ग्यारहवाँ अध्याय श्रावण महात्म्य

ग्यारहवाँ अध्याय श्रावण महात्म्य

श्रावण महीने की प्रतिपदा तिथि सोमवार युक्त हो तो उस महीने में पांच सोमवार होंगे ऐसे योग का ‘रोटक व्रत’ नाम होगा।

उस दिन प्राणी व्रत करे। या साढ़े तीन महीने का भी रोटक व्रत होता है। यह रोटक व्रत लक्ष्मी की वृद्धि करने वाला संपूर्ण कामनाओं और सिद्धि को देने वाला होता है।

हे मुने! मैं उस विधान को कहूँगा, आप एकाग्र मन से सुनें। श्रावण महीने के शुक्लपक्ष में प्रतिपदा सोमवार के दिन सुबह उठकर ज्ञानी ‘रोटक व्रत’ का संकल्प करे।

हे सुरश्रेष्ठ! आज से मैं रोटक व्रत करूँगा । हे जगद्गुरो ! मुझ पर आप कृपा करें। यो संकल्प कर प्रतिदिन शिव का अर्चन करे।

मुख्य रूप से रोटकों का नैवेद्य विशेष समर्पण करे। पुरुषाहार नाम से पांचरोटक ब्राह्मण को उनमें से दे दो, रोटक आप भोजन करे।

एक रोटक नैवेद्यार्थ शिव को सदा दे। जो सात सागर के सहित भूमि दान करता है तो उसका जितना फल होता है,

वह इस व्रत के सविधि करने मात्र से प्राप्त कर लेता है। अतुल धनार्थी पांच साल तक इस व्रत को करे | उद्यापन में सोने के दो रोटक बनावे।

पहले रोज अधिवासन कर अन्य रोज सुबह शिवमन्त्र द्वारा घी तथा सुन्दर बिल्वपत्र से होम करे। हे तात! इस प्रकार व्रत करने पर सब कामना प्राप्त कर लेता है।

हे सनत्कुमार! अब द्वितीय का शुभ व्रत कहूँगा । जिसे श्रद्धा से करने वाला प्राणी लक्ष्मीवान तथा पुत्रवान हो जाता है।

वह ‘औदुम्बर’ नामक व्रत सब पापों का नाश करने वाला है। ज्ञानी श्रावण महीने के आ जाने पर शुभ तिथि द्वितीया में सुबह संकल्प कर विधिवत व्रत करे।

जो स्त्री-पुरुष इस व्रत को करेंगे वे सब संपत्तियों के अधिकारी होंगे। इसमें साक्षात गूलर ( उदुम्बर) का अर्चन करे ।

गूलर न मिल सके तो दीवाल में गूलर वृक्ष के चित्र को बनाकर चार नाम मन्त्रों से अर्चन करे। ‘हे उदुम्बर! आप को नमस्कार है।

हे हेमपुष्पक! आपको नमस्कार है। जन्तु फल युक्त लाल अण्ड तुब्य शलियुक्त आपको नमस्कार है । यों अर्चन कर उसमें शिव तथा शुक्र का अर्चन करे।

गूलर के तैतीस फलों का तीन हिस्सा करें। जिनमें से ग्यारह फल ब्राह्मण को तथा ग्यारह फल देवता को दे और आप ग्यारह फल ग्रहण कर भोजन करे।

उस दिन अन्न का आहार न करे। रात में शिव और शुक्र का अर्चन कर जागरण करे। हे तात! इस तरह ग्यारह साल व्रत करें।

साल समाप्ति पर उद्यापन करे। विधान के अनुसार ब्राह्माणों को भोजन करावे। हे वत्स! इस तरह व्रत करने से जो फल होता है उसको मैं कहता हूँ, सुनो।

जैसे यह पेड़ बहुत जीव तथा फलों से युक्त है। वैसे ही साधक बहुत पुत्रों वाला हो तथा उसके वंश की वृद्धि हो ।

जैसे सोने के फूलों से युक्त पेड़ है, वैसे व्रती भी लक्ष्मीवान हो। अद्यावधि मैंने इस व्रत को किसी से नहीं प्रकाशित किया ।

गोपनीय से भीगोपनीय इस व्रत को आप से कहा, इसमें संशय नहीं करना चाहिए। इस व्रत को भक्ति से करे।

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