सत्रहवाँ अध्यायं माघ महात्म्य

सत्रहवाँ अध्यायं माघ महात्म्य

कार्तवीर्य ने पूछा-हे भगवान्! कांचनमालिनी और राक्षस कौन थे? कृपया उस इतिहास को आप बताइये । दत्तात्रेय जी बोले- राजन् ! विद्वान और ज्ञानी तथा धर्म जिज्ञासु को समस्त रहस्य बता देने चाहिये ।

यही उचित बात है। इस इतिहास को सुनने से अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है। परम सुन्दरी कांचनमालिनी एक अप्सरा थी, वह माघ स्नान त्रिवेणी में करके जब शिवालय की ओर जा रही थी तो पर्वत की कन्दरा में बैठे एक वृद्ध राक्षस ने उसे देखा ।

उसकी सुन्दरता को देखकर राक्षस आश्चर्यचकित रह गया और राक्षस ने पूछा हे सुकेशी तू कौन है, और कहाँ से आती है, तेरे वस्त्र और केश गीले क्यों हैं? ऐसा कौन सा पुण्य है जिसके कारण तेरा तेज दमक रहा है?

तेरे दर्शन मात्र से मेरे क्रूर मन को शान्ति हो रही है। क्या महिमा है? तुम मुझसे कहो। तब अप्सरा ने कहा- हे राक्षस! मै एक अप्सरा हूँ, मेरा नाम कांचन मालिनी है।

क्योंकि मैं इस समय त्रिवेणी से स्नान करके लौट रही हूँ, इस कारण मेरे वस्त्र और केश गीले हैं। मै शिव पूजन के लिए कैलाश जा रही हूँ।

मेरे ऊपर जो तेज प्रतीत होता है, वह माघ स्नान और प्रयागराज के संगम त्रिवेणी के जल का प्रभाव है। जिस पुण्य के प्रताप से मैं सुबुद्धि गन्धर्व की कन्या पैदा और उमा की सखी हुई हूँ। उसका भी इतिहास तुम सुनो।

पूर्व जन्म में मैं कलिंग राजा की प्रिय वेश्यायी सुख सम्पत्ति के कारण मै गर्व में फूली रहती, श्रेष्ठ सुन्दरी होने के कारण सारा नगर मुझ पर मोहित था।

मैंने इच्छानुसार भोग-विलास किया और कामी पुरुषों के धन को मनमाने तरीके से ठगा । मेरे पास धन वैभव और सम्पत्ति की कोई कमी नहीं थी ।

उस समय कलिंग में मेरे नाम की धूम थी। परन्तु जब मैं वृद्धा हुई तो मैने विचार किया कि मैने अपना सारा जीवन कामवासना और धन संचय में ही व्यतीत किया है, कभी धर्म की ओर ध्यान नहीं दिया है ।

इस विचार के आते ही मेरी आत्मा को बहुत कष्ट हुआ । अन्त में विचारकर मैं राज पुरोहित के पास गई और तब मैंने अति विनीत स्वर में विलाप करते हुए अपने मन की व्यथा उनसे कही। मैंने कहा हे विप्र !

मैं बहुत ही पापी हूँ। मैंने कभी भगवान के चरण कमलों को प्राप्त करने लिए जप, तप, व्रत और पूजन नहीं किया है। जवानी के नशे में भोग-विलास में पड़कर मैंने अपने तीनों जन्म नष्ट कर दिये हैं।

हे नाथ! अब आप मुझ अबला को उबारिये और मेरा उद्धार करिये।मेरे वचनों को सुनकर पुरोहित ने कहा-हे सुमुखि! तेरे समस्त पापों को मैं जानता हूँ तुने जो पाप किये हैं,

उनसे सहज ही मुक्त होने का एक ही उपाय है कि तू प्रयागराज जा और अपने मन को निर्मल कर, तू त्रिवेणी में स्नान कर । तीर्थराज प्रयाग में ही यह शक्ति है कि वे तेरे सारे पापों को नष्ट कर सकते हैं।

ऋषिजनों का यही कहना है कि प्रयागराज में माघ स्नान करने से प्राणों के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। “जयति तीर्थराज प्रयाग की तीर्थों में प्रयागराज श्रेष्ठ है । भीरु अब तुम प्रयागराज के महात्म्य को सुनो ।

पुराने समय में देवराज इन्द्र ने जब काम से पीड़ित होकर गौतम की परम सुन्दरी पत्नी अहिल्या के साथ पापाचार किया तो क्रोध में भरकर ऋषि ने इन्द्र को शाप दिया फलस्वरूप देवराज के समस्त शरीर पर हजारों भागचिन्ह बन गये और उनका स्वरूप लज्जापूर्ण एवं कुरूप हो गया।

तब मन में लज्जा को धारण किये मुँह नीचा करता, देवराज इन्द्र संसार की नजरों से बचता सुमेरु पर्वत पर जा पहुँचा।

वहाँ सौ योजन लम्बी सरोवर में खिले स्वर्ण कमलों को देख एक कमल के भरे हुए कोटर में छिपकर बैठ गया । एकान्त वास करता हुआ इन्द्र अपने कृत्य पर पछताता रहा।

उसने अपनी कामुकता को लाख बार धिक्कारा और बार-बार अपने ऊपर ग्लानि करने लगा । ऊधर देवराज इन्द्र के बिना स्वर्ग की शोभा नष्ट होने लगी।

तब इन्द्राणि देवताओं को साथ लेकर बृहस्पति जी के पास गई। उसने कहा- हे भगवान्! स्वामी के बिना मेरा जीवन अप्रिय हो रहा है।

कृपा करके आप ही बताये, स्वामी कहाँ हैं? हे नाथ! आप मुझ पर और देवताओं पर दया करेक इन्द्र का पता बतायें | बृहस्पतिजी बोले- हे सुभगे!

तेरे पति इन्द्र ने बिना सोचे विचारे जिस महान् पाप को कर डाला है, उसकी लज्जा से ही वह एकान्त वास कर रहे हैं ।

इन्द्र ने मद में आकर कर्म कुकर्म का विचार नहीं किया। उस दशा में वह क्षय करने वाले घृणत एवं प्रकट कुकर्म पर बैठा है। चलो मैं तुमको वह स्थान बताता हूँ, जहाँ इस समय इन्द्र छिपा बैठा है।

तब बृहस्पतिजी समस्त देवताओं एवं इन्द्राणि शचि को साथ लिए उस सरोवर के पास गये। वहाँ बृहस्पति ने इन्द्र को समझाया, तब इन्द्र को अपने स्थान से बाहर आना पडा।

गुरु के सामने आते समय उसका मन ग्लानि से भरा था, वह अपने कुरूप पर लज्जित था और मन ही मन पछता रहा था। उसके नेत्र नीचे की ओर झुके हुये थे।

उसने लपककर गुरु के चरण पकड़ लिये और आंसू बहाते हुए कहा- हे देव! मैं तुम्हारी शरण में हूँ। मेरी रक्षा करो। मुझे ऐसा उपाय बताओ जिससे मैं इस श्राप से मुक्त हो सकूँ । हे नाथ? मैंने बिना सोचे ।

समझे जो भी अपराध किया है, उससे आप ही मुक्त कर सकते हैं। मैं आपकी शरण हूँ। इन्द्रदेव के इन वचनों को सुनकर देवगुरु बृहस्पतिजी ने कहा- हे देवराज!

तुमने महान दुष्कर्म किया है, परन्तु इतने दिन एकान्त वास करते हुए तुमने अपने कर्म पर पछतावा किया है। इसलिये तुम्हारे पाप को नष्ट करने का उपाय तुम्हें बताता हूँ।

इस शाप से मुक्त करने की कोई शक्ति त्रिलोक में नहीं है। ब्राह्मण का श्राप नष्ट नहीं हो सकता, परन्तु उसका स्वरूप अवश्य बदला जा सकता है ।

समस्त पाप तीर्थों के स्नान के द्वारा ही नष्ट होते हैं । समस्त तीर्थों में प्रयागराज श्रेष्ठ है, इसलिये तुम हमारे साथ चलकर, प्रयागराज तीर्थ पर त्रिवेणी स्नान करो ।

वहाँ निश्चय ही तुम्हारे पाप नष्ट होंगे। तब इन्द्र उनके साथ प्रयाग गया और त्रिवेणी में स्नान किया। उसके समस्त पाप तुरन्त नष्ट हो गये।

तब बृहस्पतिजी ने इन्द्र की बुद्धि निर्मल जानकर आशीर्वाद देते हुए कहा- हे इन्द्र! ऋषि के श्राप से तेरे इस शरीर पर जो हजारों भगचिंह हैं, वे नेत्र बन जाए। तभी से इन्द्र के हजारों नेत्र हो गए हैं।

हे सुनयन! जिस प्रकार इन्द्र त्रिवेणी में स्नान करने से निष्पाप हुआ, उसी तरह तेरे भी वहाँ स्नान करने पर पाप नष्ट हो जायेंगे।

तू भी वहीं जाकर स्नान कर । उनकी बात मानकर हे राक्षस! मैं प्रयागराज गई और मैंने त्रिवेणी की पवित्र धारा में स्नान किया ।

उन दिनों माघ मास था, तीन दिन के स्नान से मेरे समस्त पाप नष्ट हो गए। शेष सत्ताईस दिन के स्नान का मुझे दिव्य फल मिला। मैं पार्वती जी की सखी बनी हूँ। अब भी मुझे पूर्व वृत्तान्त याद है और वहाँ से ही लौट रही हूँ।

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