durga maa – माँ दुर्गा के नौ रूपों में नौ औषधियाँ

अष्टभुजा दुर्गा

durga maa

durga maa – माँ दुर्गा अनादि सर्वव्यापक शक्ति का प्रतीक है। मानव ने जबसे होश संभाला है वह शक्ति की खोज करता चला आया है। अथवा कह सकते है मनुष्य अपने जीवन को सुखमय बनाने के लिए शक्ति का उचित प्रयोग एवं आवाहन करता आया है।

इसी जगदाधार शक्ति का पूजन आज भी सर्वव्यापी है। परमात्मा ने अपनी उत्पत्ति को इस शक्ति को ग्रहण करने की क्षमता समान रूप से प्रदान की है। परमात्मा मैं राग-द्वेष, शत्रु-मित्र की कल्पना मात्र भी अज्ञान है। उन्हें प्राणिमात्र समान रूप से प्रिय हैं।

वे कल्याण स्वरूप हैं, पतित पावन हैं और सभी को ही परमात्मा ने कल्याणस्वरूप एवं पावन बनाया है। जो मनुष्य आत्म-संयम का पालन कर लेता है, वह इस शक्ति का अन्दर से ही अनुभव कर लेता है।

माँ भगवती की महिमा सत्य है, सर्वोपरि है, सर्वव्यापी है। जनमानस के लिए स्वयं अपने प्रज्ञा चक्षुओं से, अन्तर्नेत्रों से सत्य का साक्षात्कार करना आवश्यक है। संसार की कोई भी बाह्य शक्ति जीवन के अन्धकार को दूर नहीं कर सकती।

इसके लिए स्वयं अन्तर्मुखी होकर प्रयास करना होगा। उस महान शक्ति और बुद्धि का अनुभव करने के लिये मुख्य आठ साधनों के प्रतीक आठ भुजाओं के रूप में दर्शाये गये हैं

स्वदर्शन चक्र

स्वयं का ही दर्शन सभी के अन्दर। देहाभिमान का त्याग कर आत्मा भिमानी बनने से भाव है स्वदर्शन चक्र का।

सुदर्शन चक्र

यत्र-तत्र सर्वत्र अच्छा देखना, अच्छा सुनना, अच्छा समझना और अनुभव करना। हर समय एवं हर परिस्थिति में

प्रसन्न बदन और कार्यकुशल रहना ही सुदर्शन चक्रधारी बनने का तात्पर्य है। अपने आपको शिव रूप अनुभव करना एवं सबके कल्याण में अपना कल्याण देखना, अपने आपको शुद्धि बुद्धि, पवित्र हृदय शक्ति सम्पन्न विष्णु रूप अनुभव करना।

अपने आपको ब्रह्मरूप सबकी उत्पत्ति करने वाला अनुभव करना। प्राणि मात्र में अपना ही दर्शन करना।

तलवार

यह शत्रुओं के विनाश का प्रतीक है। मनुष्य के सबसे बड़े शत्रु हैं -काम, क्रोध, लोभ आदि। इन सभी शत्रुओं को समूल नष्ट करके सबसे प्रेमभरा सद्व्यवहार करना, यदि व्यक्ति इन अवगुणों से युक्त है तो हमें प्रयास करना है कि ये सभी अवगुण दूर हों।

इसी का प्रतीक यह तलवार है। यदि वे अवगुण मानव के अन्दर न हों तो मानव का कोई शत्रु ही न हो।

कमल

यह सुन्दरता, सन्तोष, सुगन्धि का प्रतीक है। सन्तोष के होने पर मेरी सुन्दरता हर्ष रहता है। योग दर्शन में कहा है –

सन्तोषा दनुत्तम सुखलाभः ।

इन दिव्यगुणों की सुगन्धि है-प्रेम, जिनको दिग्दिगंत फैलाना मनुष्य मात्र का कर्तव्य है। कमल-काम, क्रोध आदि से भरे तथा समस्याओं और उलझनों से पूर्ण संसार में रहते हुए भी अलिप्त अर्थात अपवित्र आनन्दमय जीवन व्यतीत करने की प्रेरणा का द्योतक है।

एक हाथ सामने उठा हुआ है

यह सबके प्रति प्रेम और सद्भावना का प्रतीक है। शंख-यह मधुर और गम्भीर वाणी का सूचक है। शंख को पाञ्चजन्य कहा जाता है।

हमारी वाणी में पाँच विशेषताएँ होनी चाहिए

1-स्नेह, दया एवं कल्याण की भावना।

2-सहानुभूति व सहयोगी की भावना।

3-सम्मान, सत्यता अथवा शक्ति का समावेश।

4- सात्विक पवित्रता।

5-सभी को कल्याण का मार्ग बताना।

वेद में उल्लेख है- ‘पञ्चजन्या: पुरोहित: तमिमेह: महागमय’ जो वचन कल्याणकारी अंधकार विनाशक हो, वही पाञ्चजन्य है।

त्रिशूल

यह त्रिविध तापों आधिदैविक, अधिभौतिक एवं आध्यात्मिक सन्तापों के मात्र प्रतीक हैं। गदा- दो प्रकार से शास्त्रों में गदा की महत्ता को समझाया गया है

कुमुद गदा

मंथन द्वारा आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त करना। यह गदा अपने विकारों पर विजय का प्रतीक है।

अष्टाज्ची गदा

यह आठ शक्तियों का प्रतीक है- सहन शक्ति, निर्णय शक्ति, नियंत्रण शक्ति, उत्थान शक्ति, भौतिक शक्ति, आत्मशक्ति, आकर्षण शक्ति और प्रेमाशक्ति। धनुष- लक्ष्य की ओर तीव्रता से जाना।

ये आठ साधन शक्ति प्राप्त करने के बताये गये हैं। शक्ति वाहन शेर है, जो निभीकता और दृढ़ता का प्रतीक है। माँ भगवती नारीस्वरूप है।

भारतीय संस्कृति में भी नारी को शक्ति, बुद्धि, वाणी, कीर्ति, अनुशासन, उन्नति तथा नीति की सूचक माना गया है। स्नेह, सौहार्द, अप्रमाद और श्रद्धा से माँ भगवती का पूजन होता है, वहाँ सुख-सम्पत्ति, ऐश्वर्य, वैभव, आयु, आरोग्यता, अभीष्टता का वास होता है।

नारी माता के रूप में आनन्दमय स्वर्ग है, पत्नी के रूप में सतर्क संरक्षिका, पुत्री के रूप में अद्वितीय ममता एवं भगिनी के रूप में एक अनूठी आत्मीयता है।

माँ दुर्गा के नौ रूपों में नौ औषधियाँ

नौ औषधियों में वास है नवदुर्गा का माँ दुर्गा नौ रूपों में अपने भक्तों का कल्याण कर उनके सारे संकट हर लेती हैं। इस बात का जीता जागता प्रमाण है, संसार में उपलब्ध वे औषधियां, जिन्हें मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों के रूप में जाना जाता है।

नवदुर्गा के नौ औषधि स्वरूपों को सर्वप्रथम मार्कण्डेय चिकित्सा पद्धति के रूप में दर्शाया गया। चिकित्सा प्रणाली का यह रहस्य वास्तव में ब्रह्माजी ने दिया था जिसके बारे में दुर्गाकवच में संदर्भ मिल जाता है। ये औषधियां समस्त प्राणियों के रोगों को हरने वाली हैं।

शरीर की रक्षा के लिए कवच समान कार्य करती हैं। इनके प्रयोग से मनुष्य अकाल मृत्यु से बचकर सौ वर्ष जी सकता है। आइए जानते हैं दिव्य गुणों वाली नौ औषधियों को जिन्हें नवदुर्गा कहा गया है।

प्रथम शैलपुत्री (यानी हरड़ )

नवदुर्गा का प्रथम रूप शैलपुत्री माना गया है। कई प्रकारकी समस्याओं में काम आने वाली औषधि हरड़, हिमावती है जो देवी शैलपुत्री का ही एक रूप हैं। यह आयुर्वेद की प्रधान औषधि है, जो सात प्रकार की होती है। इसमें हरीतिका (हरी) भय को हरने वाली है।

पथया कायस्थ

जो शरीर को बनाए रखने वाली है।

अमृता

अमृत के समान

हेमवती

-हिमालय पर होने वाली।

चेतकी

– चित्त को प्रसन्न करने वाली है।

श्रेयसी (यशदाता )

– शिवा यानी कल्याण करने वाली।

द्वितीय ब्रह्मचारिणी (यानि ब्राह्मी )

– नवदुर्गा का दूसरा रूप ब्रह्मचारिणी है। यह आयु और स्मरण शक्ति को बढ़ाने वाली, रुधिर विकारों का नाश करने वाली और स्वर को मधुर करने वाली है। इसलिए ब्राह्मी को सरस्वती भी कहा जाता है।

यह मन एवं मस्तिष्क में शक्ति प्रदान करती है और गैस व मूत्र संबन्ध रोगों की प्रमुख दवा है। यह मूत्र द्वारा अवरुद्ध विकारों को बाहर निकालने में समर्थ औषधि है। अतः इन रोगों से पीड़ित व्यक्ति को ब्रह्मचारिणी की आराधना करना चाहिए।

तृतीय चंद्रघंटा (यानि चन्दुसूर )

– नवदुर्गा का तीसरा रूप है चंद्रघंटा, इसे चन्दुसूर या चमसूर कहा गया है। यह एक ऐसा पौधा है जो धनिये के समान है। इस पौधे की पत्तियों की सब्जी बनाई जाती है, जो लाभदायक होती है।

यह औषधि मोटापा दूर करने में लाभप्रद है, इसलिए इसे चर्महन्ती भी कहते हैं। शक्ति को बढ़ाने वाली, हृदय रोग को ठीक करने वाली चंद्रिका औषधि है। अतः इस बीमारी से संबंधित रोगी को चंद्रघंटा की पूजा करनी चाहिए।

चतुर्थ कुष्माण्डा (यानि पेठा)

– नवदुर्गा का चौथा रूप कुष्माण्डा है। इस औषधि से पेठा मिठाई बनती है, इसलिए इस रूप को पेठा कहते हैं। इसे कुम्हड़ा भी कहते हैं जो पुष्टिकारक, वीर्यवर्धक व रक्त के विकार को ठीक कर पेट को साफ करने में सहायक है।

मानसिक रूप से कमजोर व्यक्ति के लिए यह अमृत समान है। यह शरीर के समस्त दोषों को दूर कर हृदय रोग को ठीक करता है। कुम्हड़ा रक्त, पित्त एवं गैस को दूर करता है। इन बीमारी से पीड़ित व्यक्ति को पेठा का उपयोग के साथ कुष्माण्डा देवी की आराधना करनी चाहिए।

पंचम स्कंदमाता (यानि अलसी)

नवदुर्गा का पांचवा रूप स्कंदमाता है जिन्हें पार्वती एवं उमा भी कहते हैं। यह औषधि के रूप में अलसी में विद्यमान हैं। यह वात, पित्त, कफ, रोगों की नाशक औषधि है।

अलसी नीलपुष्पी पार्वती स्यादुमा क्षुमा ।

अलसी मधुरा तिक्ता स्त्रिधापाके कदुर्गरुः ||

उष्णा दृष शुकवातन्धी का पित्त विनाशिनी।

इस रोग से पीड़ित व्यक्ति को स्कंदमाता की आराधना करना चाहिए।

षष्ठम कात्यायनी (यानि मोइया )

– नवदुर्गा का छठा रूप कात्यायनी है। इसे आयुर्वेद में कई नामों से जाना जाता है जैसे अम्बा, अम्बालिका, अम्बिका इसके अलावा इसे मोइया अर्थात माचिका भी कहते हैं। यह कफ, पित्त, अधिक विकार एवं कंठ के रोग का नाश करती है। इससे पीड़ित रोगी को इसका सेवन व कात्यायनी की आराधना करनी चाहिए।

सप्तम कालरात्रि (यानि नागदौन)

– दुर्गा का सप्तम रूप कालरात्रि है जिसे महायोगिनी, महायोगीश्वरी कहा गया है। यह नागदौन औषधि के रूप में जानी जाती है। सभी प्रकार के रोगों की नाशक सर्वत्र विजय दिलाने वाली मन एवं मस्तिष्क के समस्त विकारों को दूर करने वाली औषधि है।

इस पौधे को व्यक्ति अपने घर में लगाने पर घर के सारे कष्ट दूर हो जाते हैं। यह सुख देने वाली एवं सभी विषों का नाश करने वाली औषधि है। इस कालरात्रि की आराधना प्रत्येक पीड़ित व्यक्ति को करना चाहिए।

अष्टम महागौरी (यानि तुलसी)

– नवदुर्गा का अष्टम रूप महागौरी है, जिसे प्रत्येक व्यक्ति औषधि के रूप में जानता है क्योंकि इसका औषधि नाम तुलसी है जो प्रत्येक घर में लगाई जाती है।

तुलसी सात प्रकार की होती है

सफेद तुलसी, काली तुलसी, मरुता, दवना, कुढेरक, अर्जक और षटपत्र।

ये सभी प्रकार की तुलसी रक्त को साफ करती है एवं हृदय रोग का नाश करती है।

तुलसी सुरसा ग्राम्या सुलभा बहुमंजरी अपेतराक्षसी महागौरी शूलघ्नी देवदुन्दुभि-तुलसी कटुका तिक्ता हुध उष्णाहाहपित्तकृत् मरुदनिप्रदो हध तीक्षणाष्ण: पित्तलो लघुः।

नवम सिद्धिदात्री (यानि शतावरी )

नवदुर्गा का नवम रूप सिद्धिदात्री है, जिसे नारायणी या शतावरी कहते हैं। शतावरी बुद्धि बल एवं वीर्य के लिए उत्तम औषधि है। यह रक्त विकार एवं वात पित्त शोधनाशक और हृदय को बल देने वाली महाऔषधि है। सिद्धिदात्री का जो मनुष्य नियमपूर्वक सेवन करता है। उसके सभी कष्ट स्वयं ही दूर हो जाते हैं। इससे पीड़ित व्यक्ति को सिद्धिदात्री देवी की आराधना करना चाहिए।

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