तेईसवाँ अध्याय माघ महात्म्य

तेईसवाँ अध्याय माघ महात्म्य

वेदनिधि बोला- हे महर्षि! आपने इस पावन प्रसंग को सुनाकर हम सभी पर बहुत उपकार किया है। अब आप कृपा करके उस स्तोत्र को सुनाये जिससे भगवान श्रीहरि ने प्रसन्न होकर देवद्युति को दर्शन दिए थे।

तब लोमश जी ने कहा- हे ब्राह्मण! सुपात्र को धर्मोपदेश करने से जो प्रसन्नता होती है, वही मुझे प्राप्त हुई है। अब तुम उस पावन स्तोत्र को सुनो, जिस स्तोत्र से देवद्युति ने भगवान को प्रसन्न किया था।

वह सर्वप्रथम भक्तराज गरुड़ को प्राप्त हुआ था। गरुड़ जी से मुझे मिला। वह है – हे विश्वस्वरूप, चक्रधारी, भक्तिप्रिय, दयावतार कृष्ण वासुदेव आपको नमस्कार है ।

आप ही स्तुति योग्य एवं स्तुति स्वरूप आप स्वयं ही है। सारा जगत् ही विष्णुमय है भक्ति ही आनन्ददात्री है जिनके श्वासों से साग एवं सूत्रयुक्त वेदों की उत्पत्ति हुई हो उनकी प्रसन्नता हेतु स्थान पर हम भक्ति ही प्रकट करते हैं।

वेद भी जिसे नेति कहते हैं, जो वाणी एवं उनसे अगोचर है, उस प्रभु की स्तुति करना किसी की सामर्थ्य नहीं । त्रिदेव आप स्वयं है। ब्रह्मा बनकर उत्पन्न करते हो, विष्णु रूप में पालते हो और शिवरूप से संहार करते हो। आप ही परब्रह्म हो ।

हे महायोगी! आपको बारम्बार नमस्कार है। आप सदैव ज्योतिमान हैं। आप ही सुख और आनन्द को देने वाले हैं।हे प्रभो! आप चराचर के स्वामी हो । आप तो कल्पना मात्र से ही सृष्टि उत्पन्न करने वाले हो ।

समस्त दोष, विकार रूप आदि सभी से परे रहने वाले, हे देव! आपको कोटि- कोटि प्रणाम है। जिनकी इच्छा मात्र से जगत् में चेतना रहती है, योगी जिसके सत्य स्वरूप , का ज्ञान से ध्यान करते हैं, द्विज श्रेष्ठ जिसे ‘अहं ब्रह्मास्मि कहकर जप करते हैं ।

हे विष्णु ! आपको बारम्बार प्रणाम है। जो प्रभु माया द्वारा उत्पन्न प्राणी के अहं, ममता, अज्ञान, पाप आदि का नाश करता है, उसे प्रणाम है। जिनके मुख से हर क्षण भगवान ही का नाम निकलता है,

वे जो आपके चरणों को ही आश्रय बनाये बैठे हैं, जिनके स्मरण मात्र ही से प्राणी के समस्त बन्धन नष्ट होते हैं, उस अनन्त प्रभु को नमस्कार है। जिनकी कृपा मात्र से अज्ञानी आत्मा का ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं,

वासनाओं को त्याग देते हैं, नाम को आधार बना अपना जीवन आराधना में लगा देते हैं, उस प्रभु को नमस्कार है। विष्णु नाम ही शब्दार्थ एवं ज्ञानार्थ द्वारा सर्वमय है ।

वेद के नारायण ही ब्रह्माण्ड के पालक हैं । सत्य के आधार स्वरूप हे प्रभु! आपको नमस्कार है । जो धर्म रक्षार्थ जड़ चेतन में निवास करता है, जो धर्म रक्षार्थ अवतार धारण करता है,

जिसके ज्योति प्राणी मात्र में आत्मा स्वरूप विराजमान है, उन प्रभु को मेरा नमस्कार है ” हे सर्वज्ञ! आपने एक होते हुए भी अनेक स्वरूप देव रूपों में प्रगट किये, कण-कण में व्याप्त होते हुए भी प्राणी को माया में भरमा रक्खा है,

स्पष्ट रहने वाले प्रभु को मेरा नमस्कार है।”आपने ही जगत् की रचना की है, माया में पड़ा प्राणी आपके स्वरूप को नहीं पहचान सकता। चराचर और माया में रहते हुए भी आप सबसे अलग ही रहते हो, उन प्रभु को मेरा प्रणाम है।

चार्वाक पंचतत्वों के मिश्रण से उत्पन्न जिस चेतन की उपासना करते हैं, उसे सौगत तर्क द्वारा क्षण भंगुरा बुद्धि कहते हैं। जैन परिमाण स्वरूप मानते हैं। सोंख्य प्रकृति से अलग पुरुष हैं, उपनिषद समस्त आधार रहित मानती है। हे दिव्य पुरुष !

आपको प्रणाम है । समस्त चराचर के स्वामी मैं आपकी शरण हूँ । अग्नि, छवि, इन्द्र, हवन, यज्ञ, मंत्र, क्रिया, फल सभी कुछ आप ही आस्ति नास्ति हैं । समस्त जगत् के कारण रूप आप ही मेरे आश्रय हो।

आपकी भक्ति में मैं रम चुका हूँ आपकी शरण में आया महानतम् पापी भी पाप मुक्त हो जाता है । प्राणी की उस समय तक मुक्ति नहीं होती है, जब तक आपकी शरण में नहीं आता। आपका स्पर्श असम्भव है,

संग और मोह से रहित मुनिजन ही आपको पाते हैं, ऐसे दयालु भगवान आप को नमस्कार हैं। प्रभु कृपा से प्राप्त सुख सौभाग्य, एश्वर्य, मोक्ष एवं लक्ष्मी प्राप्त होती हैं । इन सभी के स्वामी प्रभु को नमस्कार है ।

जन्मादि भावों से रहित काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, द्वेष से दूर रहने वाले हरि को नमस्कार है। जो भगवान अज्ञान, अविधा, पाप का नाश करने में समर्थ हैं, उस प्रभु को नमस्कार है ।

चराचर में व्याप्त सत्य रूप मुझ पर प्रसन्न होकर मुझे दर्शन दें ।हे विप्र! इस स्तोत्र के पाठ द्वारा ही देवद्युति ने भगवान को प्रसन्न कर दर्शन प्राप्त किए थे। वह इसी स्तोत्र का पाठ करता रहा।

इस स्तोत्र के श्रवण अथवा कीर्तन से प्राणी को अश्वमेघ यज्ञ के फल की प्राप्ति होती है। ब्राह्मण को आत्म विद्या की प्राप्ति होती है। प्राणी की समस्त इन्द्रियां स्वस्थ होती हैं और समस्त पाप नाश होते हैं,

प्राणी को बैकुण्ठ की प्राप्ति होती है, नित्य पाठ करने से पुत्र, पौत्र, पौत्रधन, आदि की वृद्धि होती है, धर्म. अर्थ काम, मोक्ष में से इच्छित कामना प्राप्त होती है। इसे श्रवण करने से बुद्धि निर्मल होती है।

पापों का नाश होता है, दुष्ट ग्रहों की शान्ति होती है समस्त व्यापि स्वतः नष्ट होती है । द्विजातियों को इसका पाठ अवश्य | करना चाहिये ग्रह, नक्षत्र, राजा एवं चोरों के भय से मुक्त होने के लिए इस का पाठ अवश्य करें।

इसके पाठ से भूत-प्रेत आदि का भय नष्ट होता है, वह निर्विकार रहित होता है। प्राणी की सारी चिन्तायें दूर होती है । “इसे पवित्र योग सार स्तोत्र कहते है ।’ प्रतिदिन इसका पाठ करने से प्राणी दोनों लोकों में सुख पाता है वह अंत समय बैकुण्ठ को जाता है, यही पापनाशक स्तोत्र है ।

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