ध्यानू भक्त का शीश अर्पण करना

ध्यानू भक्त का शीश

ध्यानू भक्त

ध्यानू भक्त का शीश अर्पण करना – एक प्राचीन कथानुसार जब माता के परम भक्त ध्यानू १००० साथियों के दल सहित दिल्ली से ज्वाला माई के दर्शन के लिए जा रहे थे तो इतने बड़े दल को देखकर अकबर बादशाह के सिपाहियों ने सन्देहवश उन्हें रोक लिया और बादशाह के सामने पेश किया गया।

अकबर के पूछने पर ध्यानू भक्त ने बताया कि माता ज्वाला के स्थान पर बिना किसी तेल अथवा इंधन की सहायता से अखण्ड ज्योति प्रज्वलित रहती है तथा माता ही सम्पूर्ण संसार की पालन करने वाली एवं सर्वशक्तिमान हैं।

बादशाह को विश्वास न हुआ। उसने परीक्षा के लिए ध्यानू के घोड़े का सिर काट दिया और कहा कि तुम्हारी माता में यदि कोई शक्ति है तो सिर जुड़वा दो।

कोई उपाय न देखकर ध्यानू भक्त ने ज्वाला देवी पहुंचकर माता का जागरण व प्रार्थना की कि भक्त की लाज रखने के लिए घोड़े का सिर जोड़कर चमत्कार प्रकट करें।

काफी प्रार्थना करने पर भी जब भक्त को कोई उत्तर न मिला तो उसने अपना शीश भी अपनी तलवार से काटकर माता को अपर्ण कर दिया।

उसी समय माता ने कन्या रूप में प्रकट होकर बाल भैरव व हनुमान जी सहित साक्षात दर्शन दिए और ध्यानू का कटा हुआ शीश भी माता की कृपा से फिर जुड़ गया।

इधर दिल्ली में मरा हुआ घोड़ा भी जी उठा।

अकबर आश्चर्यचकित रह गया, पर अहंकारवश उसने ज्योति को बुझाने के कई असफल प्रयत्न किए। पवित्र ज्योति के ऊपर लोहे के मोटे-मोटे तवे रखवा दिये गए, फिर पानी की नहर का बहाव उस ओर मोड़ दिया गया ताकि ज्योति पर निरन्तर पानी गिरता रहे।

फिर भी ज्योति का जलना बन्द नहीं हुआ। अन्त में अहंकार टूटने पर उसने सवामन शुद्ध सोने का छत्र चढ़ा कर माता से क्षमा मांगी।

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