उत्पन्ना एकादशी एकादशी महात्म्य

उत्पन्ना एकादशी एकादशी महात्म्य नैमिषारण्य तीर्थ मे अट्ठासी हजार ऋषि-मुनियों ने एकादशी की उत्पत्ति एवं माहात्म्य के तथ्य को जानने के लिए श्री सूतजी से निवेदन किया। श्री सूतजी ने कहा- हे ऋषियों! द्वापर युग में मनोकामना पूर्ण करने वाली अनन्त पुण्य प्रदायिनी एकादशी की उत्पत्ति, माहात्म्य आदि के बारे में पाण्डव श्रेष्ठ युधिष्ठिर ने … Read more

पेंतीसवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य

पेंतीसवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य पुण्य भी लगता है, या बिना दिया हुआ पुण्य मिलता है। तब सूतजी कहने लगे कि बिना दिये हुए भी पाप पुण्य दोनों मिलते हैं। सत्ययुग में एक के पाप और पुण्य के कारण सारे देश को पाप और पुण्य मिलता था। त्रेता में ग्राम को तथा द्वापर में कुल को … Read more

चौंतीसवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य

चौंतीसवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य सूतजी कहते हैं कि यदि किसी में उद्यापन की शक्ति न हो तो ब्राह्मणों को भोजन करा देवे। यदि ब्राह्मण न मिलें तो गौं का पूजन कर ले। यदि गौ भी न मिले तो पीपल अथवा वट का पूजन कर लेवे। यह सुनकर ऋषि पूछने लगे कि महाराज! वृक्ष तो सभी … Read more

तेतीसवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य

तेतीसवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य राजा पृथु कहने लगे कि हे नारदजी ! अब आप कृपा करके कार्तिक व्रत का उद्यापन विधि सहित कहिये। तब नारदजी कहने लगे कि कार्तिक शुक्ला चतुर्दशी को कार्तिक के व्रत की संपूर्णता के निमित्त उसका उद्यापन करना चाहिए। सारे घर में गोबर का चौका लगावे, तुलसी के ऊपर मंडप बनावे … Read more

बत्तीसवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य

बत्तीसवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य सूतजी कहते हैं कि ध्वजारोपण (झंडी लगाना) सब पापो को नाश करने वाला है। चारों वर्णों में से जो कोई भी भगवान् के मन्दिर में झंडी लगाता है, वह ब्रह्मादि देवताओं से पूजित होकर विष्णु लोक को प्राप्त हो जाता है। नारदजी कहते हैं कि हे राजा पृथु ! हम तुम्हें … Read more

इकत्तीसवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य

इकत्तीसवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य ब्रह्माजी कहते हैं कार्तिक शुक्ला एकादशी जिसको हरि प्रबोधिनी एकादशी भी कहते हैं, इस एक व्रत के करने से बाजपेय यज्ञों से भी अधिक फल प्राप्त होता है तथा जन्म- जन्मान्तर के पाप नाश हो जाते हैं। जो चार महीने का चातुर्मास व्रत होता है, वह भी इसी दिन समाप्त होता … Read more

तीसवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य

तीसवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य राजा पृथु पूछते हैं, हे नारदजी ! भगवान् का अत्यन्त प्रिय भीष्मपंचक व्रत कैसे प्रसिद्ध हुआ? तब नारदजी कहने लगे, हे राजा पृथु ! यह व्रत आदिकाल से है परन्तु बीच में लुप्त हो गया था। फिर यह कैसे प्रसिद्ध हुआ, सो कथा हम तुमसे कहते हैं, सुनो। श्रीकृष्णजी ने भीष्मजी … Read more

उनत्तीसवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य

उनत्तीसवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य राजा पृथु पूछने लगे कि हे नारदजी ! आप वेद, शास्त्र तथा पुराणों के जानने वाले हैं सो कृपा करके यह बतलाइये कि किस देवता की कितनी कितनी परिक्रमा होती हैं और उनका क्या फल होता है? यह वार्ता सुनकर नारदजी कहने लगे कि देवी की एक, सूर्य की सात, अग्नि … Read more

अट्ठाईसवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य

अट्ठाईसवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य इतनी कथा सुनकर ऋषि कहने लगे कि सूतजी ! कृपा करके कार्तिक शुक्ला अष्टमी, जिसको गोपाष्टमी भी कहते हैं, उसका माहात्म्य सुनाइये। सूतजी कहने लगे कि बाल्यावस्था में भगवान् कृष्ण पहले बछड़े चराया करते थे। कार्तिक शुक्ला अष्टमी गोपाष्टमी कहलाती है। इस दिन सब मनोकामनाओं को पूर्ण करने के लिए गौ … Read more

सत्ताईसवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य

सत्ताईसवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य इस प्रकार वह राक्षस और पिशाचिनी दोनों घूमते-फिरते नर्मदा नदी के किनारे एक वट वृक्ष के नीचे आकर ठहरे। उस वट वृक्ष पर गुरु का निन्दक एक ब्रह्मराक्षस रहता था। उन दोनों को वहाँ पर आया हुआ देखकर वह कहने लगा कि अरे तुम कौन हो, और किस पाप से इस … Read more