पेंतीसवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य
पेंतीसवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य पुण्य भी लगता है, या बिना दिया हुआ पुण्य मिलता है। तब सूतजी कहने लगे कि बिना दिये हुए भी पाप पुण्य दोनों मिलते हैं। सत्ययुग में एक के पाप और पुण्य के कारण सारे देश को पाप और पुण्य मिलता था। त्रेता में ग्राम को तथा द्वापर में कुल को … Read more