अट्ठाईसवाँ अध्याय माघ महात्म्य

अट्ठाईसवाँ अध्याय माघ महात्म्य

सारस ने कहा वानर ! तेरा प्रश्न न्याय संगत है। जिस कर्म के कारण मुझे यह कष्टदायी पक्षी की योनि प्राप्त हुई है, उस रहस्य को सुन ।

पूर्व जन्म में तूने सूर्य ग्रहण के समय सौखारी अन्नदान किया और नर्मदा के तट पर बसे ब्राह्मणों को देने के लिए मुझसे कहा था।

मैंने उसमें से लोभवश बहुत सा अन्न स्वयं रखकर थोड़ा सा अन्न ब्राह्मणों को बांट दिया था। इस प्रकार उन ब्राह्मणों का अन्न हरण करने के कारण मुझे पहले कालसूत्र नरक को भोगना पड़ा था।

वहाँ रुधिर और पीव के सरोवर में उल्टा करके यमदूतों ने मुझे बहुत समय तक लटकाये रखा। भयानक कौवों और गीधों ने चोंचों के प्रहार से मुझे क्षत-विक्षित कर दिया। कीड़े खाने लगे।

इस प्रकार के भयानक कष्टों को तीस हजार वर्ष तक झेलने के बाद में मुझे यह पक्षी योनि प्राप्त हुई। जो कष्ट मैंने नरक में भोगे हैं,

उनकी कल्पना मात्र से अब भी मैं सिहर उठता हूँ। दैव कृपा से मुझे नरक से छुटकारा मिला हैं और सारस बना हूँ। यह योनि मुझे इस कारण भुगतनी पड़ रही है कि मैंने एक बार पूर्व जन्म में ही बहन के घर से कांस्य पात्र चुराकर एक जुवारी को दे दिया था।

यह मेरी मादा जो इस समय सारसी है, पूर्व जन्म में एक ब्राह्मणी थी। इसने भी कांस्य पात्र की चोरी की थी, इसी कारण इसे सारसी बनना पड़ा है। हे वानर!

अब तक मैंने तुमको भूतकाल का सारा वृतान्त सुनाया है, अब भविष्य का हाल सुनो। इस जन्म के बाद में, यह सारसी और तुम हंस योनि को प्राप्त होंगे।

उस योनि को पूर्ण करने के पश्चात् ही हम सभी को महा दुर्लभ मानव योनि प्राप्त होगी। धर्म और अधर्म का फल सभी जीवों को अपने-अपने कर्मों के अनुसार भोगना ही पड़ता है।

सभी को बारम्बार इसी प्रकार के चक्कर में पड़ना होता है। केवल विस्मत, योगी, वेदज्ञ ही इस कंटक भरे मार्ग को सकुशल पार कर सकने में समर्थ हैं, दूसरा नहीं। भगवान सदाशिव हर प्राणी के छोटे बड़े पुण्य पाप का विचार करने के उपरान्त शुभ एवं अशुभ फल देते रहते हैं।

जो बुद्धिमान होते हैं, वे उनको विधाता के न्याय को जानकर सन्तोष करते हैं। कोई भी प्राणी उपाय एवं बुद्धि के द्वारा अपने कर्मों के फल में कोई अदल-बदल नहीं कर सकता है।

तुम स्वयं अपने को ही देखो, पहले राजा थे, फिर नरक भोगा, अब वानर हो, आगे हंस और फिर मनुष्य बनोगे। शोक करने से कुछ नहीं होता । प्राणी को काल की प्रतीक्षा ही करनी चाहिये ।

मैं यह सब ज्ञान होते हुए भी धैर्यपूर्वक प्रभु की माया के वशीभूत हुआ । सारसी के साथ इस वन में रहता हुआ, काल की प्रतीक्षा कर रहा हूँ। तुम भी वही करो। वानर बोला- हे ज्ञानी! तुम्हारे कर्म उत्तम हैं, जो तुम्हें पूर्व जन्म की स्मृतियां शेष हैं और भविष्य को जानते हो ।

बारम्बार तुमको नमस्कार करता हूँ । तुम्हारे कथन के द्वारा मेरा अज्ञान नष्ट हो गया है। तुम भी कल्याणपूर्वक इस वन में सारसी के साथ निवास करो। प्रेत ने कहा- हे विप्र !

सारस के इन्हीं वचनों को मैंने नदी के तट पर सुना था। उसके वचनों को सुनकर, मुझमें ज्ञान उपजा है और मेरे शोक का नाश हुआ है।

श्री गंगाजी के पवित्र जल का आश्चर्यजनक महात्म्य जान कर ही मैं आपसे उनकी याचना करता हूँ। मैंने इसी पर्वत पर श्री गंगा जी के पवित्र जल का आश्चर्यजनक चमत्कार देखा है।

मैं जानता हूँ कि इस पवित्र जल के पीने से अवश्य ही मैं इस प्रेत योनि से मुक्त हो सकूँगा । ऐसे समय में परियात्रा में उत्पन्न हुये किसी ग्राम योजक ब्राह्मण ने इसी विन्ध्याचल पर एक अयोग्य ५ से यज्ञ कराया था।

फल स्वरूप वह ब्राह्मण राक्षस हुआ। हमारे साथ उस ब्राह्मण ने उस राक्षस योनि में आठ वर्ष व्यतीत किये थे। उस ब्राह्मण के पुत्र ने एक बार अपने पिता की अस्थियां लेकर उन्हें कनखल क्षेत्र जाकर श्री गंगा जी में विसर्जन किया,

उसी क्षण उस ब्रह्म राक्षस की मुक्ति हो गई थी । इस घटना को स्वयं अपनी आँखों से देखकर ही मेरी श्रद्धा गंगाजी पर है। हे विप्र! अब आप दयाकर मुझे गंगाजल देने की कृपा करें, जिससे मेरी मुक्ति हो ।

प्रेत की बातों को सुनकर वह पथिक विचार करने लगा कि संसार में समस्त जीव निसंदेह अपने पाप, पुण्य के फलों का उपभोग करते हैं।

किसी रूप में सभी योनियों में रहते हुये जीव को अपने किये का फल अवश्य ही भोगना पड़ता है। वे जीव धन्य है, जो इस कर्म में न्यायपूर्वक धन को संचय करके उसे दूसरों को दान करते हैं ।

दान ही के प्रभाव से प्राणियों को इस संसार में समस्त भोग पदार्थ प्राप्त होते हैं। प्रेत ने कहा- हे विप्र! मैं गंगाजल के लिए विकल हूँ।

आप अधिक देर न करें और शीघ्र ही मुझे गंगाजल का दान दें ताकि मैं प्रेत योनि से मुक्त हो सकूँ। तब पथिक बोला- हे प्रेत! भृगुक्षेत्र में मेरे माता-पिता रह रहे हैं, मैं उन्हीं के लिए त्रिवेणी के पवित्र जल को लाया था।

मार्ग ही में तुम इस जल की याचना कर रहे हो, मैं इस समय इसी धर्म संकट में विचार नहीं कर पा रहा हूँ कि मुझे क्या करना चाहिये? परन्तु मैं वेद शास्त्रानुसार यज्ञों को इतना नहीं मानता, जितना प्राण रक्षा को मानता हूँ।

मैंने विचार किया कि यह जल तुम्हारी रक्षा के लिए दे दूँ और माता-पिता के लिए और जल ले आऊँगा । ऋषि जनों का कथन है कि परोपकार से बड़ा कोई धर्म नहीं है ।

इतना कहकर उस ब्राह्मण ने उस प्रेत को त्रिवेणी का जल दे दिया। प्रेत ने श्रद्धापूर्वक जल का पान किया। उस जल के प्रभाव से तुरन्त प्रेत योनि से मुक्त होकर दिव्य देह को ही प्राप्त हो गया।

तब उसनेकहा- हे पथिक! श्री गंगा जी के महात्म्य का वर्णन कौन कर सकता है? शिव ने गंगा की पवित्रता समझ उसे अपने मस्तक पर धारण किया है। जो गंगाजल को पान करता है, वह मोक्ष को पाता है।

गंगाजल के समान कोई नहीं है। हे पन्थि! भगवान तुम्हारी आयु दीर्घ करें और तुम सदा धर्म में ही तत्पर रहो। हे साधो ! तुमने मुझ पर दया करके गंगा का पवित्र जल दान करके उबार दिया है।

भगवान सब प्रकार तुम्हारा मंगल करें। इस प्रकार वचन कह वह दिव्य देहधारी केरल का ब्राह्मण प्रेत योनि से मुक्त होकर स्वर्ग को चला गया।

तब पथिक ब्राह्मण पुनः त्रिवेणी से अपने माता-पिता के उपयोग हेतु जल लाने के लिए वापिस चल पड़ा । देवद्युति से प्रयाग इस पुनीत महात्म्य को सुनकर वह पिशाच माघ स्नान के लिए त्रिवेणी की ओर चला गया। वहाँ स्नान करके वह द्रविण राजा उस पाप योनि से मुक्त हुआ और स्वर्ग चला गया।

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