अठारहवाँ अध्याय माघ महात्म्य

अठारहवाँ अध्याय माघ महात्म्य

कांचन मालिनी ने कहा- हे राक्षस! मैंने तुम्हारे पूछने पर यह इतिहास तुझे सुना दिया है, अब मेरी शंका मिटाने को तुम भी अपना पूर्व इतिहास सुनाओ।

किस पापी कर्म के प्रभाव से तुमको यह भयंकर योनि प्राप्त हुई है तब राक्षस ने कहा- हे सुभगे ! तेरा वृतान्त बड़ा ही सुन्दर और पापों को नष्ट करने वाला है, उसे सुनकर मेरे मन को बड़ी शान्ति प्राप्त हुई है।

हे सुलोचने! वास्तव में तूने मुझे वह कल्याणकारी मार्ग बताया है, जिसका बदला मैं नहीं दे सकता। निश्चय ही तू मेरा उद्धार करने को जन्मी है। मैं तुझसे कुछ नहीं छिपाऊंगा और अपने दुष्कर्मों को बताता हूँ ।

हे भद्रे! प्राचीन काल में मैं काशी नामक पवित्र नगरी में रहने वाला एक ब्राह्मण था । मैं उत्तम कुल में जन्मा था, मुझे वेद का अनन्त ज्ञान था । अतः उस नगरी में मेरी बहुत प्रतिष्ठा थी।

इतना ज्ञानी और विद्वान होते हुये भी मेरी बुद्धि खराब हो गई । लोभ के वशीभूत होकर मैंने नीच कर्म प्रारम्भ कर दिये। मैंने दुराचारी राजा, शूद्रों एवं वैश्यों के दुष्टदान लेने प्रारम्भ कर दिये।

अनेकों बार कुत्सित, निषिद्ध, ग्रतिग्रह दान लेता रहा । यहाँ तक लोभ में पड़कर मैं चाण्डाल तक का दान लेने लगा। लोभी प्रवृत्ति के कारण मैंने वे सभी पाप कर डाले जिनको करना कोई पसंद नहीं कर सकता ।

हे देवी! तीर्थों का प्रभाव भी अनोखा है । जहाँ तीर्थ समस्त पापों का सत्कर्म करने पर नष्ट करता है । वहाँ वही तीर्थ पाप करने पर पाप कार्यों को कई गुणा बढ़ाता भी है।

तीर्थ में किया छोटा सा पाप भी पर्वत के समान भयंकर हो जाता है, तब भयंकर पापों का तो कहना ही क्या? उन पापों को करते हुये ही काशी में मेरी मृत्यु हो गई।

काशी क्षेत्र के प्रभाव से मुझे नरक तो नहीं मिला क्योंकि अविमुक्त क्षेत्रों में मृत्यु पाने वाले नरक की यातना से तो बचे रहते है, परन्तु पाप भार ज्यों का त्यों बना रहता है।

उसी प्रकार मैं नरक में न जाकर इस पर्वत पर कुरूप राक्षस योनि को प्राप्त हुआ हूँ । इस योनि में आने से पहले मुझे दो बार गिद्ध और तीन बार सर्प और एक बार विष्टा आहारी वाराह, बनना पड़ा है।

तब इस दसवें जन्म में राक्षस बना हूँ। इन योनियों को पार करने में मुझे सहस्रों वर्ष लगे हैं परन्तु अब तक मुझे अपने उद्धार का कोई मार्ग नहीं मिला। इस भयंकर राक्षसयोनि को पाकर भी मैंने कैसे पाप नहीं किए हैं।

मैंने इस स्थान से तीन योजन के घेरे में कोई जीव नहीं जीवित रहने दिया है। जो मिला उसे ही मार डाला है । सहस्रों निरपराध जीवों की हत्या कर डाली है। इन्हीं पापों के कारण मेरा मन जलता रहता है।

आज तुम्हारे दर्शन करके मुझे शान्ति मिली है। तीर्थ का फल समय पर प्राप्त होता है परन्तु सज्जन के दर्शन मात्र से तुरन्त लाभ होता है। हे देवि! मैंने अपने चरित्र को स्पष्ट रूप से से कह दिया है।

सज्जन दूसरे के दुःख तुम से दुःखी होते हैं। आप ही मेरे उद्धार का मार्ग बताये। मैं इसी चिन्ता में पड़ा रहता हूँ कि मेरे कष्टों का अन्त कैसे होगा?

मैं तो इतना ही जानता हूँ कि सज्जन पुरुषों की सहायता से मुझ जैसे पापात्मा का भी निस्तार होगा । आप ही मेरे उद्धार का मार्ग बताये ताकि इस योनि से छुटकारा मिले।

दत्तात्रेय जी ने कहा- हे राजन्! उस राक्षस के उन वचनों को श्रवण कर कांचन मालिनी का हृदय दया से भर गया, उसने विचार करने के बाद उससे कहा- हे दैत्यराज !

तुम चिन्ता मत करो, मैं तुम्हारी मुक्ति का उपाय करूँगी। मैंने अनेकों वर्षों से विधिपूर्वक माघ स्नान किए हैं, प्रयागराज पर मेरी अगाध श्रद्धा है।

त्रिवेणी स्नान मुझे अपने प्राणों से भी प्रिय है, श्रद्धापूर्वक मैंने त्रिवेणी के जल में स्नान करके धर्म के मर्म को समझा भी है।

विद्वान धर्म को गुप्त रखने को कहते हैं और वेदज्ञ दुःखी जनों को दान देने की प्रशंसा करते हैं। हे भद्र! जिस प्रकार समुन्दर में होने वाली वर्षा का कोई महत्व नहीं होता,

उसी प्रकार धर्म संचित करने का भी महत्व नहीं है। यदि मेरे धर्म से तेरा उद्धार हो सकता है तो मैं उसे सहर्ष देने को तैयार हूँ।

इतना कहकर उस अप्सरा ने अपने गीले वस्त्र निचोड़ कर अपने हाथों में वह जल लेकर अपने माघ स्नान का पुण्य उस बूढे राक्षस को दे दिया ।

हे राजन! माघ स्नान चमत्कारी प्रभाव को सुनो; कांचन मालिनी के पुण्य के प्राप्त होते ही उस राक्षस ने देह त्याग दी। प्रसन्न मुख वह जब विमान पर चढ़ा तो समस्त दिशायें ज्योतिमान हो उठी।

उस समय वह आकाश में दूसरे सूर्य के समान प्रतीत हो रहा था। तब उसने कांचना मालिनी की प्रशंसा करते हुए कहा- हे भद्र! मेरे पापों का कोई प्रायश्चित था या नहीं, यह तो प्रभु ही समझ सकता हैं ।

परन्तु आपने पुण्य प्रदान करके मेरी गति बना दी है। अब आप कृपा करके मुझे नीतियुक्त उपदेश प्रदान करें ताकि मैं भविष्य में भी पापों से मुक्त रह सकूं। उसके इन वचनों को सुनकर कांचन मालिनी ने कहा- संसार में धर्म श्रेष्ठ है।

अहिंसा श्रेष्ठ धर्म है, साधु सन्तों की सेवा, सज्जन समागम, काम देव का हनन, पर निंदा का त्याग, सत्य भाषण और भगवान विष्णु और शंकर की आराधना, प्राणी का कल्याण करने वाले हैं।

माया, ममता का त्याग कर संसार को नाशवान समझकर जीवन यापन करने वाले प्राणी योग में प्रीत लगाते हैं। उससे ही उनका कल्याण होता है। जो भी इन बातों का पालन करता है, उसका ही जीवन सफल होता है ।

हे राक्षस! प्रभु प्रताप से तुमको दिव्य देह प्राप्त हुई है और तुम ‘स्वर्ग को जा रहे हो, प्रभु तुम को सद्बुद्धि प्रदान करें।

इस उपदेश को ग्रहण कर दिव्य शरीर धारण करने वाला वह राक्षस स्वर्ग को जाते समय बोला- हे कल्याणी! तुम्हारा सदैव कल्याण हो, प्रभु तुम पर प्रसन्न रहे।

सूर्य और चंद्र का आकाश में जब तक तेज है तब तक तेरी कीर्ति अमर रहे। देवी पार्वती के चरणों में तेरी प्रीति अखण्ड रहे और भगवान शिव के परम पवित्र शिवलोक में तेरा स्थान बना रहे।

हे माता तेरी बुद्धि निर्मल रहे। धर्म, तप, उपकार, दया तेरे आभूषण हों और दीन दुःखी जन तेरी सहायता का लाभ उठाते रहें ।

इस तरह के वचन कह और कांचन मालिनी को प्रणाम करके वह राक्षस स्वर्ग को चला गया। तब देव कन्याओं ने हर्षित हो काँचन मालिनी पर पुष्प वर्षा की। उसको आशीर्वाद देते हुए बोलीं- हे भद्रे !

तूने राक्षस पर दया करके उसे मुक्ति दिलाने में अपने अद्भुत कार्य का परिचय दिया है।तब हर्षित हो काँचन मालिनी अपने लोक को गई। जो भी प्राणी इस श्रेष्ठ संवाद को सुनता अथवा पढ़ता है, वह राक्षस के भय से मुक्त रहता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *