सत्रहवाँ अध्याय श्रावण महात्म्य

सत्रहवाँ अध्याय श्रावण महात्म्य

ईश्वर ने सनत्कुमार से कहा- हे देवेश ! अब शुभ पवित्रारोपण कहूँगा। पहली सप्तमी के रोज अधिवासन कर, अष्टमी के रोज पवित्रारोपण करे।

जो जीव पवित्र बनवाता है, उसके सुपुण्य का फल सुनो। हे विप्र ! वह सब यज्ञ, व्रत, दान तथा सब तीर्थाधिशेचन का फल प्राप्त कर लेता है,

इसमें कोई संशय नहीं। क्योंकि सर्वांगता शिव सब में निवास करते है। अतः न तो आधि, दुःख, पीड़ा तथा व्याधि होती है,

न ग्रह से उत्पन्न पीड़ा कभी होती तथा उसके अल्प या महान् सब काम सिद्ध हो जाते हैं। हे वत्स ! नर और राजाओं के सुपुण्य की वृद्धि करने वाला इससे बढ़कर अन्य कोई साधन नहीं है।

सनत्कुमार ने कहा- हे देव, महादेव! आपने। जो पवित्रारोपण कहा- हे स्वामिन्! उसके निर्माण की विधि और उसकी सही विधि कहें।

ईश्वर ने कहा- हे सनत्कुमार! सोना, ताँबा, चाँदी, विशेष रेशमी वस्त्र, कुश या काश से निर्मित या ब्राह्मणी रूई से सूत काते।

सूत्रों को त्रिगुकर पुनः त्रिगुणित करने पर उनको ३६० गुण उत्तम पवित्र कहा है। तीन सौ साठ सूत्रों को उत्तम, दो सौ सत्तर को मध्यम और एक सौ अस्सी सूत्रों को अधम कहाँ है।

सौ ग्रन्थि का उत्तम, पचास ग्रन्थि का मध्यम तथा ३६ ग्रन्थि का पवित्र कनिष्ठ होता है या छह, तीन, चार, दो, बारह, चौबीस, बारह और आठ ग्रन्थि का पवित्र निर्णय करे या एक सौ साठ ग्रन्थि का उत्तम चौवन ग्रन्थि का मध्यम, सत्ताइस ग्रन्थि का कनिष्ठ पवित्र होता है।

देवी प्रतिमा की नाभि सीमित पवित्र कनिष्ठ, जांघ तक मध्यम, जानु तक पवित्र उत्तम होता है। उस पवित्र की सब गांठों को केसर से रंगे तथा सर्वतो भद्र वेदी पर देवी का अर्चन कर देवी के समक्ष कलश या बांसपात्र पर पवित्र रखें।

तीन सूत्रों में ओंकार, सोम, वहि, नाग, चन्द्र, रवि, ईश और विश्वेदेव का आवाहन पूर्वक स्थापन ग्रन्थियों में देवों के स्थापन की विधि कहूँगा ।

क्रिया पौरुषी, वीरा, विजया, अपराजिता मनोन्मनी जया, भद्रा, मुक्ति और ईशा इन नामों के आदि में प्रणव को लगाकर ग्रन्थि संख्या के अनुसार आवृत्ति कर, आवाहन तन्दनादि से अर्चन करे।

धूप देकर प्रणव द्वारा अभियंत्रित कर देवों को अर्पण करें।यह देवी का पवित्रारोपण विधान मैंने आपसे कहा-यों दूसरे देवों का प्रतिपदा आदि तिथियों में पवित्रारोपण करे।

उन देवों को आपसे कहता हूँ। धनद, श्रीगौरी, गणेश, चन्द्रमा, गुरु, भास्कर, चण्डिका, अम्बा, वासुकी, ऋषि, चक्रपाणि, अनंत शिव, ब्रह्मा और पितर- इन देवों का प्रतिपदा आदि तिथि में अर्चन करे।

यह पवित्रता रोपण प्रधान देवों का है। उनके अंग देवों को तीन तार वाला पवित्र समर्पण करे।ईश्वर ने कहा- हे विपेन्द्र ! सावन महीने के दोनों पक्ष की नवमी तिथि के रोज जो कुछ कर्तव्य है, उसे कहूँगा ।

हे विपेन्द्र ! नवमी के रोज यथाविधि ‘कुमारी’ नाम वाली दुर्गा का अर्चन कर, नक्त व्रत कर दूध और शहद मिला हुआ भोजन करे या दोनों पक्ष की नवमी को उपवास कर जो कुमारी नाम से।

चण्डिका का निरन्तर पूजन करता है, वह जहाँ गुरु निवास करते हैं, उसी परसोत्तम लोक में जाता है। हे सनत्कुमार! मैंने आपसे यह नवमी का विधान कहा।

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