उन्तीसवाँ अध्याय माघ महात्म्य

उन्तीसवाँ अध्याय माघ महात्म्य

(प्रयाग महात्म्य) लोमश ऋषि बोले- हे ब्राह्मण! मैंने पुनीत फल वाले इतिहास आपके सामने वर्णन किये हैं, अब तेरे पुत्र और गन्धर्व कन्याओं को उचित है कि वे पिशाच योनि से मुक्त होने के लिए मेरे साथ प्रयाग जाएँ।

वहाँ देवताओं को भी दुर्लभ माघ स्नान होगा। वहाँ स्नान करने पर ये सब इस पिशाच योनि से मुक्त होंगे। ऋषि के इन वचनों द्वारा अपनी मनोकामना पूर्ण होते देख वे पिशाचिनियाँ और पिशाच सहर्ष उनके साथ प्रयाग के त्रिवेणी जल में स्नान करने हेतु जाने को तैयार हो गये ।

ऋषि उन सबको साथ लेकर आकाश मार्ग द्वारा प्रयाग की ओर चले। वशिष्ठ बोले- हे दिलीप ! अब तुम गंगा और यमुना के महात्म्य को सुनो। आकाश मार्ग से जाते हुए लोमश ऋषि ने सबको सम्बोधित करते हुए कहा- तीर्थराज प्रयाग को प्रणाम करो।

वैसे तोबिना ज्ञानधारण किए प्राणी भी प्रयाग राज के त्रिवेणी जल में माघ स्नान करके मोक्ष को प्राप्त कर लेते हैं।

इसी प्रयाग राज क्षेत्र में ब्रह्माजी ने सृष्टि रचना के लिए वह महान यज्ञ किया था और महान शक्ति प्राप्त की थी जिनके द्वारा वे सृष्टि की रचना कर सके।

स्वयं भगवान विष्णु ने भार्या की मनोकामना करके इस गंगा यमुना संगम के जल में स्नान किया था, तभी अमृत मन्थन के समय उनको लक्ष्मी भार्या प्राप्त हुई थी

शिव ने इसी त्रिवेणी के सेवन द्वारा त्रिपुर दैत्य का वध करने की शक्ति प्राप्त की थी इसी स्थान पर तैंतीस कोटि देवताओं की तृप्ति हुई थी।

यही योग स्वरूप जनार्दन भगवान का सुख है, जहाँ प्रलय के समय मार्कण्डेय ऋषि ने हरण ग्रहण की थी । समस्त पापों को हरण करने वाला यह जमुना जी हैं यहाँ स्नान करने वाले निष्पाप होते हैं। सभी को मुक्ति प्राप्त होती है।

इस विषय में एकइतिहास को सुनो। किसी समय ऋचीक ऋषि ने एक गंधर्व को श्राप दिया और वह काक हो गया।

उस गंधर्व ने काक होते ही तुरन्त इस त्रिवेणी के जल में स्नान कर डाला, उसके प्रभाव से वह श्राप से मुक्त हो गया।

इसी प्रकार जब इन्द्र द्वारा श्राप प्राप्त कर उर्वशी इन्द्र लोक से गिरी उसने भी स्नान कर अपने को तुरन्त श्राप मुक्त कर लिया था। नहुष के पुत्र ययाति ने इस त्रिवेणी स्नान के द्वारा पुत्र प्राप्त किया था।

इन्होंने धन एवं पुत्र की कामना से त्रिवेणी स्नान किया। कश्यप जी ने यहाँ तप किया। भारद्वाज ने यहीं सिद्धियाँ प्राप्त की।

सनकादिक ऋषि यहाँ के सेवन द्वारा महान योगी बनें, जो माघ स्नान इस स्थान पर करते हैं, वे कीर्तिमान नक्षत्र बनकर प्रकाश में सदैव ज्योतिमान रहते हैं।

जो जैसी कामना से यह स्नान करता है, वैसा ही फल प्राप्त करता है । अतः अब सब अपने पापों से मुक्ति की कामना करके स्नान करो।

उन्होंने पापों से मुक्त होने के लिए त्रिवेणी में स्नान किया। स्नान करते ही वे उस पिशाच योनि से मुक्त हो गये । वे अपने दिव्य देह को प्राप्त हुए।

तब वेद निधि ने लोमश से कहा- हे मुने! आपकी कृपा से यह सब श्राप से मुक्त हुये हैं। अब आप उपदेश दें। लोमश जी बोले- तुम्हारा पुत्र विद्या अध्ययन समाप्त कर चुका है।

युवा है और यह कन्यायें भी इस पर मोहित हैं, अतः इनका विवाह हो जाना चाहिए। ऋषि के वचन मानकर उस ब्राह्मण पुत्र ने उन कन्याओं का वरण कर लिया।

उन सबने लोमश जी को प्रणाम किया और ऋषि उन्हें आशीर्वाद देकर आश्रम चले गये। हे राजन्! इस प्रकार वह ब्रह्मचारी उन पांचों गन्धर्व कन्याओं को साथ लेकर पिता के साथ घर चला गया।

जो प्राणी इस पवित्र माघ मास महात्म्य को पढ़ता और सुनता है। उसकी समस्त पापों से मुक्ति होती है। उसकोमनोवांछित फल प्राप्त होते हैं और वह बैकुण्ठ को जाता है।

इस इतिहास को सुनाने वाले द्विज का पूजन करके यथाशक्ति दक्षिणा देकर सन्तुष्ट करना चाहिये। ऐसा प्राणी सुखी रहता है।

हर प्राणी को चाहिये कि वह अपने जीवन काल में कम से कम एक बार तीर्थराज प्रयाग में जाकर त्रिवेणी का स्नान मकर संक्रान्ति के दिन माघ मास में अवश्य करें,

ताकि उसके भूतकाल में हुए पापों से छुटकारा मिल सके और भविष्य उज्जवल हो सके । स्नान के पश्चात् यथाशक्ति सोना, चांदी, रुपया, अन्न, गुड़, तिल आदि का दान अवश्य करें, तभी स्नान दान का पुण्य फल मिलता है।

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