चौदहवाँ अध्याय माघ महात्म्य

चौदहवाँ अध्याय माघ महात्म्य

विकुण्डल बोला- हे सौम्य! आपने जो धर्म ज्ञान दिया है उसे सुनकर मैं बड़ा प्रसन्न हूँ जिस प्रकार साधु के वचन पाप को नष्ट करने वाले होते हैं, उसी प्रकार आप के इस उपदेश से मेरे मन का अज्ञान नष्ट हो गया है।

जिस तरह चन्द्रमा अमृत वर्षा करता है, उसी प्रकार सज्जन उपदेश करते रहते हैं । हे नाथ! अब कृपा करके वह उपाय बताइये जिससे मेरा भाई कुण्डल उस घोर नरक से मुक्ति प्राप्त कर सके।

भगवान दत्तात्रेय जी बोले- राजन् वह देवदूत बड़ा दयालु था। उस वैश्य पुत्र के उन वचनों को सुनकर उसने एक एक क्षण तक अपनी दिव्य दृष्टि से ध्यान किया और फिर कहा- हे वैश्य पुत्र !

यदि तुम वास्तव में अपने भाई से स्नेह करके उसे नरक यातना से मुक्त करना चाहते हो तुम अपने आठ जन्म का पुण्य उसे दे डालो, तब विकुण्डल ने पूछा वह पुण्य क्या था? पूरे वृतांत को विस्तार से कहो।

मैं आपके कहे अनुसार उसे भाई को अवश्य दे दूँगा । देवदूत बोला प्राचीन समय में मसु वन में शालकी ऋषि निवास करते थे । वे ब्रह्माजी के समान सम्पन्न थे। उनकी पत्नि रेवती के नौ पुत्र थे, परम तेजस्वी थे।

उनमें से पाँच ध्रुव, शशी, बुध, तार और ज्योतिष्मान् अग्नि होत्र करने वाले गृहस्थ थे। शेष चार निमोह, जितमाय ध्यान काम और गुणपति विरक्त हुये । वे चारों समस्त ओर से विरक्त होकर सन्यासी बनकर एक गांव में रहने लगे।

वे सदैव भगवान विष्णु के चरण कमलों का ध्यान करते हुए भोजन, शयन, निद्रा, वस्त्र आदि सभी को त्याग करते हुये जीवन व्यतीत करने लगे। उन्होंने सब कर्म त्याग दिये, चराचर का विष्णुमय देखते रहते।

उस समय तुम मत्स्य देश के रहने वाले गृहस्थ ब्राह्मण थे। विचरण करते हुए वे योगी दोपहर को तुम्हारे घर आ पहुँचे उनके स्वरूप को जान तुमने उन्हें दण्डव्रत प्रणाम किया और चरण स्पर्श करते हुये मधुर वचनों में कहा- भगवान विष्णु की कृपा से मेरा जीवन सफल हो गया जो आपके दर्शन प्राप्त हुए ।

तब तुमने स्नेह के वशीभूत होकर उनके चरण धोये और चरणामृत पान किया । उन सन्यासियों के चरणामृत के प्रभाव से तुम्हारे सात जन्म के पाप एक दम नष्ट हो गये। वे परम हंस रात्रि को तुम्हारे ही घर विश्राम करते हुए विष्णु चरणों के ध्यान में मग्न रहे।

उनके सत्कार से तुमको जो पुण्य प्राप्त हुआ, उनका वर्णन सहस्त्र मुखों से भी नहीं किया जा सकता है । भूतों से प्राणी, प्राणियों से बुद्धिमान, उनसे मनुष्य और मनुष्यों में ब्राह्मण श्रेष्ठ है ।

ब्राह्मणों में बुद्धिमान, विद्वानों में कृतबुद्धि उसके क्रियात्मक और उनके ब्रह्मा वेका श्रेष्ठ है । ब्रह्मा वेका तीनों लोकों में श्रेष्ठ है । वह सदैव पूजा जाता है, उसके दर्शनमात्र से प्राणी के समस्त पाप नष्ट होते हैं । यही तुम्हारे आठवें जन्म का पुण्य है।

इतना सुन विकुण्डल ने अपने भाई के लिए अपने उन पुण्यों को दे दिया । उसका भाई नरक से छूटकर उससे आ मिला। वे दोनों दिव्यलोक के सुखों को भोगने लगे । इस इतिहास को पढ़ने और सुनने से सभी पाप नष्ट होते हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *