बैसाखी

2022 में बैसाखी कब है ?

14 अप्रैल, 2022

(गुरुवार)

 बैसाखी पर्व

भारत में बैसाखी पर्व को सिख समुदाय नए साल के रूप में मनाते हैं। यह पर्व प्रत्येक साल हिन्दू कैलेंडर अनुसार विक्रम संवत के प्रथम माह में पड़ता है। बैसाखी को फसलों का त्यौहार भी कहा जाता है। वैसे तो यह पर्व पूरे भारत वर्ष में मनाया जाता है, लेकिन पंजाब में यह प्रसिद्ध है।

बैसाखी के दिन ही सिखों के दसवें गुरू गुरु गोबिन्द सिंह ने सन् 1699 में पवित्र खालासा पंथ की स्थापना की थी।

गुरु तेग बहादुर (सिखों के नवें गुरु)

गुरु तेग बहादुर (सिखों के नवें गुरु) औरंगज़ेब से युद्ध करते हुए शहीद हो गये थे। तेग बहादुर उस समय मुगलों द्वारा हिन्दुओं पर किए जाने अत्याचार के ख़िलाफ़ लड़ रहे थे। तब उनकी मृत्यु के पश्चात उनके पुत्र गुरु गोबिन्द सिंह अगले गुरु हुए।

सन् 1650 में पंजाब मुगल आतताइयों, अत्याचारियों और भ्रष्टाचारियों का दंश झेल रहा था, यहाँ समाज में लोगों के अधिकारों का हनन खुलेआम हो रहा था और न ही लोगों को कहीं न्याय की उम्मीद नज़र आ रही थी।

ऐसी परिस्थितियों में गुरू गोबिन्द सिंह ने लोगों में अत्याचार के ख़िलाफ़ लड़ने, उनमें साहस भरने का बीडा़ उड़ाया। उन्होंने आनंदपुर में सिखों का संगठन बनाने के लिए लोगों का आवाह्न किया और इसी सभा में उन्होंने तलवार उठाकर लोगों से पूछा कि वे कौन बहादुर योद्धा हैं जो बुराई के ख़िलाफ शहीद हो जाने के लिए तैयार हैं। तब उस सभा में से पाँच योद्धा निकलकर सामने आए और यही पंच प्यारे कहलाए जो खालसा पंथ का नाम दिया गया।

पंज प्यारे

1.  भाई दया सिंह
2.  भाई धर्म सिंह
3.  भाई हिम्मत सिंह
4.  भाई मुखाम सिंह
5.  भाई साहेब सिंह

पाँच लोगों का समूह (पंज प्यारे) पाँच ‘क’ के भी प्रतीक माने जाते हैं जिनमें कंघा, केश, कड़ा, कच्छा और कृपाण हैं।

बैसाखी कैसे मनाई जाती है

बैसाखी मुख्य रूप से या तो किसी गुरुद्वारे या फिर किसी खुले क्षेत्र में मनाई जाती है, जिसमें लोग भांगड़ा और गिद्दा डांस करते हैं।लोग तड़के सुबह उठकर गुरूद्वारे में जाकर प्रार्थना करते हैं।गुरुद्वारों में शब्द कीर्तन होता है।अरदास के बाद प्रसाद को गुरू को चढ़ाकर अनुयायियों में वितरित की जाती है। अंत में संगत लंगर चखती हैं।

फसल दी मुक् गई राखी जट्टा आई बैसाखी

आध्यात्मिक दृष्टिकोण

बैसाखी पर्व के दिन सूर्य बारह राशियों का चक्र पूरा करके इस दिन पुनः मेष राशि में आता है। यह इस बात का प्रतीक है कि वर्ष बीत गया है। इस दिन यह कामना की जाती है कि आने वाला वर्ष मंगलमय हो। इस दिन को नववर्ष का पहला दिन आंका

जाता है। हिन्दू धर्म के अनुयायी नवग्रह पूजन करते हैं और पावन ग्रन्थों का पाठ भी इस अवसर पर किया जाता है। अधिकांश लोग इस दिन तीर्थस्थलों पर जाकर स्नान करते हैं। यदि ऐसा संभव न हो सके तो गंगा जल डालकर स्नान किया जाता है। बैसाखी पर्व ज्योतिष गणना के मुताबिक शुभ दिन आंका गया है, इस दिन

नए कार्य भी प्रारंभ किए जाते हैं। देश भक्ति का प्रतीक

वर्ष 1919 की खूनी बैसाखी के दिन अनेक माताओं की गोद सुनी हुई, अनेक सुहागिनों के सुहाग उजड़ गए। अनेक बहनों, बेटियों के भाई और पिता सदा के लिए खामोश हो गए। जलियांवाला बाग अमृतसर में विशाल जनसमूह रोलट एक्ट का विरोध करने के लिए एकत्रित हुआ और जब लोग अपने नेताओं के विचार सुन रहे थे तभी जनरल डायर ने निहत्थे लोगों को अपने कायर सैनिकों की सहायता से गोलियों से भून डाला। कई लोग जान बचाने की भाग-दौड़ में कुएं में गिर गए। दो हजार के करीब शहीद हुए लोगों का श्रद्धांजलि दिवस भी बैसाखी पर्व है। शीत ऋतु का अंत और

ग्रीष्म ऋतु के प्रारम्भ से पूर्व वृक्षों के नए पत्ते आने से उनमें नवसंचार होता है और शरीर में भी स्फूर्ति आ जाती है। किसान परिवारों के अरमान भी इस दिवस पर अपने चरम पर होते हैं। खेतों में लहलहाती फसल देख किसान का सीना भी गर्व से चौड़ा हो जाता है और उसे उसकी मेहनत का फल मिलने की आशा बंध जाती है। गेहूं फसल की कटाई के श्रीगणेश का पारम्परिक दिन भी बैसाखी पर्व ही है।

बैसाखी और मेला

बैसाखी के अवसर पर विशेषकर पंजाब में मेले लगते हैं। मेले का भाव मेल है। सभी लोग आपस में प्रेमभाव से मिलते हैं। जालंधर के करतारपुर में बैसाखी का मेला प्रसिद्ध है। इसके अतिरिक्त लोग मंदिरों, गुरुद्वारों में जाकर नववर्ष के मंगलमय होने की कामना भी करते हैं।

आनंद संदेश

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