पांचवाँ अध्याय माघ महात्म्य

पांचवाँ अध्याय माघ महात्म्य

इतनी कथा कहकर थोड़ी देर शाँत रहने बाद वशिष्ठ जी ने कहा- हे राजन् ! भगवान् दत्तात्रेय से कार्तवीर्य ने माघ महात्म्य सुनने के लिए जो प्रयत्न किये थे, उनको मैं अब तुम्हें सुनाता हूँ ।उन दिनों भगवान दत्तात्रेय जी सह्य पर्वत पर निवास कर रहे थे, तब महिष्मती के राजा कार्तवीर्य ने जाकर उनसे निवेदन किया- हे देवेश!

मैंने समस्त धर्म श्रवण किये हैं, अब आप माघ स्नान के फल का वर्णन करें। दत्तात्रेयजी बोले- हे राजन्! मैं तुम्हें वह इतिहास बताता हूँ, जो ब्रह्माजी ने नारद को सुनाया था। इस भारत भूमि में जो प्राणी माघ स्नान नहीं करते, उनका जन्म अकारथ ही है। व्रत, दान, तप, यज्ञ आदि सबसे भगवान श्रीहरि उतने प्रसन्न नहीं होते, जितने माघ स्नान से होते हैं।

जैसे सूर्य के सामने कोई तेज नहीं टिकता वैसे ही माघ स्नान के सामने कोई अन्य कर्म नहीं टिकता । प्राणी को चाहिये कि वह भगवान श्रीहरि को प्रसन्न करने की इच्छा से माघ स्नान अवश्य करें। मनुष्य का शरीर हाड़, माँस और रुधिर का एक ढाँचा है। यह मूत्र, विष्टा आदि दुर्गन्धों से युक्त रहता है। वृद्धावस्था, शोक, विपत्ति आदि से घिरा है। मानव देह रोगों का घर है । प्राणी का स्वभाव स्वयं सन्तप्त रहना और दूसरों को सन्ताप देना है। पुरुष लोभ, मोह, क्रोध, निंदा ईर्ष्या, बैर आदि से पूर्ण है। प्राणी सत्व, तम, रज आदि तीनों दोषों से घिरा रहता है, वह स्वभावतः अधर्म की ओर अग्रसर होता है।

प्राणी का शरीर अन्त में नाश को प्राप्त होता है, उसमें कीड़े पड़ जाते हैं। विष्टा या भस्म बन जाता है या कुत्ते, शृंगल आदि का आहार होता है। इस प्रकार का मानव शरीर पाने वाला जीव यदि माघ स्नान न करें तो उसका शरीर धारण करना ही व्यर्थ है ।माघ स्नान से प्राणी के समस्त संचित पाप नष्ट हो जाते हैं । ब्राह्मण होकर भी जो विष्णु भगवान से प्रेम नहीं करता, वह उसी प्रकार नष्ट होता है जैसे अयोग्य को श्राद्ध ब्राह्मण विहीन क्षेत्र, आचार रहित कुल नष्ट होते हैं।

कपट से भरा धर्म, क्रोध के द्वारा तपस्या, कृत संकल्प न होने के कारण ज्ञान, अभिमान से सुनी गई कथा नष्ट होती हैं। गुरु पर अविश्वास करने वाला ब्रह्मचारी और मंद अग्नि में डाली गई आहुति, अकेले किया गया स्वादिष्ट भोजन स्वतः नष्ट होते हैं। कन्या बेचकर एवं कंजूसी द्वारा संचित धन शुद्ध एवं दरिद्री का यज्ञ नष्ट करते हैं। जिसका अभ्यास छूट जाये वह विद्या, सदा झगड़ा करने वाला राजा, रोजी कमाने के उद्देश्य से की गई तीर्थयात्रा तथा व्रत स्वतः नष्ट हो जाते हैं।

चुगली तथा झूठी वाणी, संशय, मंत्र जाप, व्याकुल चित्त से किया गया जप नष्ट है। वेद पाठ रहित मूर्ख को किया गया दान, नास्तिक का परलोक, श्रद्धा रहित किया गया धर्म कार्य व्यर्थ होता है। निर्धनता के कारण जिस प्रकार प्राणी इस लोक में समस्त सुख एवं वैभवों से वंचित रहता है, उसी प्रकार हे राजन्! बिना माघ स्नान के प्राणी का जीवन तथा देह धारण करना व्यर्थ ही जानो ।जो प्राणी मकर के सूर्य में उदय के समय में स्नान नहीं करता, उसकी मुक्ति नहीं होती ।

उसके पाप नष्ट नहीं हो सकते। गौ और ब्राह्मण की हत्या करने वाला, स्वर्ण का हरण करने वाला, मदिरा पीने वाला, गुरु की भार्या से सम्भोग करने वाला, परस्त्रीगामी आदि पांच प्रकार के महान पापी तक माघ स्नान के द्वारा मुक्ति पा जाते हैं। उनके ये महापाप स्वतः नष्ट होते हैं । माघ स्नान के समय जल में उतरते समय प्राणी के पाप कम्पायमान हो जाते हैं। जल कहता है मैं समस्त पापों को नष्ट कर दूंगा ।

जब प्राणी माघ स्नान कर लेता है तो उसके पाप नष्ट हो जाते हैं। समस्त पाप नष्ट हो जाने के कारण वह निर्मल हो जाता है ।माघ स्नान प्राणी के पापों को इस प्रकार जला देता है जैसे अग्नि ईंधन को जला डालती है । हे राजन्! ज्ञान, अज्ञान और प्रमोद से किए गये सभी पाप उसी तरह नष्ट हो जाते हैं जैसे सूर्य के प्रकाश से अन्धकार । माघ स्नान श्रेष्ठ फल देने वाला है। जिस प्रकार विष्णु भक्ति में सभी प्राणियों का अधिकार समान है, उसी प्रकार माघ स्नान के लिए भी सभी अधिकार है। इसी कारण इसे श्रेष्ठ पापनाशक उत्तम मंत्र और परम तप कहा जाता है। प्राणी को पूर्व जन्मों के अभ्यास द्वारा ही माघ स्नान की बुद्धि उपजती है।

जिस तरह अनेकों जन्म के अभ्यास द्वारा आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त होता है, ज्ञान से बुद्धि उपजती है । माघ स्नान की महिमा अक्षय है। यह पवित्र जनों को भी पवित्र करता है । जो प्राणी इस स्नान को नहीं करते, वे सुख संपदा से वंचित रहते हैं, उनको संसार के सुख प्राप्त नहीं होते ।हे राजन! इस परम प्रभावशाली माघ स्नान की प्राचीन कथा सुनो।

कांजिका नाम की एक ब्राह्मणी भृगु वंश में हुई, वह बाल विधवा हो गई, तब उसने कठोर तप किया । विन्ध्याचल पर्वत पर रेवा और कपिल के संगम स्थान पर भगवान श्रीहरि की आराधना का व्रत धारण करके वहाँ बैठ गई, उसने अपनी समस्त इन्द्रियों को जीत लिया, क्रोध को नष्ट कर और वह एकांकी रहकर अल्पभाषणी हुई।

उसने तपस्याओं के द्वारा शरीर को सुखाना आरम्भ कर दिया। देवताओं को प्रसन्न करने के लिए यज्ञ किए, ब्राह्मण को यथाशक्ति दान दिया । वह आहार हेतु खेतों में से अन्न चुनती और समस्त व्रतों को नियमपूर्वक धारण करती थी। नर्मदा के पावन तट पर वह पुण्य मास बिताती थी।

उस सुशील तपस्विनी ने बड़े धैर्य और सन्तोष के साथ माघ स्नान किए।हे राजन! काल चक्र के प्रभाव में पड़कर उस ब्राह्मणी ने उसी तीर्थ स्थान पर अपनी तापस देह त्याग दी। मृत्यु के उपरान्त माघ स्नान के प्रभाव से वह भगवान श्रीहरि के बैकुण्ठ धाम को गई। वहाँ चार हजार वर्ष तक सुख भोगती रही। उसके बाद ब्राह्मण जी ने सुन्द और उपसुन्द नामक महावली दैत्यों का नाश करने के लिए उस ब्राह्मणी को तिलोत्तमा के रूप में पुनः अवतरित किया। अपने पूर्व पुण्यों के प्रभावों से ही वह परम रूपवती हुई। वह समस्त ब्राह्मण में परम सुन्दरी थी, उसे देखकर देवता तक मोहित हो गये थे।

वह समस्त अप्सराओं में श्रेष्ठ थी। उसके सृजन सारे भगवान ब्रह्माजी भी उसके रूप को देखकर आश्चर्य चकित रह गए। उन्होंने प्रसन्न होकर उसे आज्ञा दी – हे भृगलोचने! शीघ्र ही इन दोनों महापराक्रमी दैत्यों का जाकर संहार करो। प्रभु की आज्ञा मानकर वह हाथ में वीणा धारण किए ब्रह्मलोक में पुष्कर क्षेत्र में पहुँची। उसने रेवा के जल में स्नान किया ।

चमकीले लाल वस्त्र धारण किए, करधनी और नूपरों की मोहक आवाज करती हुई चली। उसने गले में मोतियों की माला और कानों में लटकने वाले कुण्डल पहने । ताधवी के फूल चोटी में गूंथे । अशोक वृक्ष के नीचे बैठकर उसने वीणा बजाकर मधुर लय में गाना शुरू किया। इस परम सुन्दरी को जब नितांत अकेली मधुर स्वर में गाता उन दैत्यों के सेवकों ने देखा तो अपने स्वामियों को जाकर सूचना दी।

दूतों ने प्रसन्न हो सुन्द और उपसुन्द से कहा- हे दैत्यराजों! यहीं पास अशोक वन में एक परम सुन्दरी नितांत अकेली बैठी वीणा पर गा रही है, उसका स्वरूप बहुत ही मनोहर है। मालूम नहीं कि वह देवी है, मानवी है अथवा दानवी है। कहा नहीं जा सकता है कि वह अप्सरा है या राक्षसी है। यह नितान्त सत्य है कि वह स्त्री रत्न है । आप दोनों ही स्त्री रत्नों के परखी हो इसलिए चलकर उस मनोहर रूप धारिणी स्त्री को अवश्य देखो । दूतों के उन वचनों को सुनकर वे दोनों कामुक दैत्य तुरंत उठ बैठे।

उन्होंने मधपात्र वहीं छोड़ दिए। सेवा में रत सहस्त्रों सुन्दरियों को त्यागकर वे अपनी भारी गदाऐं लेकर दूतों के साथ उस परम सुन्दरी को देखने चल दिए, जो वास्तव में उनका वध करने हेतु प्रगटी थी। जैसे ही वे उसके सम्मुख पहुँचे उसके मनोहर स्वरूप को देखते ही मोहित हो गए। उसके रूप, सौंदर्य, श्रृंगार और कटाक्ष ने उन दोनों के हृदय में कामाग्नि भड़का दी। वे दोनों मस्त हाथी की तरह उसके सामने जाकर खड़े हो गए, दोनों ही मद्य पिए थे और दोनों ही उस स्त्री के ऊपर आसक्त थे, इस कारण आपस में ही लड़ बैठे।

सुन्द ने कहा- हे भाई! तू अब इस स्थान को त्यागकर चला जा । यह मृगलोचनी अब मेरी पत्नी होकर रहेगी। उपसुन्द बोला- नहीं ऐसा नहीं हो सकता। इसे तो मैं अपनी पत्नी बनाऊंगा, उसके लिए वे दोनों आपस में लड़ने लगे, दोनों अपनी गदाओं से एक दूसरे पर प्रहार करने लगे। काल की गति से वे दोनों महापराक्रमी दैत्य आपस में द्वन्द करते हुए मारे गए। दैत्यों को मरा जान उसके साथी भागने लगे और देवता प्रसन्न हो जयकार करने लगे और अपना कार्य पूर्ण हुआ देख तिलोत्तमा सभी दिशाओं को अपने दिव्य प्रकाश से आलोकितकरती हुई सीधी ब्रह्मलोक को चली गयी।

हे राजन् ! तिलोत्तमा को सकुशल आया देखकर ब्रह्माजी ने संतुष्ट होकर वरदान देते हुए कहा – हे चंद्रवदनी! मैंने तुमको सूर्य के रथ पर स्थान दिया। जब तक आकाश में सूर्य है तब तक तुम नाना प्रकार के भोगों को भोगों। इस प्रकार वह ब्राह्मणी आज तक सूर्य लोक में दिव्य भोग प्राप्त करती हुई माघ स्नान का फल प्राप्त कर रही है। हे राजन् ! यदि प्राणी परमगति और दिव्य भोगों की इच्छा करता है तो उसे मकर संक्रान्ति में स्नान करना चाहिए ।

माघ स्नान से उत्तम फलदायक और कोई नहीं है। इसके द्वारा प्राणी के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और अनेक यज्ञों से भी कई गुना फल प्राप्त होता है । अन्त समय प्राणी मोक्ष को पाता है ।

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