आठवाँ अध्याय श्रावण महात्म्य
आठवाँ अध्याय श्रावण महात्म्य ईश्वर ने कहा- सनत्कुमार! अब मैं आपसे पाप को नाश करने वाले बुध तथा बृहस्पति व्रत को कहूँगा, जिसे श्रद्धा के साथ करके प्राणी उत्तम सिद्धि प्राप्त करता है। ब्रह्मा ने इन्द्र को ब्राह्मण के राज्यासन पर अभिषिक्त किया। किसी काल में चन्द्रमा ने श्री बृहस्पति की ‘तारा’ नाम वाली पत्नी … Read more
तीसवाँ अध्याय माघ महात्म्य
तीसवाँ अध्याय माघ महात्म्य (माघ व्रत उद्यापन विधि) माघ मास में पूर्णिमा को प्रातःकाल गंगा, यमुना, सरस्वती के संगम में अथवा किसी भी नदी में स्नान करके एवं पवित्र होकर उसी क्षेत्र में एक मंडप बनाकर उसमें भगवान विष्णु की स्थापना करें – ब्राह्मण को बुलाकर गौरी गणेश तथा नवग्रह की स्थापना करके सत्यनारायण भगवान … Read more
उन्तीसवाँ अध्याय माघ महात्म्य
उन्तीसवाँ अध्याय माघ महात्म्य (प्रयाग महात्म्य) लोमश ऋषि बोले- हे ब्राह्मण! मैंने पुनीत फल वाले इतिहास आपके सामने वर्णन किये हैं, अब तेरे पुत्र और गन्धर्व कन्याओं को उचित है कि वे पिशाच योनि से मुक्त होने के लिए मेरे साथ प्रयाग जाएँ। वहाँ देवताओं को भी दुर्लभ माघ स्नान होगा। वहाँ स्नान करने पर … Read more
अट्ठाईसवाँ अध्याय माघ महात्म्य
अट्ठाईसवाँ अध्याय माघ महात्म्य सारस ने कहा वानर ! तेरा प्रश्न न्याय संगत है। जिस कर्म के कारण मुझे यह कष्टदायी पक्षी की योनि प्राप्त हुई है, उस रहस्य को सुन । पूर्व जन्म में तूने सूर्य ग्रहण के समय सौखारी अन्नदान किया और नर्मदा के तट पर बसे ब्राह्मणों को देने के लिए मुझसे … Read more
सत्ताईसवाँ अध्याय माघ महात्म्य
सत्ताईसवाँ अध्याय माघ महात्म्य ब्राह्मण ने पूछा- हे प्रेत! तूने सारस से जो वचन सुने हैं। वह मुझसे कहो। प्रेत बोला-हे विप्रवर! इसी खण्ड के समीप गुहिका नामक एक नदी है। यह नदी पहाड़ी के समीप है, उसमें से अथाह निर्मल जल रहने के कारण बड़ी-बड़ी लहरें उठा करती हैं। उनके किनारे हाथियों के झुण्ड … Read more
छब्बीसवाँ अध्याय माघ महात्म्य
छब्बीसवाँ अध्याय माघ महात्म्य देवद्युति ने कहा इस पवित्र कथा को ध्यान से सुनो। एक समय केरल प्रदेश में एक वेदज्ञ ब्राह्मण निवास करता था । उसका नाम वसु था। उसके बन्धु-बान्धवों ने जब उसका धन हरण कर लिया तो वह केरल छोड़कर चल दिया। जगह-जगह मारा-मारा फिरा, मगर कहीं उसकी उदर पूर्ति न हो … Read more
पच्चीसवाँ अध्याय माघ महात्म्य
पच्चीसवाँ अध्याय माघ महात्म्य लोमश जी बोले- हे ब्राह्मण! इस पिशाच के इस करुण क्रन्दन को देवद्युति ने उपासना करते समय सुना। वे बैठे न रह सके और तब वे इस आश्रम से निकलकर उस पिशाच के सम्मुख गये। भयानक आकार और क्रूर आकृति वाले पिशाच को इस प्रकार दहाड़ मारकर रोते देखा। इसके गाल … Read more
चौबीसवाँ अध्याय माघ महात्म्य
चौबीसवाँ अध्याय माघ महात्म्य लोमशजी बोले- जिस वन में पिशाच को मोक्ष हुआ था, उसका द्रविण राजा चित्र था । वह परम वीर, पराक्रमी, शास्त्रों का ज्ञाता और एश्वर्यवान था। स्वर्ण, रत्न से उसका कोष भरा रहता था। उसके सहस्त्रों पटरानियां थीं। वह स्त्रियों के वशीभूत रहता, कामुक, लोभी एवं महा क्रोधी था । वह … Read more
तेईसवाँ अध्याय माघ महात्म्य
तेईसवाँ अध्याय माघ महात्म्य वेदनिधि बोला- हे महर्षि! आपने इस पावन प्रसंग को सुनाकर हम सभी पर बहुत उपकार किया है। अब आप कृपा करके उस स्तोत्र को सुनाये जिससे भगवान श्रीहरि ने प्रसन्न होकर देवद्युति को दर्शन दिए थे। तब लोमश जी ने कहा- हे ब्राह्मण! सुपात्र को धर्मोपदेश करने से जो प्रसन्नता होती … Read more