तेरहवाँ अध्याय माघ महात्म्य

तेरहवाँ अध्याय माघ महात्म्य

यमदूत बोला- एकादशी व्रत समस्त व्रतों में श्रेष्ठ है। इस व्रत के करने से सारे पाप नष्ट होते हैं। सहस्त्रों अश्वमेध, राजसूर्य यज्ञ भी एकादशी व्रत के समान फल नहीं दे पाते । समस्त इन्द्रियां द्वारा किए गये पाप इस व्रत से नष्ट हो जाते हैं।

इस व्रत के समान फल देने वाला कोई श्रेष्ठ व्रत नहीं है । किसी भी नदी अथवा किसी भी तीर्थ का फल एकादशी व्रत के समान कोई भी व्रत नहीं है। जो एकादशी व्रती रात्री को जागरण करते हैं, वह माता-पिता और स्त्री के दस-दस कुलों को तार देते हैं, वह विष्णु लोक जाता है ।

परम पातको भी एकादशी व्रत के प्रभाव से दिव्य लोक की प्राप्ति करता है। जो तीन रात्रि का उपवास और माघ स्नान के बाद स्वर्ण, तिल, गौदान करता है। वह स्वर्ग पाता है | हे वैश्य! मैं तुमसे संक्षेप में नरक से अलग रहने का धर्म कहता हूँ ।

प्राणी को कभी किसी से द्रोह नहीं करना चाहिए । इन्द्रियों को वश में रखे, दान देता रहे, भगवान की सेवा करें, उचित प्रकार से वर्णाचार एवं आश्रम धर्म का पालन करें, यथाशक्ति वस्त्र, छाता, अन्न, जल, फल, धन का दान करें।

धनी होने पर नित्य दान से बड़ा कोई धर्म नहीं है । शक्ति के अनुसार प्रसन्नतापूर्वक दिया गया दान सदैव फलदायक होता है।

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