अठारहवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य

अठारहवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य राजा पृथु नारदजी से पूछने लगे कि हे नारदजी! सब गोपियों में राधाजी ही श्रीकृष्णजी को अधिक प्रिय क्यों हैं तथा कार्तिक मास में भगवान् के साथ उनकी पूजा क्यों होती है ? यह सब कथा विस्तार पूर्वक हमसे कहिए। तब नारदजी कहने लगे कि पहले मन्वन्तर में पांचाल देश में … Read more

सत्रहवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य

सत्रहवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य सूतजी कहने लगे कि अब सब व्रतों में उत्तम व्रत और मोक्ष के देने वाले एकादशी के व्रत का माहात्म्य सुनो। एकादशी तिथि कृष्ण पक्ष की हो या शुक्ल पक्ष की, अन्न नहीं खाना चाहिए। जो एकादशी को अन्न खाता है वह पापों का भक्षण करता है। एकादशी का व्रत माता … Read more

सोलहवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य

सोलहवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य नारदजी कहते हैं कि अब मैं दीप दान तथा भगवान् के मन्दिर में मार्जन (झाड़ू) का वही माहात्म्य कहता हूं जोब्रह्माजी ने मुझे बताया था। पहले चन्द्र वंश में जयध्वज नाम का एक प्रभु भक्त राजा था। राजा स्वयं मन्दिर में जाकर मार्जन करता तथा दीप जलाता था। एक समय वीतिहोत्र … Read more

पन्द्रहवाँ अध्याय कार्तिक महात्म्य

पन्द्रहवाँ अध्याय कार्तिक महात्म्य राजा पृथु कहने लगे कि हे नारदजी ! भक्तवत्सल भगवान् की पूजा का इतिहास सुनाइये। तब नारदजी बोले कि हे राजन्! एक पुरातन इतिहास कहता हूं, सो सुनो। पहले चौल नाम का एक राजा कांतिपुर में राज्य करता था। उसके राज्य में कोई भी दुःखी, पीड़ित तथा दरिद्री नहीं था। सारी … Read more

चौदहवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य

चौदहवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य राजा पृथु कहने लगे कि हे नारदजी! आप सर्वज्ञ हैं, इसलिए संतान की वृद्धि करने वाला तथा सब प्रकार सुख देने वाला कोई व्रत कहिये। तब नारदजी ने कहा, हे राजन् ! इसके लिये मैं महाविद्या, महामाया, महामेधा, महास्मृति, महामोहा, महादेवी, महाईश्वरी तथा सर्व ईश्वरी अहोई देवी का व्रत तुमसे कहता … Read more

तेरहवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य

तेरहवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य इतनी कथा सुनकर राजा पृथु ने कहा कि हे महाराज! कृपा करके भगवान् की पूजा का माहात्म्य कहिये। तब नारद जी कहने लगे कि हे राजा! जो हंसी में भी भगवान् का भजन करता है वह परमपद को प्राप्त हो जाता है। परन्तु जो श्रद्धापूर्वक भजन करता है उसका तो कहना … Read more

बारहवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य

बारहवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य यह कथा सुनकर राजा पृथु कहने लगे कि हे नारदजी! आपने कार्तिक माहात्म्य का बड़ा उत्तम फल कहा, अब कृपा करके तुलसी का माहात्म्य भी कहिए। यह सुनकर नारदजी कहने लगे कि हे राजा पृथु ! प्राचीनकाल में सह्यादि क्षेत्र में कर्वरीपुर में धर्मदत्त नाम वाला एक ब्राह्मण था । वह … Read more

ग्यारहवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य

ग्यारहवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य एक समय नारदजी श्री व्यासजी से पूछने लगे कि हे व्यासजी ! गृहस्थाश्रम सब आश्रमों से उत्तम क्यों माना गया है? तब व्यासजी ने कहा-जैसे सब नदियाँ समुद्र में आश्रय पाती हैं और सब जीव माता का आश्रय पाकर ही जीवित रहते हैं। छः प्रकार के १. भिक्षुक, २. ब्रह्मचारी, ३. … Read more

दसवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य

दसवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य राजा पृथु पूछने लगे कि हे मुने! आपने कार्तिक मास में विष्णु की पूजा का माहात्म्य कहा। इस मास में किसी और भी देवता का पूजन या व्रत होता हो तो वह भी कहिये । नारद जी कहने लगे कि आश्विन शुक्ला पूर्णमासी को ब्रह्माजी का व्रत होता है। कार्तिक कृष्णा … Read more

नवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य

नवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य इधर वृन्दा ने स्वप्न देखा कि उसका पति सारे शरीर में तेल लगाकर नंगा शरीर भैंस पर सवार होकर, दक्षिण दिशा की ओर प्रेतों के साथ जा रहा है। यह स्वप्न देख उसे बड़ी चिन्ता हुई और अटारी तथा गोशाला कहीं भी विश्राम नहीं मिला। तब वह एक वन से दूसरे … Read more