इक्कीसवाँ अध्याय माघ महात्म्य

इक्कीसवाँ अध्याय माघ महात्म्य

वेदनिधि ने कहा- हे ऋषि! आप कृपा कर इन बालकों को उस धर्म का उपदेश दें जिससे इनकी मुक्ति हो । आप समर्थ है और इस कार्य में इनकी सहायता कर सकते हैं।

लोमश जी बोले इन बालकों की मुक्ति का साधन माघ स्नान ही है। ये मेरे साथ माघ स्नान करें । निश्चय ही इनकी मुक्ति होगी ।

इससे अच्छा दूसरा कोई उपाय नहीं है विप्रश। पाप, फल, श्राप एवं तीर्थ पर किये गये पापों को नष्ट करने की शक्ति माघ स्नान ही में निहित है।

तीर्थ पर किया गया माघ स्नान सात जन्म तक के पापों को नष्ट करता है। मुनिजनों का कहना है कि वे सभी पाप जिनका कोई प्रायश्चित नहीं दिखाई देता वे माघ स्नान के द्वारा ही नष्ट हो सकते हैं।

माघ मास को ज्ञानीजन पवित्रतम मास मानते हैं। इस मास में स्नान करने से निश्चय ही मोक्ष प्राप्त होता है। हिमालय के पर्वत शिखर वाले तीर्थ स्थलों पर माघ स्नान का फल अद्वितीय होता है।

अच्छेद में माघ स्नान स्वर्ग दिलाता है, वदरीवन में स्नान से मोक्ष होता है, नर्मदा के जल में माघ स्नान करने से पाप एवं दुखों का नाश होता है और शिवलोक प्राप्त होता है।

यमुना में किया गया माघ स्नान पाप मुक्त करके सूर्य लोक में पहुँचाने वाला है। सरस्वती में स्नान करने से अधनाश होता है और ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है।

बिशाखा का माघ स्नान आवागमन से मुक्त करने वाला है। श्री गंगा जी का माघ स्नान विष्णुलोक प्राप्ति का श्रेष्ठ साधन है।

तृप्ति, सरयू, गण्डक, सिन्धु, चन्द्रभागा कोशिकी, गोदावरी भीमा, पयोष्णा, कृष्णा वाणीका, कावेरी, तुगभद्रा आदि समुद्र में जाने वाली नदियों में माघ स्नान करने वाले पाप रहित होकर स्वर्ग को पाता है।

नैमिष में स्नान से विष्णु लोक, पुष्कर में स्नान करने से ब्रह्मलोक प्राप्त होता है। कुरुक्षेत्र में स्नान करने से इन्द्र लोक और देव सरोवर स्नान के द्वारा उत्तम फल प्राप्त होता है।हे विप्र !

मकर के सूर्य होने पर माघ मास में स्नान करने से रुद्रगण और देवकी नदी के स्नान से देवताओं की देह प्राप्त होती है गोमती स्नान से मोक्ष एवं हेमकुट, महाकाल, ओंमकार अमरेश्वर, नीलकण्ठ, अबुद्ध आदि में स्नान द्वारा रुद्रलोक प्राप्त होता है ।

माघ नदियों के संगम पर स्नान करने से जो पुण्य में लाभ होता है, वह सबसे श्रेष्ठ है। प्राणियों की सभी कामनायें पूर्ण होती हैं। प्रयागराज का माघ स्नान तो बड़े भाग्य से प्राप्त होता है ।

इसके प्रभाव से प्राणी आवागमन के बन्धन से मुक्त हो जाता है। जो तीन दिन भी माघ स्नान कर लेते हैं, वे महापातकी होने पर भी नरक में नहीं जाते हैं ।

प्रयागराज में माघ स्नान करने वाले सकल सिद्धियों और सम्पदा को प्राप्त करते हैं। उसके द्वारा राजसूर्य यज्ञ से भी अधिक फल प्राप्त होता है। हे विप्र!

एक समय अवति नगर में वीरसेन नामक राजा हुआ, उसने नर्मदा के तट पर राजसूर्य यज्ञ किया और सोलह अश्वमेध यज्ञ भी किये। उसने बहुत सा सोना और अन्न दान में दिया। उसने सहस्त्रों गौ ब्राह्मणों को दान दी।

उसके ही राज्य में समस्त धर्मों से त्यागा भद्रकी नामक एक मूर्ख दुराचार ब्राह्मण था । वह कुलहीन था और खेती करता था। कुछ दिनों बाद जब उसका मन खेती में न लगा तो वह आलसी बना घर में पड़ा रहने लगा।

तब क्रोध करके भाईयों ने उसे घर से निकाल दिया, तब वह भूखा प्यासा रहकर इधर-उधर घूमने लगा और वह प्रयागराज पहुँच गया और उसने माघ एकादशी त्रिवेणी सहित तीन दिन स्नान किया।

उसके समस्त पाप नष्ट हो गये और उसकी गणना उत्तम ब्राह्मणों में होने लगी, फिर वह घर लौट आया। दैवयोग से राजा वीरसेन और भद्रक की मृत्यु एक ही समय हुई। उन दोनों की गति स्वर्ग में मैंने स्वयं देखी।हे विप्र !

राजसूर्य यज्ञ करने वालों को पुनः गर्भ में आना पड़ता है परन्तु त्रिवेणी में माघ स्नान करने वाले मोक्ष प्राप्त करते हैं। वह पवित्र जल सभी पापों को नष्ट करने वाला है ।

विद्वानों का कथन है कि स्नान करने वाले समस्त पापों से मुक्त होकर उत्तम गति को प्राप्त करते हैं।अब मैं तुम्हें एक पुरातन इतिहास सुनाता हूँ, इसके सुनने से पिशाचयोनि में गंधर्व कन्याओं और तुम्हारे पुत्र को सुनने पर महान लाभ होगा ।

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