आठवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य

आठवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य नारदजी कहने लगे कि हे राजा पृथु ! जालन्धर ने हमारा बड़ा आदर और सत्कार किया। भक्ति भाव से पूजन करके कहने लगा कि महाराज! आपका कैसे आगमन हुआ और मेरे लिए क्या आज्ञा है? हमने कहा कि दैत्यराज ! मैं कैलाश गया था। वहाँ पार्वती सहित अवधूत शिव और उनका … Read more

सातवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य

सातवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य इतनी कथा सुनकर सूतजी से शौनक ऋषि कहने लगे कि हे सूतजी! आप कृपा करके कार्तिक तथा तुलसी का माहात्म्य कहिये। तब सूतजी कहने लगे कि हे ऋषियो ! जो तुमने मुझसे पूछा है यही प्रश्न एक समय नारदजी से राजा पृथु ने किया था और जो कुछ उत्तर नारदजी ने … Read more

छठा अध्याय श्रावण महात्म्य

छठा अध्याय श्रावण महात्म्य नारदजी कहने लगे कि हे ब्रह्मन् ! कार्तिक मास के माहात्म्य का विधिपूर्वक वर्णन करिये। ब्रह्माजी कहने लगे कि हे नारद! तुम बड़े सज्जन पुरुष हो जो लोकों के हित के लिए ऐसे प्रश्न करते हो । अब मैं ऐसी कथा तुमसे कहता हँ जिसके सुनने मात्र से पापों का नाश … Read more

पाँचवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य

पाँचवाँ अध्याय कार्तिक माहात्म्य नारद जी कहने लगे कि हे ब्रह्मन्! कार्तिक मास का कोई अन्य सुन्दर व्रत कहिये। तब ब्रह्माजी कहने लगे कि हे पुत्र ! विधिवित् जो परम पवित्र और पापनाशक नक्त व्रत है, वह सौभाग्यवती स्त्री को अवश्य करना चाहिए। नारदजी ने प्रश्न किया कि हे ब्रह्मन् ! उस व्रत की क्या … Read more

चौथा अध्याय कार्तिक माहात्म्य

चौथा अध्याय कार्तिक माहात्म्य नारदजी ब्रह्माजी से कहते हैं कि हे ब्रह्मन् ! कार्तिक मास में जो दीपदान होता है, उसका माहात्म्य कहिये। ब्रह्माजी कहने लगे कि हे पुत्र ! दीप चाहे स्वर्ण का हो अथवा चांदी, ताँबा, आटा अथवा मिट्टी का हो, अपनी श्रद्धानुसार कार्तिक मास में दान करना चाहिए। ऐसा करने से सब … Read more

तीसरा अध्याय कार्तिक माहात्म्य

तीसरा अध्याय कार्तिक माहात्म्य इतनी कथा सुनकर श्री नारदजी ने पूछा कि हे ब्रह्मन् ! आप मुझे उत्तम देवता का पूजन बताइये। तब ब्रह्माजी ने कहा कि हे पुत्र ! गंडकी नदी के उत्तर की ओर गिरिजा के दक्षिण में चालीस कोस की पृथ्वी महाक्षेत्र कहलाती है वहाँ पर ही शालिग्राम तथा गोमती चक्र होते … Read more

दूसरा अध्याय कार्तिक माहात्म्य

दूसरा अध्याय कार्तिक माहात्म्य ब्रह्माजी कहते हैं कि हे नारद! तुलसी की मंजरी सहित भगवान् शालिग्राम का जो एक बूंद चरणामृत का पान करता है वह ब्रह्महत्यादि बड़े-बड़े पापों से मुक्त होकर वैकुंठ को प्राप्त हो जाता है। जो भगवान् शालिग्राम की मूर्ति के आगे अपने पितरों का श्राद्ध करता है उसके पितरों को वैकुंठ … Read more

पहला अध्याय कार्तिक माहात्म्य

पहला अध्याय कार्तिक माहात्म्य नैमिषारण्य में वास करने वाले शौनकादि ८८ हजार ऋषियों ने श्री सूतजी से कहा- हे ब्रह्मन्, आप हमारी इस घोर कलियुग से रक्षा करने के लिए कोई सरल उपाय बतायें। उनका यह प्रश्न सुनकर श्री सूतजी कहने लगे कि हे ऋषियो ! भगवान् के चरणों में तुम्हारी अटल भक्ति देखकर मैं … Read more

तीसवाँ अध्याय श्रावण महात्म्य

तीसवाँ अध्याय श्रावण महात्म्य ईश्वर ने कहा- आप से मैंने जो कुछ सावन महीने का माहात्म्य कहा, वह सौ सालों में भी उस मास का वर्णन नहीं हो सकता। इस मेरी प्रिया सती ने दक्षप्रजापति के यज्ञ में अपने देह का होम कर, हिमालय की पुत्री हो इसी सावन महीने का सेवन किया। जिसके द्वारा … Read more

उन्तीसवाँ अध्याय श्रावण महात्म्य

उन्तीसवाँ अध्याय श्रावण महात्म्य ईश्वर ने कहा- हे सनत्कुमार! अब कहे हुए व्रत के कृत्यों को कहूँगा। किस समय क्या करे? हे महामुने! उसे सुनें। सावन महीने की तिथि किस समय की लेनी चाहिए? किस समय क्या विधान है? उस काल में किसी का समय कहा है, नक्त व्रत का, उस व्रत कर्म में काल … Read more