माँ आनन्देश्वरी धाम

माँ का प्राकट्य
माँ की महिमा
आरतियाँ
दुर्गा स्तुति

जय जय माँ आनन्देश्वरी धाम

माँ आनन्देश्वरी धाम

माँ आनन्देश्वरी धाम की जय हो

माँ का प्राकट्य

सच्ची ज्योत रीझती ना झूठ ना पाखंड से,प्रेम से बुलाओ ना पुकारे रे घमंड से ।
इसे सरोकार नहीं जोर नहीं शोर से,यह तो बंध जाती है रे आस्था की डोर से ।

जयकारा शेरावाली दा बोल साँचे दरबार की जय

माँ की महिमा तो जितनी गाए उतनी कम है हममें इतनी शक्ति नहीं की हम उसकी लीला का गायन कर सके। माता रानी क्र प्राकट्य के बारे में जो भी यहाँ बताया जा रहा है यह सब उसकी शक्ति द्वारा ही जो असल में हुआ है वही लीला के बारे में बताया गया है क्यूंकि हममे इतनी शक्ति नहीं खुद से कुछ लिखें और बोले हमारे तो स्वांस भी अपने नहीं हमारा शरीर अपना नहीं तो हम फिर किसकी शक्ति से बोलते है ? किसकी शक्ति से लिखते है ? किसकी शक्ति से चलते है ?

उस आदि शक्ति की शक्ति से हम बोलते चलते और लिखते है वो शक्ति जो हम सब में विध्य्मान है 

माँ के नवरात्रे 4 अक्तूबर 2005 को माँ के नवरात्रे शुरू हुए। दरबार में पहली बार अखंड ज्योत जगाई गई। माँ की ज्योत जगाई थी तो माँ का कीर्तन भी होता था।
रोजाना 3 से 5 बजे तक दोपहर को माँ का आनंद से भरपूर माँ के नवरात्रे 4 अक्तूबर 2005 को माँ के नवरात्रे शुरू हुए। दरबार में पहली बार अखंड ज्योत जगाई गई। माँ की ज्योत जगाई थी तो माँ का कीर्तन भी होता था। होता था। इतना आनंद आता की सभी माँ के रंग में रंग जाते थे कई सांगतो को तो  माँ ने अपने होने का एहसास भी दिला दिया था की में तो यही पर विराजमान हूँ- आदि शक्ति जो है – एहसास तो दिलाना ही था । वाह जी वाह ! क्या अदभुत नजारा था जो कभी देखा न था कभी सुना न था 


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