक आश्रित रहना एवं रहन-सहन के कृत्रिम मानक मनुष्य की प्राणशक्ति तक को चूस लेते हैं।

फलस्वरूप जीवन की अवधि घट जाती है। इस युग के लोग न केवल भौतिक दृष्टि से, अपितु आत्म-साक्षात्कार के विषय में भी अत्यन्त आलसी हैं। यह मनुष्य जीवन विशेष रूप से आत्म-साक्षात्कार के लिए मिला है।

अर्थात् मनुष्य को जानना चाहिए कि मैं क्या हूँ, संसार क्या है और परम सत्य क्या है? मनुष्य जीवन वह साधन है, जिससे जीव इस भौतिक जगत में कठिन जीवन संघर्ष के कष्टों को मिटा सकता है और अपने सनातन घर, भगवद्धाम को लौट सकता है।

किन्तु भ्रष्ट शिक्षा पद्धति के कारण लोगों में आत्म-साक्षात्कार की इच्छा ही नहीं उठती। यदि वे इस विषय में जानते भी हैं, तो दुर्भाग्यवश वे पथभ्रष्ट शिक्षकों के शिकार बन जाते हैं।

इस युग में लोग न केवल विभिन्न राजनीतिक वर्गों तथा दलों के शिकार हैं, अपितु विभिन्न प्रकार के इन्द्रियतृप्ति करने वाले विपथों से भी ग्रस्त हैं, जैसे कि सिनेमा, खेलकूद, जुआ, क्लब, संसारी पुस्तकालय, बुरी संगति, धूम्रपान, मदिरा-पान, छलावा, चोरी, मनमुटाव आदि-आदि।

अनेकानेक व्यस्तताओं के कारण उनके मन सदैव विचलित एवं चिन्ताओं से ग्रस्त रहते हैं। इस युग में अनेक धूर्त लोग अपने-अपने धार्मिक पंथ खड़े कर देते हैं, जो प्रामाणिक शास्त्रों पर आधारित नहीं होते और प्रायः ऐसे लोग ही, जो इन्द्रियतृप्ति के व्यसनी हैं, ऐसी संस्थाओं के प्रति आकृष्ट होते रहते हैं।

फलस्वरूप धर्म के नाम पर अनेक पापकर्म किये जाते हैं, जिसके कारण लोगों को न तो मानसिक शान्ति मिल पाती है, न स्वास्थ्य-लाभ हो पाता है। अब छात्र ब्रह्मचर्य का पालन नहीं करते और गृहस्थ लोग गृहस्थाश्रम के विधि-विधानों का पालन नहीं करते।

फलस्वरूप, तथाकथित वानप्रस्थ तथा संन्यासी जो ऐसे गृहस्थाश्रमों से आते हैं, अपने कठोर पथ से सरलता से विचलित हो जाते हैं। कलियुग में सारा परिवेश श्रद्धाविहीनता से पूर्ण है। लोग अब आध्यात्मिक मूल्यों में रुचि नहीं दिखाते।

अब तो भौतिक इन्द्रियतृप्ति ही सभ्यता का मानदण्ड बनी हुई है। ऐसी भौतिक सभ्यता को बनाये रखने के लिए मनुष्य ने जटिल प्रकार के राष्ट्रों तथा समुदायों का निर्माण किया है और विभिन्न गुटों में निरन्तर प्रत्यक्ष तथा शीत युद्ध की आशंका बनी रहती है।

अतएव आज के मानव समाज के विकृत मानदण्डों के कारण आध्यात्मिक स्तर को उठा पाना अत्यन्त कठिन हो गया है। नैमिषारण्य के ऋषिमुनि पतितात्माओं को मुक्त करने के लिए उत्सुक हैं, अतएव वे श्रील सूत गोस्वामी से उपचार पूछ रहे हैं।”

इसी प्रकार राजा परीक्षित द्वारा जिज्ञासा करने पर श्रील शुकदेव गोस्वामी कलियुग के लक्षणों का श्रीमद् भागवत के स्कन्ध 12 के अध्याय 2 में वर्णन करते हैं:

ततश्चानुदिनं धर्मः सत्यं शौचं क्षमा दया । कालेन बलिना राजन्न क्ष्यत्यायुर्बलं स्मृतिः ॥

(श्रीमद् भागवतम् 1221)

शुकदेव गोस्वामी ने कहा: हे राजा, तब कलियुग के प्रबल प्रभाव से धर्म, सत्य, पवित्रता, क्षमा, दया, आयु, शारीरिक बल तथा स्मरणशक्ति दिन प्रतिदिन घटते जायेंगे।

इसी अध्याय में श्रील शुकदेव गोस्वामी आगे वर्णन करते हैं, कलियुग में एकमात्र सम्पत्ति को ही मनुष्य के उत्तम जन्म, उचित व्यवहार तथा सद्गुणों का लक्षण माना जायेगा। विधि-विधान तथा न्याय तो मनुष्य के बल के अनुसार ही लागू होंगे।

पुरुष तथा स्त्रियाँ केवल ऊपरी आकर्षण के कारण एक साथ रहेंगे और व्यापार की सफलता कपट पर निर्भर करेगी। पुरुषत्व तथा स्त्रीत्व का निर्णय काम में उनकी निपुणता के अनुसार किया जायेगा और ब्राह्मणत्व जनेऊ पहनने पर निर्भर करेगा।

मनुष्य का आध्यात्मिक पद मात्र बाह्य प्रतीकों से सुनिश्चित होगा और इसी आधार पर लोग एक आश्रम छोड़ कर दूसरे आश्रम को स्वीकार करेंगे। यदि किसी की जीविका उत्तम नहीं है, तो उस व्यक्ति के औचित्य में सन्देह किया जायेगा और जो चिकनी-चुपड़ी बातें बनाने में चतुर होगा वह विद्वान पंडित माना जायेगा।

यदि किसी व्यक्ति के पास धन नहीं है, तो वह अपवित्र माना जायेगा और दिखावे को गुण मान लिया जायेगा। विवाह मौखिक स्वीकृति के द्वारा व्यवस्थित होगा और कोई भी व्यक्ति अपने को जनता के बीच आने के लिए योग्य समझेगा यदि उसने केवल स्नान कर लिया हो।

तीर्थस्थान को दूरस्थ जलाशय और सौन्दर्य को मनुष्य की केश-सज्जा पर आश्रित, माना जायेगा। उदरभरण जीवन का लक्ष्य बन जायेगा और जो जितना ढीठ होगा उसे उतना ही सत्यवादी मान लिया जायेगा। जो व्यक्ति परिवार का पालन-पोषण कर सकता है, वह दक्ष समझा जायेगा।

धर्म का अनुसरण मात्र यश के लिए किया जायेगा। इस तरह ज्यों-ज्यों पृथ्वी भ्रष्ट जनता से भरती जायेगी, त्यों-त्यों समस्त वर्णों में से जो अपने को सबसे बलवान दिखला सकेगा वह राजनैतिक शक्ति प्राप्त करेगा।

जनता ऐसे लोभी तथा निष्ठुर शासकों द्वारा, जिनका आचरण सामान्य चोरों जैसा होगा, अपनी पत्नियाँ तथा सम्पत्ति छीन लिये जाने पर, पर्वतों तथा जंगलों में भाग जायेगी। अकाल तथा अत्यधिक कर से सताये हुए लोग पत्तियाँ, जड़ें, मांस, जंगली शहद, फल, फूल तथा बीज खाने के लिए बाध्य होंगे। सूखे से पीडित होकर वे पूर्णतया विनष्ट हो जायेंगे।

जनता को शीत, वात, तपन, वर्षा तथा हिम से अत्यधिक कष्ट उठाना पड़ेगा। लोग आपसी झगड़ों, भूख, प्यास, रोग तथा अत्यधिक चिन्ता से भी पीडित होते रहेंगे। कलियुग में मनुष्यों की अधिकतम आयु पचास वर्ष हो जायेगी।

कलियुग समाप्त होने तक सभी प्राणियों के शरीर आकार में अत्यन्त छोटे हो जायेंगे और वर्णाश्रम मानने वालों के धार्मिक सिद्धान्त विनष्ट हो जायेंगे। मानव समाज वेदपथ को पूरी तरह भूल जायेगा और तथाकथित धर्म प्रायः नास्तिक होगा। राजा प्रायः चोर हो जायेंगे, लोगों की वृत्ति चोरी करना, झूठ बोलना तथा व्यर्थ हिंसा करना हो जायेगा।

और सारे सामाजिक वर्ण शूद्रों के स्तर तक नीचे गिर जायेंगे। गौवें बकरियों जैसी हॉगी; आश्रम संसारी घरों से भिन्न नहीं होंगे तथा पारिवारिक सम्बन्ध तात्कालिक विवाह बंधन से आगे नहीं जायेंगे।

अधिकांश वृक्ष तथा जड़ी-बूटियाँ छोटी हॉगी और सारे वृक्ष बौने शमी वृक्षों जैसे प्रतीत होंगे। बादल बिजली से भरे होंगे: घर पवित्रता से रहित तथा सारे मनुष्य गधों जैसे हो जायेंगे। उस समय भगवान् पृथ्वी पर प्रकट होंगे। वे शुद्ध सतोगुण की शक्ति से कर्म करते हुए शाश्वत धर्म की रक्षा करेंगे। (श्रीमद् भागवतम् 12.2.2-16)

सारांश

उपरोक्त वर्णन से स्पष्ट है कि हमारे ऋषि-मुनि कलियुग में होने वाली हमारी दुर्दशा का उसी समय अनुमान लगा चुके थे। उनके द्वारा बताए गए कलियुग के सभी लक्षण जैसे हमारा अल्पायु, मंदमति, उद्विग्न व व्यग्र होना, कितने सटीक थे, यह हमें वर्तमान में हमारी अवस्था से सरलता से पता चल जाता है।

ऋषि-मुनियों को ज्ञात था कि कलियुग के मनुष्य भगवद्भक्ति तो दूर, धर्म का पालन भी नहीं करना चाहेंगे। वे तो सामाजिक प्रतिष्ठा एवं धन अर्जन में ही अपना जीवन व्यतीत कर देंगे।

चूंकि ऋषि-मुनि जनकल्याण को अपना परम कर्तव्य मानते हैं एवं उनका जीवन परोपकार के लिए ही होता है, अतः उन्होंने हमारे कल्याण के लिए जो निर्णय किया था उसका वर्णन हम अगले अध्याय में कर रहे हैं।

प्रश्नोत्तर

प्रश्न: आपने उपरोक्त अध्याय में कहा कि मनुष्य इंद्रियतृप्ति में संलग्न रहेंगे और वही उनकी पीड़ा का कारण है। परंतु कभी-कभी ऐसा प्रतीत होता है कि हमारे जीवन में कोई कष्ट है ही नहीं वरन् इंद्रियतृप्ति द्वारा जीवन का आनंद उठाने में बुराई ही क्या है?

उत्तर: भौतिक इंद्रियतृप्ति हमें सुख न देते हुए हमारे दुख का कारण बनती है। हो सकता है यह हमें क्षणिक सुख दे परंतु बाद में हमारे कष्ट का कारण बनती है।

जैसे गुटखा खाना क्षणिक भौतिक सुख प्रदान करता है परंतु कालांतर में मुंह में कैंसर उत्पन्न करता है एवं यकृत (स्पअमत) और किडनी को नष्ट करता है। तो क्या यह हुआ? यही कलियुग है। वैसे ही अवैध संबंध, मांस भक्षण, जुआ खेलना और नशा करना क्षणिक सुख देते हैं परंतु वास्तव में यही कलियुग की पीड़ाएँ हैं।

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