उन्नीसवाँ अध्याय माघ महात्म्य

उन्नीसवाँ अध्याय माघ महात्म्य

वशिष्ठजी बोले- हे राजन्! भगवान श्री दत्तात्रेय जी ने जो इतिहास का वर्णन किया था, वह मैंने तुमको सुना दिया है। अब तुम माघ स्नान का फल श्रवण करो। माघ स्नान समस्त यज्ञों, दानों, तपस्या एवं व्रतों में श्रेष्ठ है ।

हे दिलीप ! माघ स्नान करने वाले प्राणी के पितर उत्तम गति को पाते हैं। असत्य भाषण, माता-पिता को कष्ट देने से उत्पन्न पाप, पाखंड करने वाले तक सद्गति पाते हैं । तीर्थों पर माघ स्नान करने की महिमा अगाध है ।

इस दुर्लभ अवसर को भाग्यशाली ही पाते हैं। इसमें जप, तप, दान, हरि पूजन तथा स्नान करने वाला प्राणी अहोभागी है । माघ स्नान के पश्चात् सामर्थ्य के अनुसार वस्त्र, ईंधन, स्वर्ण, अन्न आदि का दान करना चाहिये ।

दीप, अग्नि, वस्त्र दान करने वाला भगवान सूर्य के तेजस्वी लोक को प्राप्त करता है। वे महान पापी जो अन्य प्रकार के किसी यज्ञ, जप, तप, दान और धर्म कार्य से अपने पापों के द्वारा मुक्ति नहीं पा सकते, उन्हें अवश्य माघ स्नान करना चाहिए।

माघ स्नान समस्त प्रकार से श्रेष्ठ है और निश्चय ही स्नान करने वाले की मुक्ति करता है और उसके पापों को नष्ट करता है, चाहे वह कैसे ही पाप में लिप्त .क्यों न हो।

वे पापात्मा जो दोपहर के समय भी माघ स्नान करते हैं, यम की अनेकों यातनाओं से मुक्त हो जाते हैं। स्नान करने के उपरान्त जो हरि के चरणों का पूजन करते हैं,

वे स्वर्ग के दिव्य सुखों का उपभोग करते है और अगले जन्म में राजा बनते हैं तथा अपने वंश का उद्धार करते हैं। हे दिलीप !

जिस प्रकार एक छोटी सी चिंगारी से काठ का बड़ा ढेर भी नष्ट हो जाता है, वैसे माघ स्नान के द्वारा बड़े से बड़े पापों का समूह नष्ट होता है। मन, कर्म, वचन के द्वारा हुये समस्त पाप नष्ट होते हैं।

जिस प्रकार भगवान विष्णु समय आने पर दैत्यों का तुरन्त संहार कर देते हैं, वैसे ही माघ स्नान पापों को नष्ट करता है। चाहे किसी भी कारण से, यदि कोई प्राणी माघ स्नान कर लेता है,

तो उसके पाप नष्ट हो जाते हैं। गन्धर्व कन्यायें श्राप भोग रही थी, तब दया करके लोमशजी ने स्नान का फल बताया और उनका संहार किया ।सूत जी ने कहा- हे ऋषिजनों!

इतनी कथा सुनकर राजा दिलीप ने वशिष्ठ जी से पूछा- हे भगवान् ! उन गन्धर्व कन्याओं को किस कारण श्राप मिला और उनका क्या इतिहास है? सुनाने की कृपा करें।

तब धर्म में राजा की श्रद्धा जान वशिष्ठ जी बोले- हे राजन्! तेरा यह प्रश्न उत्तम है। धर्म में जिज्ञासा देखकर मैं तेरे इस प्रश्न पर इतिहास सुनाता हूँ ।

प्रमोदिनी, सुशीला, सुस्वरा, सुतारा और चन्दिरका नामक पांच गन्धर्व कन्यायें थीं। उन सभी के पिता गन्धर्व थे और ये कन्यायें समान आयु और रूप में एक दूसरे से अधिक सुन्दर थीं।

वे नृत्य, संगीत, वाद्य आदि सभी कलाओं में निपुण थीं। उनको देखते ही प्राणी उन पर मोहित हो जाता था। वे हास-परिहास में भी पारंगत थीं ।वे गन्धर्व बालायें साथ-२ खेला करती थी,

कभी वन में, कभी पर्वत पर, कभी उपवन में, कभी किसी सरोवर पर जाकर खेलती रहती थी। एक बार वे सब मिलकर खेलते हुये एक वन में पहुंची । माघ का महीना था। वे कल्पवृक्ष के फूल चुनने लगी।

एक बार वे खेलती हुई एक निर्मल सरोवर पर जा पहुँची और वहां गौरी के पूजन हेतु लगे पुष्प तोड़कर ले आयी।

जल सरोवर के उस शीतल जल में उन्होंने स्नान किया और खेल ही खेल में पार्वती की प्रतिमा बनाकर उनका पूजन किया और फिर उस प्रतिमा के आगे नाचने और गाने लगी ।

हे राजन्! उस सरोवर से थोड़ी दूर पर वेद निधि का आश्रम था। संयोग से उसी समय उनका पुत्र अग्निमय उस सरोवर पर स्नान के लिए आया । अग्निमय ब्रह्मचारी था।

वह परम सुन्दर और पुष्ट था। उसे आता देख वे गंधर्व कन्या सोच में पड़ गई। उसके मनोहर रूप को देखकर वे उसे कामदेव समझने लगी।

वे पाँचों की पाँचों ही उस पर मोहित हो गई और अपने मन में विचार करने लगी कि निश्चय ही ब्रह्माजी ने इस मनोहर स्वरूप कुमार को उनके लिये ही रचा है ।

पार्वती जी ने अवश्य उन पर प्रसन्न होकर उसे वहाँ भेजा है। वे आपस में कहने लगी कि मैंने इसे वरा है। इन कुमारियों की ओर से अज्ञानी वह ऋषि कुमार सरोवर में स्नान करने के बाद अपनी पूजा वन्दना में लग गया।

जब वह समस्त क्रियाओं से निवृत हुआ तो उसके कानों में गन्धर्व कन्याओं की बातें पड़ी। वह मन ही मन विचारने लगा कि आज महान अनर्थ हो गया जो वह इन कन्याओं के समीप आ गया ।

स्त्री की माया बड़ी विचित्र होती है। वह देवताओं तक को मोहित करके अपने धर्म से डिगा देती है। इस प्रकार सोच विचार कर ऋषि कुमार ने उन सुन्दरियों से अपनी रक्षा करने के लिए अपने को योग बल के द्वारा अन्तर्धान कर लिया ।

जब उन कन्याओं ने उस युवक को नहीं देखा तो वे बड़ी अधीर हुई। वे उसे चारों ओर अधीर होकर खोजने लगी परन्तु वह उन्हें कहीं नहीं मिला । वियोग | के कारण दुःखी उन कन्याओं ने इन्द्र जाल अथवा कोई मायाजाल जान घर लौटने का निश्चय किया ।

विरह से तृप्त बहुत विलम्ब करके जब अपने घर पहुँची तो उनकी माताओं ने उनसे देर से आने का कारण पूछा और उनके चेहरों पर विषाद चिन्हों को देखकर तरह-तरह के प्रश्न पूछने लगी ।

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