
सुनो सुनो माँ की महिमा
सुनो रे सुनो माँ की महिमा -2 सुनो-सुनो,
सुनो सुनो माँ की महिमा सुनो सुनो-2
देवी दास भक्त था माँ भवानी का
रोम-2 ऋणि था महारानी का
माया उसकी पत्नी भी माँ को पूजती
नैनों में बसाई जिसने माँ की मूर्ति
दो थी उनकी बेटियाँ सुशील-होनहार
शेरों वाली वैष्णों से जिनको था प्यार-2
भावना तपस्या ही जिनका नाम था
सुबह शाम माँ की पूजा जिनका काम था
सोना-चाँदी, हीरे मोती धन था बेहिसाब
तृष्णा थी फिर भी कुछ अधूरी थी किताब
बहनों की राखी को कलाई चाहिए
टीके-भाई दूज को भी भाई चाहिए
सुनो सुनो माँ की महिमा-2
एक दिन माँ वैष्णों हो गई दयाल
बहनों को भाई मिला माता को लाल
खुशियों का शहद ही था सब ने चख लिया
बच्चे का नाम था वरदान रख दिया
पालने में झूलता वो बड़ा हो गया
शिवा आदि शक्ति की धुन में खो गया-2
मस्ती में मस्त होके मुंह जो खोलता
तोतली जुबान में जय माँ की बोलता
छोटे से मंजिरों को पकड़ हाथ में
माता बहनों के वो भी साथ में
देखते ही हो गया वो तीन साल का
चेहरे पे अजीब ही उसके जलाल था
सुनो सुनो, सुनो सुनो माँ की महिमा-2
लगन महारानी की बेअन्त थी उसे
सारी दुर्गा सप्तशंति कण्ठ थी उसे उसे
देख एक सुर में कहता जगत था
पिछले जन्म में भी माँ का भक्त था
माँ उसमें श्रीधर की झलक पाती थी
उसे देख ध्यानूं जी की याद आती थी-2
आठों पहर वैष्णों को पूजता था वो
भांगड़ा दिवाना हो के नाचता था वो
माँ कहती युगों तक दीप ये जले
बाप कहे नजर कोई बुरी न लगे
चारों ओर भक्ति का आनन्द छाया था
स्वर्ग जैसे धरती पे उतर आया था
सुनो सुनो, सुनो सुनो माँ की महिमा…
अचानक ही एक दिन जाने क्या हुआ
सुखों ने दुःखों को था दबोच ही लिया
माँ उसकी सख्त थी बीमार पड़ गई
नैया जो किनारे थी भंवर में अड़ गई
दर्द से वो इस कदर निढाल हो गई
भले-चंगे हाल में बेहाल हो गई-2
डाक्टर हकीम वैद्य सारे हार गए।।
की सब ने इलाज पैसे हो बेकार हो गए।
भावना तपस्या वरदाने क्या करे
सूझता न कुछ था कि इन्सान क्या करे
कोई कहे टी.बी. इसके दम को तोड़ेगी
कोई कहे कैंसर न जिन्दा छोड़ेगी-2।
सुनो सुनो, सुनो सुनो माँ की महिमा…
वर्ष फल बने जन्म कुंडलियां बनी
रही दान पुन की जन कोई भी कमी
घड़ियाँ वो जिन्दगी की जब रही थी गिन
भगवती के आ गए नवरात्रों के दिन
पिता और बेटियों ने थे व्रत रख लिए
अम्बे की अराधना के यत्न थे किए-2
नन्हा वरदान भी था जिद पे अड़ गया
बड़ा कठिन उसने तो प्रण था किया
फलाहार निष्ठा में कुछ न खाऊंगा
पाक्षी की इक बूंद भी न मुंह लगाऊंगा
सच्ची माँ के लिए माँ से मैं उमर मांगूगा
न मिली तो अपने लिए जहर मांगूगा-2
मुनो सुनो, सुनो सुनो माँ की महिमा…
माँ मेरी का कष्ट माँ को हरना पड़ेगा
नवरात्रों में कर्म यही करना पड़ेगा
वो मेरे विश्वास को न तोड़ पाएंगी
देख लेना मन्दिरों से दौड़ आएगी
मेरे सिर पे प्यार का वो हाथ रखेगी
एक नन्ह भक्त की वो बात रखेगी-2
माँ के होते माँ मुझसे रूठेगी नहीं
महादाती खुशियों को लूटेगी नहीं
ध्रुव सी ये आज है दीवानगी मेरी
भक्त कहे लाज सी है भक्ति मेरी
माँ से तार जब लगन जुड़ जाएगा
यमराज आया भी तो मुड़ जाएगा-2
सुनो सुनो, सुनो सुनो माँ की महिमा..
दीवाने ऐसे रोकने से हैं रुकते कहाँ
मुश्किलों मुसीबतों से डरते हैं कहाँ
सच्ची लगन श्रद्धा से हाथ जोड़ के
बैठ गया वो सब कुछ माँ पे छोड़ के
जय अम्बे करता वो शान्त हो गया
दुनिया को भूल माँ की धुन में खो गया-2
न ही कुछ खाता न पीता था वो
चिन्तन ही वैष्णों का करता था वो
जैसे-जैसे नवरात्रा गुजरता गया
फूल जैसा चेहरा था सूजता गया
लाल व गुलाब मुंह ज़र्द पड़ गया
कमजोरी आई जिस्म सर्द पड़ गया-2
सुनो सुनो, सुनो सुनो माँ की महिमा…
पिता परेशान था व बहनें थी बेचैन
सावन की घटा जैसे बरसते थे नैन
नन्हा भक्त न अपनी जिद से टला
कैसे कोई समझाए उसको भला
एक-एक करके बीते नवरात्रे सात
बेसुध वो हो गया न उससे होती बात-2
डाक्टरों ने कहा अगर ये कुछ न खाएगा
पंछी ये आत्मा का उड़ जाएगा
जैसे-जैसे होश भक्त खोने लगा था
वैसे-वैसे चमत्कार होने लगा था
इधर इसकी हालत थी बिगड़ती गई
उधर बीमारी माँ की घटती गई-2
सुनो सुनो, सुनो सुनो माँ की महिमा…
आखिर आया नवरात्रों की अष्टमी का दिन
मुरझायी काया थी अन्न जल के बिन
मुरदनी सी चेहरे पे जब थी छा गई
हस्पताल से माता घर में आ गई
हाल देख लाल का तो रोई बार-2
लेके उसको गोद में मुंह चूमा बार-2
बोल मेरे बच्चे कुछ मुंह से तो बोल
माँ से क्यों रूठा है आंखें तो खोल
घर में आई कंजकां उठ पूजन तो कर
अष्टमी का दिन है तू खोया है किधर
मीठी तेरी बातों को तरसती है माँ
तुझे ऐसे देख के तड़फती है माँ-2
सुनो सुनो, सुनो सुनो माँ की महिमा…
जोतां वाली जोत ये बुझाएगी नहीं
जान मेरे बदन से ले जाएगी नहीं
तुझे खो के जिन्दगी मैं पाऊंगी तो क्या
एक ज़िंदा लाश को घुमाऊँगी तो क्या
जागने का वक्त अब सोने का नहीं
जननी से जुदा तुम्हें होने का नहीं-2
अष्टमी की जोत अपने हाथों से जला
कंजकां के चरण जरा प्यार से घुला
देख अष्ट-भुजी माँ दयाल हो गई
भागी है बीमार मैं निहाल हो गई
सफल तेरी लाडले अराधना हो गई
पूरी तेरी आज मनोकामना हुई-2
सुनो सुनो, सुनो सुनो माँ की महिमा…
इतने में उठके एक आई कंजका
सिर पे हाथ फेरके माता ने फिर कहा
भक्त मेरे आँखे खोल देख दो घड़ी
तेरे पास अष्टभुजी अम्बे माँ खड़ी
तेरे लिए आई हूँ मैं मंदिरो को छोड़
उमर जो री की है तेरी जननी की जोड़
मेने तेरी बात मानी मेरी भी मान
वरदान नाम तेरा देती हूँ वरदान
तेरे मन के मंदिर में करुँगी निवास
रहूंगी हमेशा में तो भक्तो के पास
भक्त मेरे लाडले मैं भक्तो की माँ
भक्तो को छोड़ भला जाउंगी कहा -2
सुनो सुनो, सुनो सुनो माँ की महिमा…
भक्ति से भक्त बुलाएँगे
मुँह मांगी मुझसे मुराद पाएंगे
निर्दोष प्यार मेरा भक्तो के लिए
सजा है दरबार मेरा भक्तो के लिए
आँखे झपक भक्त ने जब देखा उधर
सिंह पे सवार आई वैष्णो नज़र
आज कई जन्मों की बुझ गई प्यास
जीत गया भक्त का अनोखा विश्वास
भक्ति में भक्त के थे नैना रो दिए
आँसुओ से कंजको के चरण धो दिए
भावना से रखते जो नवरात्रो के व्रत
अंधकार जाता उनके जीवन से हट
सुनो सुनो, सुनो सुनो माँ की महिमा…