पहला अध्याय – माघ महात्म्य

पहला अध्याय – माघ महात्म्य

पहला अध्याय श्री नैमिषारण्य क्षेत्र में मुनिजनों ने परम भागवत श्री सूतजी से कहा- हे मुने! अब आप कृपा करके माघ मास की उस पवित्र कथा का वर्णन करें जो कि वशिष्ठ भगवान ने दिलीप से कहा था, जिससे प्राणी के समस्त पाप नष्ट होते हैं ।

हे देव! कृपा करके आप माघ मास के सम्पूर्ण इतिहास का भी वर्णन करें ।सूतजी बोले- हे मुनिजनों! तुम धन्य हो, भगवान श्री कृष्ण की भक्ति में लगा तुम्हारा मन देखकर मैं बड़ा प्रसन्न हूँ।

मैं समस्त पापों को नष्ट करने वाले परम पुनीत माघ मास का महात्म्य तुमको सुनाता हूँ। ध्यान से सुनो।एक दिन पार्वती जी ने भगवान शंकर जी से पूछा- हे महादेवजी! आप समस्त धर्मों के ज्ञाता हो। आप कृपा करके मुझे माघ मास का महात्म्य, व्रत, विधि, पूजन और इतिहास बताइये ।

पार्वती के इन वचनों को भगवान महादेव सुनकर अति प्रसन्न होकर बोले- हे प्रिय ! तुम इस मनोहर वृतान्त को सुनो। एक समय महाराज दिलीप ने एक महान यज्ञ किया । ऋषिजनों ने प्रसन्न हो राजा को आशीर्वाद दिया।

नगर निवासियों ने श्रद्धा से राजा का पूजन किया । तब वह प्रसन्न चित्त राजा अपनी सेना सहित वन में मृग का शिकार खेलने गये। समस्त अस्त्र-शस्त्रों से युक्त दिलीप कवच आदि धारण किये हाथ में धनुष बाण लिये वन में शिकार खोजने लगा ।

उनके पैदल सिपाही भी मनोहर जंगल में विचरने लगे।शिकारियों का दल वन में देखकर सभी जीव शान्त होकर अपनी गुफाओं में चले गये हल सुन मृग भागने लगे। राजा ने उनको अपने बाणों का निशाना बनाया। पक्षी इस वृक्ष से उस वृक्ष पर उड़ने लगे और अपने को छिपाने के लिए स्थान खोजने लगे।

सियार चिल्लाने लगे, वृक्षों की खो में छिपे उल्लू चीखने लगे। वन के शान्त प्रदेश में जहाँ घने वृक्ष थे, फूलों की सुगन्ध महक रही थी, भौंरे गुंजार कर रहे थे, दूध से भरे थनों वाली गायें घूम रही थीं, सर्पों के बिलों से कैंचुली आधी बाहर निकली पड़ी थी, अजगर वृक्षों की शाखाओं पर लिपटे थे ।

पत्थरों के आपस में टकराने से अग्नि की चिनगारियाँ छिटक रही थी, बाघ दहाड़ रहे थे, शिकारी कुत्ते खरगोश के पीछे दौड़ रहे थे। इस प्रकार राजा दिलीप वन में शिकार खेलते, रात्रि होने पर विश्राम करते और फिर आगे बढ़ जाते थे।

इसी प्रकार शिकार खेलते हुये राजा जब वन में विचरण कर रहे थे तो सेवकों द्वारा मचाये हुए शोर को सुनकर एक मृग जंगल से निकला और इधर-उधर चौकड़ी भरने लगा। तब राजा ने उसका पीछा किया, लम्बी-लम्बी छलाँग लगाता हुआ मृग टेढ़े-मेढ़े रास्तों से, कांटेदार झाड़ियों और वृक्षों के मध्य होकर कई झरने पार करता भयानक जंगल में घुस गया।

मृग का पीछा करते हुये राजा दिलीप उस स्थान पर आ पहुँचे, जब वह मृग दिखलाई नहीं दिया तो राजा घबरा गये क्योंकि वे बहुत थक चुके थे और प्यास के मारे व्याकुल थे। राजा और उनके साथी थक गए थे। उनके घोड़े पसीने में तर थे, दोपहर का ” समय हो चुका था और सभी प्यास से व्याकुल हो रहे थे।

पानी की खोज करने पर राजा ने दूर समुद्र जैसा एक विशाल सरोवर देखा जिसके किनारे घने वृक्ष थे, जल स्वच्छ था, बड़े-बड़े कमल खिले थे, जिन पर भौंरे गूंज रहे थे। सरोवर के जल में छोटी-छोटी मछलियां लहरों के साथ तैर रही थी।

उस सरोवर के किनारे पर अनेकों पशु-पक्षी घूम रहे थे। इस सुन्दर सरोवर को देखकर राजा और उसके साथियों की थकावट दूर हो गई। राजा व सैनिकों ने सरोवर के जल को पिया और वहीं रात्रि व्यतीत करने के विचार से डेरा डाल दिया । राजा और सैनिकों ने संध्या को भोजन आदि से निवृत होकर शस्त्र सम्भाल लिये ।

राजा एक वृक्ष पर धनुष बाण सहित बैठ गये और उनके अन्य साथी भी दूसरी दिशाओं में अपने शस्त्र लेकर स्थित हो गये ताकि शिकार कहीं से बचकर न निकल सके कुछ सैनिकों ने वन में जाल फैला दिया । आधी रात होने पर जंगली शूकरों का एक झुण्ड सरोवर के किनारे आया। उन शूकरों ने तट के किनारे उत्पन्न कमल कन्द खाये और पेट भर जाने पर वह झुण्ड वापस लौटने लगा तो राजा के सैनिकों द्वारा लगाये जाल में फंस गये।

राजा ने अपने साथियों की सहायता से अनेकों शूकर मार डाले, कुछ घायल होकर वहीं पड़े रहे और कुछ भागकर जंगल में जा छिपे । इतने सारे शूकरों को मरा देख राजा साथी प्रसन्न होकर शोर करने लगे। सबको साथ लेकर राजा सरोवर के किनारे से चल दिये, उन्होंने अपने राज्य लौटने का निश्चय किया। राजा जैसे ही नगर की ओर चले उन्होंने देखा कि सामने से शंखचक्र चिन्हों से शोभितकृश शरीर, कोमल वल्कल पहिने एक तपस्वी सरोवर की ओर चले आ रहे हैं।

राजा ने नम्रतापूर्वक उनको प्रणाम किया और मार्ग छोड़ दिया। ऋषि ने राजा को पहचान कर कहा- हे राजन! प्रातः होने को है। माघ मास की इस पुण्य बेला में सरोवर का स्नान त्याग कर तुम कहाँ जा रहे हो?

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