baba vadbhag singh ji

baba vadbhag singh ji

बाबा वडभाग सिंह जी

dera baba vadbhag singh ji history

baba vadbhag singh ji– सृष्टिकर्त्ता परमेश्वर ने जब दृष्यमान संसार की कि रचना की उस समय से ही इसके संरक्षण के नि लिए और समय-समय पर आई दुर्बलताओं का से निवारण करने हेतु आप स्वयं निर्गुण से सगुण रूप धारण कर संसार में आए अथवा अपने स्वरूप से अभेद हो व चुके महापुरुषों को यहां भेजते रहे।

सतयुग में वामन, त्रेता में श्रीराम, द्वापर में श्री कृष्ण एवं कलियुग में श्री गुरु नानक एवं 10 स्वरूपों में प्रकट हुए जिन्होंने भूले भटके अर्थात् धर्म की राह से भटके असंख्य प्राणियों को धर्म का उपदेश देकर सुमार्ग दिखाया और विश्व में सुख-शांति का साम्राज्य स्थापित किया एवं जीवन को सुमार्ग प्रदान किया।

ऐसे ही पूर्ण महापुरुषों की श्रृंखला में महान योद्धा, परोपकारी, तत्ववेता, पूर्ण ब्रह्मज्ञानी, परम निष्ठावान बाबा वडभाग सिंह जी महाराज हुए हैं। बाबा वडभाग सिंह जी का जन्म करतारपुर में बाबा राम सिंह जी के घर में हुआ।

भादों 18, 1772 में जन्मे बाबा जी की प्रवृत्ति धार्मिक परिवार से संबंधित होने के कारण धार्मिक ही थी। बाबा वड़भाग सिंह जी के समय करतारपुर सिख धर्म के प्रचार एवं प्रसार का प्रमुख केन्द्र था। श्री गुरु अर्जुन देव जी महाराज, श्री गुरु हरगोबिंद जी महाराज, बाबा गुरदित्ता जी, बाबा धीरमल जी ने इस स्थल को अपनी कार्य स्थली बनाया एवं श्री गुरु नानक देव जी की शिक्षाओं का प्रचार किया और कई धार्मिक स्थल बनाए।

श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी के वंश से संबंधित बाबा वडभाग सिंह जी

श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी के वंश से संबंधित बाबा वडभाग सिंह जी ने जब देखा कि हर तरफ अराजकता फैली हुई है तो उन्होंने गुरु के शिष्य बनने का निर्णय लिया। गुरु के सच्चे शिष्य बन एवं अत्याचार के विरुद्ध लड़ने का प्रण ले बाबा जी ने संग्राम का बीड़ा उठाया।

सोढी वंश में पैदा हुए बाबा वडभाग सिंह जी में शूरवीरता बचपन से ही अपना रंग दिखा रही थी। उस समय मुस्लिम अत्याचार अपने चरम पर था। हिन्दू परिवारों में बहुत आतंक था। उन्होंने हिन्दुओं को गर्व से जीने का उपदेश दिया एवं मुस्लिम अत्याचारों का जवाब बहादुरी से दिया।

समय के साथ जब बाबा जी युवा अवस्था में पहुंचे तो उनकी शादी बीबी राधा से हुई। बाबा वडभाग सिंह जी शक्ति एवं भक्ति के प्रतीक थे। जहां वह अत्याचारियों के लिए कठोर थे वहीं वह श्री गुरु नानक देव जी की पावन शिक्षाओं के प्रचार एवं गुरमत के प्रचार हेतु सदैव अग्रणी रहे।

बाबा वडभाग सिंह जी ने अपनी जीवन शैली से यह संदेश दे दिया कि उनका जन्म संसार में धर्म की स्थापना, संतों की रक्षा एवं दुष्टों को समूल नष्ट करने के लिए ही हुआ है।

जनसाधारण में बाबा वडभाग सिंह जी की बढ़ती ख्याति देख जालंधर एवं लाहौर के शासक आग बबूला हो उठे। उन्होंने करतारपुर पर आक्रमण बोल दिया। गुरु के सच्चे सिख की भांति बाबा वड़भाग सिंह जी ने “वीरतापूर्वक उनका सामना किया तथा उन्हें वहां से खदेड़ दिया।

लाहौर का शासक यह बात सहन न कर सका। उसने सेना एकत्र कर पुनः करतारपुर पर आक्रमण कर दिया। बाबा जी अपने वीर सैनिकों के साथ काफी समय तक मुगल सैनिकों के साथ लोहा लेते रहे। संख्या में बहुत अधिक होने के कारण मुगलों की सेना बाबा जी एवं उनके सैनिकों पर भारी पड़ी।

अत्याचारियों ने धर्मस्थलों को हानि पहुंचाई एवं जनसाधारण को लूट-पाट का शिकार बनाया। बाबा वडभाग सिंह जी से करतारपुर निवासियों का दुःख देखा नहीं गया। बाबा जी ने मुगलों से बदला लेने के लिए काहनूवाल के सिखों से पत्राचार किया और सारी परिस्थिति की पूर्ण जानकारी उन्हें दी।

काहनूवाल के सिख पूर्ण जोश के साथ करतारपुर पहुंच गए। युद्ध प्रारंभ हो गया। इस बार बाजी पलट गई।

सिखों की वीरता के आगे मुगल अत्याचारियों की एक न चली। जालंधर का शासक नासीरुद्दीन युद्ध में मारा गया। शासक का अंत देख सेना में भगदड़ मच गई।

लाहौर प्रांत का सेना प्रमुख कुतुबद्दीन जिंदा पकड़ा गया। इस उपरांत सिंहों ने जालंधर पर आक्रमण कर वहां से भी अत्याचारियों को खदेड़ दिया। अत्याचारियों को सजा देकर बाबा वड़भाग सिंह पुनः गुरमत प्रचार में जुट गए।

वह जनसाधारण को नाम वाणी पाठ का जाप करवाते एवं सही मार्ग पर चलने अर्थात् गुरु साहिबान के दिखलाए मार्ग पर चलने की शिक्षा देते। उस समय स्वार्थी तत्वों ने अपना रंग दिखाना प्रारंभ किया। धर्म में आडम्बर का आचरण होने लगा।

कुछ लोग धर्म का मार्ग त्याग कर सुख-शांति के मार्ग से भटक कर अधर्म के मार्ग पर चल पड़े। सद्विचारों का स्थान जादू-टोने ने ले लिया। अनैतिक काम बढ़ गए।

गुरु के सच्चे संत सिपाही बाबा वड़भाग सिंह जी के कोमल हृदय को यह बात नागवार लगी। उन्होंने इससे लड़ने का प्रण लिया व समाज में फैली जादू-टोने की व परंपरा की खदेड़ने के लिए कमर कस ली। बाबा जी उस समय के कुख्यात तांत्रिक से निपटने के लिए एक पिंजरे में तोते को लेकर होशियारपुर पहुंचे।

बाबा जी मार्ग में ग्रामीणों को नाम वाणी का उपदेश देते हुए गगरेट होते हुए नहरिया गांव पहुंचे। वहीं तांत्रिक नाहर सिंह रहता था जो अपनी तांत्रिक विद्या से लोगों को तंग किया करता था। बाबा जी ने एक बेर के वृक्ष के नीचे रेखा खींची और वहां बैठकर समाधि अवस्था में प्रभु का सिमरन करने लगे।

बाबा जी को वहां बैठे देख एक चरवाहा वहां आया और उसने कहा कि यहां तांत्रिक नाहर सिंह रहता है और वह आप पर जानलेवा आक्रमण कर सकता है, इसलिए आप यहां से अतिशीघ्र चले जाएं।

बाबा जी उसकी बात सुनकर शांत भाव से बैठे रहे और कहा कि वह बाबा नानक की वाणी में विश्वास रखने वाले हैं। भूत-प्रेत से उन्हें किसी प्रकार का भय नहीं लगता। चरवाहा वहां से चला गया। तभी तांत्रिक नाहर सिंह वहां आ धमका। बाबा जी को भयमुक्त बैठे देख वह आग-बबूला हो गया।

उसने भयानक आवाजें निकालनी प्रारंभ कर दीं। बात न बनती देख उसने तंत्र विद्या का सहारा लेकर वर्षा, तूफान चलाए। इन सब बातों का बाबा जी पर कोई प्रभाव न पड़ा तथा वह शांतिपूर्वक बैठे रहे। तांत्रिक विद्या गुरु जी की नाम वाणी के आगे न चल सकी।

थक-हार कर नाहर सिंह बैठ गया। बाबा वड़भाग सिंह जी ने जल का छिड़काव कर नाहर सिंह को बाल रूप बना तोते वाले पिंजरे में बंद कर दिया। चरवाहा यह सब दृश्य दूर से देख रहा था। वह भाग कर गांववासियों को ले आया और उसने जो देखा उसका बयान उनके सामने किया। गांववासी अति प्रसन्न हुए।

बाबा जी का मन पसीज गया। उन्होंने नाहर सिंह को आजाद कर दिया। बाबा वड़भाग सिंह जी ने नाहर सिंह को आदेश दिया कि वह इस बेरी को छोड़ दे तथा यहां से कुछ दूरी पर धौली धार है और वहां जाकर डेरा जमा ले।

साथ ही बाबा जी ने उसे आदेश दिया कि वर्ष बाद जब भी मेरे सेवक आएं और स्नान करें तब तुम्हें सभी के तवीज या छाया व अन्य दुःख दूर करने होंगे।

बाबा वडभाग सिंह जी ने नाहर सिंह को आदेश दिया कि वह मेरे किसी भी सेवक को तंग नहीं करे। बाबा जी के आदेशानुसार नाहर सिंह धौली धार चला गया। बाबा जी इसी स्थल पर रहकर गुरमति का प्रचार करने लगे। लोग अपनी कठिनाइयां लेकर बाबा जी के पास आते।

बाबा जी उनकी समस्याओं का समाधान करते एवं गुरवाणी की कथा गुरु के प्रेमियों को सुनाते। महेड़ी गांव का नाम बदल कर बाबा जी ने मैड़ी रख दिया। बाबा जी गुरमति का प्रचार कर रहे थे और सादगीपूर्ण जीवन व्यतीत कर रहे थे कि तभी बाबा जी के परम सेवक को बाबा जी की आवश्यकता आ पड़ी।

बाबा जी अपने सेवक के दुःख निवारण हेतु यह कहकर चल पड़े कि मेरी देह अर्थात् शरीर यहां पड़ा रहेगा। मैं अपने सेवक के यहां जा रहा हूं, कुछ दिनों बाद मैं यहां वापस आ जाऊंगा। मेरी देह संभाल कर रख लेना।

जब बाबा जी चार दिन तक वापस न आए तो उनकी माता व बहुत से लोग यह समझने लगे कि बाबा जी स्वर्गधाम पधार गए हैं। बाबा जी की माता ने आदेश दिया कि इनका अंतिम संस्कार कर दिया जाए।

बाबा जी की देह को अग्निभेंट करने से रोकने हेतु बीबी भानी जी व अन्य लोगों ने प्रयास किया परंतु दाह-संस्कार बेरी वृक्ष जहां नाहर सिंह का निवास था, पर कर दिया गया। बीबी भानी जी ने भी दुखी होकर अग्नि समाधि ले ली।

अभी दो चिताएं जल ही रही थीं कि बाबा वडभाग सिंह जी लौट आए और उन्होंने पूछा कि यह संस्कार किसका हो रहा है। जिस व्यक्ति से बाबा जी ने पूछा वह बाबा जी को देख कांप गया और सोचने लगा कि यह उनका भूत कैसे आ गया?

धीरज बंधाने पर उसने बताया कि यह आपका ही संस्कार हो रहा है और बीबी भानी जी के बारे में भी उन्हें बता दिया गया। बाबा जी क्रोधित हो गए। तभी बाबा जी एक महिला के माध्यम से अपनी मां से बोले कि यदि आपने मेरा संस्कार न किया होता तो भूत-प्रेत, तावीज एवं छाया कभी कारगार न होते।

यहां पर हर समय मेले लगते रहने थे। अब यहां वर्ष में एक ही बार अर्थात् होली के अवसर पर मेला लगा करेगा जिस किसी पर छाया

तावीज, जादू-टोने का प्रभाव होगा वह यहां पर माथा टेक कर धौली धार में स्नान कर इन चीजों से तुरंत प्रभाव से मुक्त हो जाएगा। उस समय बाबा जी की आयु 52 वर्ष की थी। यह कह कर बाबा जी की ध्वनि आकाश में विलीन हो गई।

dera baba vadbhag singh ji

डेरा बाबा वडभाग सिंह जहां बाबा ने इस स्थल को अपनी तपोभूमि बनाया पर हर वर्ष होली के अवसर पर मेला लगता है। बाबा जी के इस स्थल पर संगत का जोड़ पहली या दूसरी होली पर ही आना प्रारंभ हो जाता है।

होशियारपुर से मुबारकपुर के मार्ग होते हुए नहरिया से आगे बाबा वडभाग सिंह जी का डेरा आता है। जालंधर से इस स्थल की दूरी लगभग 100 कि.मी. की है। इस स्थल पर पहुंचने से पहले दर्शनी खड्ड के दर्शन होते हैं। यहां का पानी अत्यंत निर्मल है।

जो लोग तावीज, छाया व प्रेत से प्रभावित होते हैं वह यहां जल में पांव भिगोकर नहीं जाते। यह मान्यता है कि यदि वह यहां से पांव भिगो जाते हैं तो उनके ऊपर जो छाया या अन्य तांत्रिक प्रभाव होता है वह यहीं रह जाता है और वापसी पर फिर उन पर हावी हो जाता है।

दर्शनी खड्ड

दर्शनी खड्ड में एक गुरुद्वारा साहिब जी भी है। इस स्थल का नाम दमदमा साहिब है। होली के मेले के अवसर पर संगत यहां आकर स्नान व कुछ समय विश्राम कर शारीरिक थकावट दूर करती है।

दर्शनी खड्ड पार कर संगत दमदमा साहिब के दर्शन कर जब मैडी साहिब बाबा जी के स्नान पर पहुंचती है तो उसे डेरा बाबा वड़भाग सिंह जी के दर्शन होते हैं। यहां पर सबसे बड़ा गुरुद्वारा श्री डेरा साहिब है।

इसी स्थल पर बाबा जी का संस्कार किया गया था। यहां गुरु ग्रंथ साहिब जी का प्रकाश होता है। निशान साहिब जी को माथा टेक कर गुरुद्वारा साहिब में प्रवेश कर गुरु घर से आशीर्वाद लिया जाता है।

इस स्थल के पूर्व की ओर बीबी भानी जी का भी मंदिर है। डेरा बाबा वड़भाग सिंह में प्रवेश करते ही बाईं ओर निशान साहिब स्थित है। चीड़ की लकड़ी का निशान साहिब बहुत ऊंचाई लिए हुए है।

हर तीन वर्ष बाद पूर्णिमा के दिन दूध एवं दहीं से स्नान करा कर इसे चढ़ाया जाता है। यह दृश्य दर्शनीय होता है। बाबा जी के सेवक बैंड-बाजे के साथ आते हैं।

निशान साहिब से पुराना चोला उतार कर उसे काट कर छोटे-छोटे भाग किए जाते हैं, जिन्हें बाबा जी के भक्तों को दिया जाता है। इन्हें रखने से किसी भी प्रकार के तांत्रिक प्रभाव खत्म हो जाते हैं। गुरुद्वारा डेरा साहिब के परिसर में बेरी वृक्ष भी स्थित है जिसे बेरी साहिब के नाम से जाना जाता है।

डेरा साहिब गुरुद्वारा से धौली धार आते समय मार्ग में मंजी साहिब गुरुद्वारा आता है। मंजी साहिब गुरुद्वारा से आगे पहाड़ के नीचे पानी की धारा ऊपर से गिरती है। यहां स्नान करने से दुखों एवं कष्टों से छुटकारा मिलता है। पूर्णिमा के अवसर पर स्नान का विशेष महत्व है।

इस स्थल को धौली धार कहते हैं। इसके अतिरिक्त केलासर, कुज्जासर, चरण गंगा आदि स्थल हैं, जहां से मानसिक रोगी मन में आत्मविश्वास का प्रकाश लेकर वापस घरों को जाते हैं। वर्तमान में डेरा बाबा वड़भाग सिंह में सैकड़ों की संख्या में संगठ के लिए कमरों का निर्माण हुआ है।

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