बाईसवाँ अध्याय माघ महात्म्य

बाईसवाँ अध्याय माघ महात्म्य

लोमशजी ने कहा- एक समय देवद्यूति नामक वैष्णव ब्राह्मण था । उसने पिशाच को मुक्ति दिलायी।वेद निधि ने पूछा- हे मुने! देवद्युति कौन था और बताइए कि उसने किस पिशाच को किस तरह से मुक्ति दिलायी ?

लोमश जी बोले – हे विप्र ! देवद्युति का आश्रम सरस्वती के तट पर था। वहाँ सभी तरह के पवित्र वृक्ष थे। इस प्रकार फल फूल वाले वृक्षों, पौधों एवं लताओं के होने से वह स्थान अति रमणीक बन गया था।

सुन्दर कुंजों के होने से आश्रम के आसपास सदैव सुन्दर पक्षी मंडराते रहते थे। छोटे-छोटे पशु घूमते रहते थे। वहाँ का वातावरण परम शान्त एवं मनोहर था ।

देवद्युति के पिता ने उग्र तपस्या के द्वारा भगवान विष्णु को प्रसन्न करके इस पुत्र को वर द्वारा प्राप्त किया था । देवद्युति परम धर्मात्मा श्रेष्ठ ब्राह्मण था ।

वह नियमपूर्वक गर्मी में तपते हुए सूरज की ओर नेत्र करके पंचाग्नियों को प्रज्वलित कर तप करता, मूसलाधार वर्षा के समय बाहर खुले स्थल पर कड़कड़ाती बिजलियों के मध्य तप करता,

पौष मास को कड़कड़ाती शीत में सरस्वती सरोवर के शीत जल में तप करता रहता था। वह परम तपस्वी था । उनका समय हरि आराधना, अग्नि होत्र, अतिथि सेवा एवं तपस्या में ही व्यतीत होता था।

वह वेदज्ञानी अपने आप टूटकर गिरे फलों को बीनकर ही आहार करता था। इस प्रकार उसका शरीर कमजोर हो गया।इस प्रकार सहस्त्रों वर्ष व्यतीत हो गए, उस तपस्वी के प्रभाव से वह पर्वत तेज से चमकने लगा।

उसके तप तेज को सहने की शक्ति किसी में नहीं थी । उसके प्रसाद से वन के समस्त जीवों ने स्वभाविकाबैर त्यागदिये थे।

वह ब्राह्मण तीनों समय नियमपूर्वक नारायण का पूजन करता, हरि चरणों में ध्यान लगाकर सहस्त्रों सुगन्धपूर्ण खिले हुए कमल वेदमंत्रों का पाठ करता हुआ विष्णु के चरणों में अर्पित करता।

इन समस्त कर्मों के द्वारा वह भगवान विष्णु को प्रसन्न करता ।हे विप्र! महर्षि दधीचि के वरदान के कारण ही वह वैष्णव हुआ था। एक बार जब वह बैशाख की एकादशी को हरिपूजन करके स्तुति कर रहा था,

तो प्रसन्न हो देवाधि देव भगवान स्वयं गरुड़ पर चढ़कर उसके सम्मुख प्रगट हुए। मेघ के समान नीच क्रांति चतुर्भुज विशाल नेत्र, समस्त अलंकारों से विभूषित भगवान विष्णु को अपने सम्मुख खड़ा देख उस ब्राह्मण के नेत्रों में जल आ गया,

उसका मन हर्ष से विभोर हुआ, शरीर पुलकायमान हो गया और कृतार्थ हो ब्राह्मण प्रभु के चरणों में बारम्बार दण्डवत् प्रणाम करने लगा ।भगवान ने प्रसन्न होकर कहा- देवद्युति ! तुम मेरे परम भक्त हो ।

हे निष्पाप ! मैं तेरी तपस्या से प्रसन्न हूँ और तुझे वर देने के लिए आया हूँ जो चाहो वर मांग लो। प्रभु के वचन सुनकर उसने कहा हे प्रभो! आपके दर्शन से अधिक कोई वर नहीं।

योगी, भक्त एवं ज्ञानी , आपके दर्शन की कामना करते हैं आपके दर्शन मात्र से प्राणी के समस्त बन्धन कट जाते हैं। जब मुझे आपके दर्शन प्राप्त हो चुके तो अब और क्या वर मांगू ।

यदि हे स्वामी! आप मुझ पर प्रसन्न है और वर देना ही चाहते हैं, तब अपनी अचल भक्ति दें । एवमस्तु कहकर भगवान बोले- ऐसा ही होगा। तेरी भक्ति में कोई विघ्न नहीं होगा। तुम्हारी इस पवित्र कथा को जो भी कोई पढ़ेगा उसे मेरी भक्ति प्राप्त होगी।

उनके धर्म कार्य तथा इच्छा पूर्ण होंगे ।इतना कह भगवान अन्तर्धान हुये और देवद्युति उसी समय से नारायण के ध्यान में रम गये।

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