बृहस्पति ग्रह (देवगुरु)

बृहस्पति ग्रह सबका का गुरु है। बृहस्पति को कालपुरुष का ज्ञान माना गया है। ग्रहमंडल में इसको मंत्री का पद प्राप्त है । यह शुभ ग्रह है

तथा सुख-समृद्धि, संपदा और प्रतिभा का अधिष्ठाता है। इसकी स्वराशि धनु एवं मीन हैं। यदि इसकी स्थिति प्रतिकूल हो तो जातक को अनेक प्रकार के कार्यों में व्यवधान और असफलता ही हाथ लगती है। बुध व चन्द्र को छोड़ कर यह सब ग्रहों में सर्वाधिक शक्तिशाली है।

व्रत का नियम

बृहस्पतिवार को पीले वस्त्र धारण कर भगवान शंकर पर पीली उड़द व चने की दाल चढ़ाएं।

इस व्रत के करने से विद्या, धन, पुत्रादि अक्षय सुख प्राप्त होते हैं। व्रत रखने वाले को इस दिन केले के वृक्ष की विधिवत् पूजा करनी चाहिए। कथा सुनने के बाद दिन में केवल एक बार भोजन करें।

यन्त्र एवं मन्त्र

बृहस्पति ग्रह

यह यंत्र धारण करने से ग्रह पीड़ा का निवारण होता है। विद्या, विवेक, बुद्धि एवं सुख सम्पन्नता में वृद्धि होती है । यंत्र की रचना भोजपत्र पर अनार की कलम द्वारा अष्टगंध से की जाती है।

बृहस्पति के अशुभ प्रभाव को यह सहज ही दूर कर देता है तथा अशुभ प्रभाव के कारण उत्पन्न रोगों का शमन भी शीघ्र ही हो जाता है।

मंत्र

ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरवे नमः

बृहस्पति के इस मंत्र का नित्य ग्यारह माला जप विशाखा नक्षत्रगत बृहस्पतिवार या बृहस्पतिवार की होरा से प्रारंभ करें। सिद्ध करने के लिए मंत्र का १९ हज़ार जप करें। मंत्र के नित्य जप से बृहस्पति का अशुभ प्रभाव शांत होता है एवं सुख शांति आती है।

दान व स्नान

दान का हर ग्रह को शांत करने में महत्त्व है अतः पीला वस्त्र, शक्कर, घोड़ा (उसका प्रतीक कोई खिलौना), पीले पुष्प, ताजे फल, चने की दाल, हल्दी, लवण, धन रूप में दक्षिणा, सुवर्णपत्र, पुखराज तथा कांस्य का दान करने से बृहस्पति का नेष्ट प्रभाव समाप्त होता है।

इसके अतिरिक्त चमेली के पुष्प, सफेद सरसों, गूलर, मयदंती, मुलहठी और मधु मिश्रित

जल से स्नान भी बृहस्पति के अशुभ प्रभाव से होने वाली पीड़ाओं से मुक्ति दिलाता है।

स्वामी पूजन

बृहस्पति ग्रह के स्वामी प्रजापति ब्रह्मा हैं। ये ब्रह्म ज्ञान के अधिष्ठाता हैं। ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए नीचे दिए गए ब्रह्मगायत्री मंत्र का अनुष्ठान ब्रह्मा जी का चित्र सामने रख कर करें।

ॐ वेदात्मने च विद्महे हिरण्यगर्भाय धीमहि । तन्नो ब्रह्मा प्रचोदयात् ।

इस मंत्र का २८ लाख जप करें। दशमांश का हवन करें। ब्राह्मणों या विद्यार्थियों को भोजन कराएं, दक्षिणा दें। नित्य होम करें। बृहस्पति जातक को हर प्रकार से सुख प्रदान करेंगे।

रत्न धारण

बृहस्पति की महादशा एवं अंतर्दशा में पुखराज धारण करना लाभकारी है। पुखराज सोने की अंगूठी में जड़ा जाना चाहिए, किंतु गुरु-चंद्रमा योग हो तो चांदी की अंगूठी में पुखराज धारण करना चाहिए। कम से कम ३ रत्ती का पुखराज धारण करें।

टोटके व उपाय

● बृहस्पति यदि अशुभ फल दे रहा हो तो सोने का गहना पहनें।

मस्तक, पगड़ी या टोपी पर पीला तिलक लगाएं।

o व्रत रखें, एक समय आहार करें। केले की पूजा करें।

केसर का तिलक करें या नाभि पर लगाएं।

● पीपल को जल दें व पूजा करें। उसके पास शुद्ध घी का दीपक जलाएं।

सोना धारण करें।

● यदि बृहस्पति और चंद्र साथ हों, तो वटवृक्ष पर जल चढ़ाना उचित रहता है।

● अपनी आय का कुछ अंश विद्यार्थियों की पढ़ाई पर खर्च करें। उन्हें पुस्तकादि पाठ्य सामग्री लेकर दें ।

सूर्य ग्रह (ग्रहों के अधिपति)चंद्र ग्रह (सौंदर्य का प्रतीक)
मंगल ग्रह – (युद्ध का देवता)बुध ग्रह (व्यवसाय प्रतिनिधि)
बृहस्पति ग्रह (देवगुरु)शुक्र ग्रह (दैत्य गुरु)
शनि ग्रह (अंतर्मन का स्वामी)राहु ग्रह (विनाश का कारक)
केतु ग्रह (शस्त्रों का अधिनायक)

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