तेईसवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य

तेईसवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य यह कथा सुनकर ऋषि कहने लगे-हे सूतजी! भगवान् के चरणों से उत्पन्न हुई गंगाजी की महिमा कहिये। तब सूतजी ने कहा, हे ऋषियों जो कुछ नारदजी ने राजा पृथु से कहा, वही मैं तुमको सुनाता हूं। इन्द्रादिक सब देवताओं को उत्पन्न करने वाले कश्यपजी की दो पत्नियां थीं। एक अदिति, जिसके … Read more

बाईसवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य

बाईसवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य नारदजी कहते हैं कि हे राजन्! कार्तिक शुक्ला दूज को यम द्वितीया कहते हैं। इस दिन यमुनाजी में स्नान करके यमराज का पूजन करते हैं। इस द्वितीया को भैया दूज भी कहते हैं। इस दिन भाई अपने घर भोजन न करे। अपनी बहिन न हो तो गुरु की कन्या भी बहिन … Read more

इक्कीसवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य

इक्कीसवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य राजा पृथु ने पूछा- हे नारदजी ! कृपा करके अन्नकूट तथा वर्धन का माहात्म्य कहिये। तब नारदजी कहने लगे कि कार्तिक सुदी एकम् को गोवर्धन पूजा तथा अन्नकूट होता है। इस दिन पृथ्वी पर गोबर का गोवर्धन बनाकर उसका पूजन करे फिर अन्नकूट बनावे पहले ब्राह्मणों को भोजन करावे, फिर स्वयं … Read more

बीसवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य

बीसवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य नारदजी कहने लगे कि हे राजा पृथु ! जो कार्तिक कृष्णा अमावस्या को दीपावली करता है वह कभी दरिद्री नहीं होता । इस सम्बन्ध में एक इतिहास सुनो। थुरसैन देश में सत्य शर्मा नाम का एक अत्यन्त दरिद्री ब्राह्मण रहता था। उसके मन में सदैव यही लालसा बनी रहती थी कि … Read more

उन्नीसवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य

उन्नीसवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य नारदजी कहने लगे कि राजा पृथु ! कार्तिक कृष्णा त्रयोदशी से शुक्ला द्वितीया तक यमराज को प्रसन्न करने के लिए दीपक जलाना चाहिए। इससे अकालमृत्यु आदि नहीं होती। चतुर्दशी को नरक चतुर्दशी भी कहते हैं। उस दिन तिल का तेल, अपामार्ग तथा दूर्वा आदि लगाकर स्नान करना चाहिए। स्नान के पश्चात् … Read more

अठारहवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य

अठारहवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य राजा पृथु नारदजी से पूछने लगे कि हे नारदजी! सब गोपियों में राधाजी ही श्रीकृष्णजी को अधिक प्रिय क्यों हैं तथा कार्तिक मास में भगवान् के साथ उनकी पूजा क्यों होती है ? यह सब कथा विस्तार पूर्वक हमसे कहिए। तब नारदजी कहने लगे कि पहले मन्वन्तर में पांचाल देश में … Read more

सत्रहवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य

सत्रहवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य सूतजी कहने लगे कि अब सब व्रतों में उत्तम व्रत और मोक्ष के देने वाले एकादशी के व्रत का माहात्म्य सुनो। एकादशी तिथि कृष्ण पक्ष की हो या शुक्ल पक्ष की, अन्न नहीं खाना चाहिए। जो एकादशी को अन्न खाता है वह पापों का भक्षण करता है। एकादशी का व्रत माता … Read more

सोलहवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य

सोलहवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य नारदजी कहते हैं कि अब मैं दीप दान तथा भगवान् के मन्दिर में मार्जन (झाड़ू) का वही माहात्म्य कहता हूं जोब्रह्माजी ने मुझे बताया था। पहले चन्द्र वंश में जयध्वज नाम का एक प्रभु भक्त राजा था। राजा स्वयं मन्दिर में जाकर मार्जन करता तथा दीप जलाता था। एक समय वीतिहोत्र … Read more

पन्द्रहवाँ अध्याय कार्तिक महात्म्य

पन्द्रहवाँ अध्याय कार्तिक महात्म्य राजा पृथु कहने लगे कि हे नारदजी ! भक्तवत्सल भगवान् की पूजा का इतिहास सुनाइये। तब नारदजी बोले कि हे राजन्! एक पुरातन इतिहास कहता हूं, सो सुनो। पहले चौल नाम का एक राजा कांतिपुर में राज्य करता था। उसके राज्य में कोई भी दुःखी, पीड़ित तथा दरिद्री नहीं था। सारी … Read more

चौदहवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य

चौदहवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य राजा पृथु कहने लगे कि हे नारदजी! आप सर्वज्ञ हैं, इसलिए संतान की वृद्धि करने वाला तथा सब प्रकार सुख देने वाला कोई व्रत कहिये। तब नारदजी ने कहा, हे राजन् ! इसके लिये मैं महाविद्या, महामाया, महामेधा, महास्मृति, महामोहा, महादेवी, महाईश्वरी तथा सर्व ईश्वरी अहोई देवी का व्रत तुमसे कहता … Read more