तेरहवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य

तेरहवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य इतनी कथा सुनकर राजा पृथु ने कहा कि हे महाराज! कृपा करके भगवान् की पूजा का माहात्म्य कहिये। तब नारद जी कहने लगे कि हे राजा! जो हंसी में भी भगवान् का भजन करता है वह परमपद को प्राप्त हो जाता है। परन्तु जो श्रद्धापूर्वक भजन करता है उसका तो कहना … Read more

बारहवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य

बारहवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य यह कथा सुनकर राजा पृथु कहने लगे कि हे नारदजी! आपने कार्तिक माहात्म्य का बड़ा उत्तम फल कहा, अब कृपा करके तुलसी का माहात्म्य भी कहिए। यह सुनकर नारदजी कहने लगे कि हे राजा पृथु ! प्राचीनकाल में सह्यादि क्षेत्र में कर्वरीपुर में धर्मदत्त नाम वाला एक ब्राह्मण था । वह … Read more

ग्यारहवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य

ग्यारहवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य एक समय नारदजी श्री व्यासजी से पूछने लगे कि हे व्यासजी ! गृहस्थाश्रम सब आश्रमों से उत्तम क्यों माना गया है? तब व्यासजी ने कहा-जैसे सब नदियाँ समुद्र में आश्रय पाती हैं और सब जीव माता का आश्रय पाकर ही जीवित रहते हैं। छः प्रकार के १. भिक्षुक, २. ब्रह्मचारी, ३. … Read more

दसवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य

दसवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य राजा पृथु पूछने लगे कि हे मुने! आपने कार्तिक मास में विष्णु की पूजा का माहात्म्य कहा। इस मास में किसी और भी देवता का पूजन या व्रत होता हो तो वह भी कहिये । नारद जी कहने लगे कि आश्विन शुक्ला पूर्णमासी को ब्रह्माजी का व्रत होता है। कार्तिक कृष्णा … Read more

नवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य

नवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य इधर वृन्दा ने स्वप्न देखा कि उसका पति सारे शरीर में तेल लगाकर नंगा शरीर भैंस पर सवार होकर, दक्षिण दिशा की ओर प्रेतों के साथ जा रहा है। यह स्वप्न देख उसे बड़ी चिन्ता हुई और अटारी तथा गोशाला कहीं भी विश्राम नहीं मिला। तब वह एक वन से दूसरे … Read more

आठवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य

आठवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य नारदजी कहने लगे कि हे राजा पृथु ! जालन्धर ने हमारा बड़ा आदर और सत्कार किया। भक्ति भाव से पूजन करके कहने लगा कि महाराज! आपका कैसे आगमन हुआ और मेरे लिए क्या आज्ञा है? हमने कहा कि दैत्यराज ! मैं कैलाश गया था। वहाँ पार्वती सहित अवधूत शिव और उनका … Read more

सातवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य

सातवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य इतनी कथा सुनकर सूतजी से शौनक ऋषि कहने लगे कि हे सूतजी! आप कृपा करके कार्तिक तथा तुलसी का माहात्म्य कहिये। तब सूतजी कहने लगे कि हे ऋषियो ! जो तुमने मुझसे पूछा है यही प्रश्न एक समय नारदजी से राजा पृथु ने किया था और जो कुछ उत्तर नारदजी ने … Read more

छठा अध्याय श्रावण महात्म्य

छठा अध्याय श्रावण महात्म्य नारदजी कहने लगे कि हे ब्रह्मन् ! कार्तिक मास के माहात्म्य का विधिपूर्वक वर्णन करिये। ब्रह्माजी कहने लगे कि हे नारद! तुम बड़े सज्जन पुरुष हो जो लोकों के हित के लिए ऐसे प्रश्न करते हो । अब मैं ऐसी कथा तुमसे कहता हँ जिसके सुनने मात्र से पापों का नाश … Read more

पाँचवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य

पाँचवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य नारद जी कहने लगे कि हे ब्रह्मन्! कार्तिक मास का कोई अन्य सुन्दर व्रत कहिये। तब ब्रह्माजी कहने लगे कि हे पुत्र ! विधिवित् जो परम पवित्र और पापनाशक नक्त व्रत है, वह सौभाग्यवती स्त्री को अवश्य करना चाहिए। नारदजी ने प्रश्न किया कि हे ब्रह्मन् ! उस व्रत की क्या … Read more

चौथा अध्याय कार्तिक माहात्म्य

चौथा अध्याय कार्तिक माहात्म्य नारदजी ब्रह्माजी से कहते हैं कि हे ब्रह्मन् ! कार्तिक मास में जो दीपदान होता है, उसका माहात्म्य कहिये। ब्रह्माजी कहने लगे कि हे पुत्र ! दीप चाहे स्वर्ण का हो अथवा चांदी, ताँबा, आटा अथवा मिट्टी का हो, अपनी श्रद्धानुसार कार्तिक मास में दान करना चाहिए। ऐसा करने से सब … Read more