छब्बीसवाँ अध्याय माघ महात्म्य

छब्बीसवाँ अध्याय माघ महात्म्य

देवद्युति ने कहा इस पवित्र कथा को ध्यान से सुनो। एक समय केरल प्रदेश में एक वेदज्ञ ब्राह्मण निवास करता था । उसका नाम वसु था।

उसके बन्धु-बान्धवों ने जब उसका धन हरण कर लिया तो वह केरल छोड़कर चल दिया। जगह-जगह मारा-मारा फिरा, मगर कहीं उसकी उदर पूर्ति न हो सकी।

अन्त में रोगों से पीड़ित होकर वह वन में चला गया। तीर्थयात्रा करते-करते वह बहुत कृश हो गया और दैवात एक दिन विन्ध्याचल पर्वत पर भूख और प्यास से तड़पकर उसका प्राणान्त हो गया।

उसकी अन्त्येष्टि विधिपूर्वक न हो सकी, इसी कारण उसी वन में प्रेत बनकर वास करने लगा । वह इस प्रेत योनी को पाकर बहुत दुःखी रहता था।

चारों दिशाओं में हा-हाकार करता हुआ अपनी मुक्ति का मार्ग खोजता फिरता था। उसने धर्मानुकूल कोई ऐसा कर्म नहीं किया था, जिससे उसकी मुक्ति हो सकती।

जो दान नहीं करता, जो यज्ञ, विष्णु पूजन, तीर्थ स्नान, भजन, कीर्तन नहीं करता, उसकी मुक्ति कैसे हो? जो ब्राह्मण अथवा स्त्रियों का धन हरण करते हैं, वे मुक्ति नहीं पाते।

जो जुए, कपट व्यवहार, ठगी, चोरी, झूठ आदि से उदर पूर्ति करते हैं, वे सदैव दुःखी रहते हैं। जो स्त्री, बालक, वृद्ध, विधवा पर अत्याचार करते हैं, महान पाप के भागी होते हैं।

गौ वध कराने वाले, पृथ्वी हरण करने वाले, चुगली करने वाले, निन्दक, हिंसक, निकृष्ट दान को प्राप्त करने वाले होते हैं, वे ही जीव अपने इन पापों के कारण प्रेत, पिशाच, राक्षस, कीट, पतंग आदि इन निकृष्ट योनियों को प्राप्त होते हैं ।

उन्हें इस लोक तथा परलोक में कहीं सुख नहीं प्राप्त होता है । प्राणी को इसलिये अपने धर्म का पालन करना ही श्रेष्ठ है । हे पिशाच! उस प्रेत ने एक दिन उस पर्वत पर एक पथिक को जाते देखा ।

वह त्रिवेणी के जल से दो गागर भरी कंधों पर लादे था और मधुर तान से विष्णु भगवान की महिमा गाता चला जा रहा था। तब उस प्रेत ने भयानक रूप में उसके आगे जाकर मार्ग रोकते हुये कहा-हे पथिक!

भय मत करो। मैं बहुत अधिक प्यासा हूँ। मुझे थोडा सा जल पिला दो अन्यथा मेरे प्राण निकल जायेंगे। पथिक ने कहा-अरे तू कौन सा जीव है? तेरी आकृति भयंकर है।

मगर फिर भी दुबला और परेशान सा दिखाई देता है । तब प्रेत ने कहा- हे धर्मात्मा! मैं प्रेत हूँ। पूर्व जन्म में मैं एक उत्तम कुल का ब्राह्मण था,

परन्तु लोभी होने के कारण मैंने कभी दान नहीं किया, इसी कारण मैं इस प्रेत योनि को प्राप्त हुआ हूँ। मैं सदैव पेटू रहा, कभी दान तक नहीं दिया, न कभी भोजन से पहले प्रभु का भोग ही लगाया,

न प्यासे को जल पिलाया, न कभी पितरों का तर्पण किया, न कभी श्राद्ध किया, न कभी देव पूजन किया, मैंने कोई दान, तप, यज्ञ, स्नान, तीर्थ भ्रमण ऐसा नहीं किया, जिसका फल मुझे प्राप्त होता ।

कभी रात्रि में जागरण करके ईश्वर वन्दना नहीं की। हे विप्र ! इस प्रकार के निकृष्ट कर्म करने से मेरी यह दुर्दशा हुई है।

आज मैं भली प्रकार से समझ चुका हूँ कि प्राणी को भूलकर भी विष्णु भगवान के चरणों और वेदोक्त धर्म को नहीं त्यागना चाहिये। मेरे पूर्व जन्म के पापाचार के द्वारा मेरा ज्ञान नष्ट हो गया है।

वैसे इस वन में शेर, चीतों द्वारा मारे गये अनेकों जीवों का खाने योग्य माँस पड़ा है। इस वन में पक्षियों द्वारा कुतरकर फेंके गये अनेक स्वाद युक्त फल मौजूद हैं,

यहाँ से सातों सरोवरों में भी पीने लायक मीठा जल मौजूद है। ये सब होने पर मैं अभागा उनका उपयोग नहीं कर सकता हूँ। मैं केवल वायु पीकर सर्पों की तरह जीवित हूँ।

कोई भी प्राणी परमेश्वर की बिना कृपा के बल, बुद्धि पुरुषार्थ, पराक्रम, मित्र, लाभ, सुखी जीवन, भोग एवं मोक्ष नहीं प्राप्त कर सकता।

भगवान की कृपा से ही कुरूप, नीच, कुलोत्पन्न, मूर्ख, कुत्सित, परनिन्दक, शूरता से हीन, कान, गंजे, भौंड़े, नीतिहीन, दुर्गुण, डरपोक, नपुंसक तक राज सुखों का भोग करते हैं।

जिन प्राणियों ने अष्ट वर्षा, गोरी कन्या, धरती, शैय्या, आसन, स्थान, मकान, धन, भोजन, अन्न, चंदन, धूप, गुड़, तिल, गौए, स्वर्ण, छाता आदि दान किए हैं,

वे सभी जगह घर एवं बाहर नाना प्रकार के भोगों को भोगते रहते हैं । आप तो भगवान के भक्त हो, आपके शरीर की रक्षा तो स्वयं विष्णु भगवान की भक्ति करती है।

यही कारण है कि प्रेत, दैत्य, राक्षस, पिशाच, भूत, बेताल, पूतना, गन्धर्व, शकुनि, आथक, ग्रहण आदि भक्तजनों को न देख सकते हैं, न स्पर्श ही करते हैं।

रेवतियें, वृद्धरेवितिये, मुख मण्डीग्रह, यज्ञ, बालग्रह, क्रूर, दुष्ट बुद्धिग्रह, मातृग्रह, भयानक ग्रह, विनायक, कृत्या हर्पे, कूप्प्राण्ड आदि अन्य सभी ब्रह्म वादी वैष्णवों की ओर देख तक नहीं सकते हैं।

जिनके हृदय में सदैव हरि चरणों का ध्यान है, जिनकी जिह्वा पर गोविन्द नाम है, उनकी रक्षा सभी शुद्ध ग्रह, देवता एवं नक्षत्र करते हैं। आप इस कारण निडर रहें । हे देव!

मैं अपने कर्मों का फल भोगता हुआ इस जवातिना नदी के तट पर विचरण करता रहा हूँ। मैंने इसी नदी के तट पर विचरते हुये एक सारस के वचन सुने थे ।

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