Jai Hanuman – katha shri ram bhakt hanuman ki

Jai Hanuman- साधु-संत के तुम रखवारे। असुर निकंदन राम दुलारे।।

Jai Hanuman

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Jai Hanuman – सनातन धर्म में देवी- देवताओं की पूजा का प्रचलन तो है ही अपितु जिन भगवान के सेवकों को भी श्रद्धा भाव से पूजा जाता है उनमें अंजनि पुत्र हनुमान जी सर्वोपरि हैं। कई भक्तजन तो हनुमान जी के माध्यम से ही भगवान तक पहुंचना संभव मानते हैं।

संभवतः यही कारण है कि भारतवंशियों में हनुमान जी को अपनी सभी पीड़ाओं को हरन करने वाला भी मानते हैं। हनुमान जयंती पर आओ इस श्रीराम भक्त के बारे में कुछ जानें:

हनुमान जी का जन्म एवं बाल्यकाल

चेत्र शुक्ल मंगलवार के दिन अंजनि के गर्भ से भगवान शिव ने वानर रूप में अवतार ग्रहण किया। माता अंजनि एवं पिता केसरी के आनन्द की सीमा न रही। चन्द्रमा के समान दिन-प्रतिदिन बढ़ते बालक का पालन-पोषण बडे प्यार से हुआ।

माता-पिता अपने शिशु को आनन्दित देखकर आनन्दमय हो जाते । बालक बड़ा होने लगा। एक दिन माता-पिता के बाहर जाने पर बालक घर में अकेला था। वह खाने की तलाश में इधर-उधर भटका पर उसे कुछ खाने को न मिला। तब उसकी नज़र प्रातः के सूर्य पर पड़ी जिसे बालक ने फल समझ लिया।

बालक ने सोचा कि यह फल खाने एवं खेलने के काम आएगा। वायु द्वारा दी गई शक्ति के बल पर बालक सूर्य की ओर उड़ चला। भगवान शंकर की लीला से उड़ते बालक को देख कर देवता, दानव, यक्ष आदि हैरान हुए। उन्होंने सोचा कि यह तरुण सूर्य की तेज़ किरणों से जल न जाए।

उन्होंने हिमालय की शीतलता इकट्ठी की और पीछे भागे। सूर्य की दिव्य दृष्टि से बालक महत्ता छिपी न रही। की उन्होंने अपनी किरणें शीतल कर दीं। देवयोग से उस दिन ग्रहण था। राहू बीच में आया तो बालक के कठोर हाथों ने उसे पकड़ लिया। वह किसी प्रकार अपने को छुड़ा कर भागा ।

इन्द्र द्वारा भेजे जाने पर फिर से राहू सूर्य के पास आया। तब बालक को अपनी भूख की याद आई। वह राहू को खाने दौड़ा। तब इन्द्र ने अपना वज्र बालक की ओर फैंका जिससे बालक की बाई हनु (ठुड्डी) टूट गई।

बालक को वायुदेव गुफा में ले गए । किसी अनहोनी की आशंका से इन्द्र ब्रह्मा के पास गए । ब्रह्मा जी ने बालक को ठीक कर दिया। सारे जगत में प्राणसंचार पुनः हो गया। ब्रह्मा जी ने देवताओं से कहा कि यह बालक साधारण बालक नहीं है। यह देवताओं का कार्य साधक है। उन्होंने यह भी कहा कि उचित होगा यदि सभी देव इसे वरदान दें।

देवों ने दिए हनुमान जी को वरदान

इस तरह इन्द्र ने उन्हें हनुमान नाम दिया, सूर्य ने तेज तथा अपना स्वरूप बदलने का वरदान दिया एवं शास्त्र पढ़ाने का जिम्मा भी लिया। इसी तरह वरुण ने अपने पाश से और जल से निर्भय होने का वर दिया। कुबेर आदि देवों ने उसे निर्भय किया।

विश्वकर्मा ने अपने बनाए दिव्यास्त्रों से अवध्य होने का वर दिया और ब्रह्मा जी ने ब्रह्मज्ञान दिया तथा चिरायु करने के साथ ही ब्रह्मास्त्र और से ब्रह्मशाप से मुक्त कर दिया।

ब्रह्मा जी ने वायुदेव से यह भी कहा कि तुम्हारा बालक मन के समान तीव्रगामी एवं अमर कीर्ति वाला होगा। यह भगवान श्रीराम का परम सेवक तथा सहायक बनेगा। इस तरह हनुमान जी अमर एवं प्रभु भक्त होते हुए भी स्वयं पूजित हुए। भक्तजन प्रभु मिलन के लिए हनुमान जी को माध्यम या दूत मानते हैं।

गोस्वामी तुलसी दास जी ने रामचरित मानस में इनकी महिमा का वर्णन कर इनकी कीर्ति को अमर कर दिया । आज सनातन जगत में हनुमान चालीसा के माध्यम से लोग प्रतिदिन इसका पाठ तो करते ही हैं एवं किसी भय या चिंता के समय हनुमान जी का पाठ अपने लिए सभी पीड़ाओं से मुक्तिदाता समझते हैं।

यह भी कहा जाता है कि जहां कहीं भी भगवान का भजन-कीर्तन, सत्संग या पाठ आदि होता है वहां हनुमान जी उपस्थित रहते हैं।

श्रीराम सेवा बिना जीवन सफल होता नहीं।

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Jai Hanuman

श्रीहनुमान्जी महाराज श्रीरामकी अत्यन्त सेवा करते थे।

श्रीहनुमान्जी महाराज श्रीरामकी अत्यन्त सेवा करते थे। सेवा वह कर सकता है, जिसने सेव्य के मन के साथ अपना मन मिला दिया है। प्रभु में मन को पिराये रखने को सेवा कहते हैं। श्रीहनुमान्जी महाराज निरन्तर इसी बात का स्मरण रखते थे कि मेरे राम को क्या अच्छा लगता है? मेरे राम को क्या अच्छा नहीं लगता?

श्रीहनुमान्जी महाराज इस रीति से सेवा करते हैं कि प्रभु को कुछ कहने का अवसर ही न आये। उत्तम सेवक वही है जो स्वामी की आज्ञा से पहले ही उस सेवा को सम्पन्न रखे। हनुमान्जी जानते हैं कि प्रभु के मन में इस समय क्या है। रामजी की क्या इच्छा है।

श्रीराम और हनुमान् दोनों एक ही हैं

श्रीराम और हनुमान् दोनों अन्दर से एक ही हैं। भक्त और भगवान् बाहर से जुदा होते हैं। पर अन्दर से एक हो जाते हैं। व्यवहार में पति-पत्नी बाहर से अलग लगते हैं, परन्तु वे मन से एक ही होते हैं।

श्रीराम सेवा ही इनका जीवन

श्रीहनुमान्जी महाराज ऐसी सेवा करते हैं कि दूसरे किसी को सेवा करने का अवसर मिल ही नहीं पाता। भरतलाल, लक्ष्मणजी और शत्रुघ्नजी को थोड़ा खोटा लगने लगा कि हनुमान्जी जब से आये हैं तब से हमको प्रभु की सेवा मिलती ही नहीं। श्रीराम सेवा ही इनका जीवन था।

तीनों मिलकर श्रीसीताजी के पास गये और उनसे कहा कि माताजी! आप थोड़ी कृपा करो। रामजी की सेवा हमको भी थोड़ी करनी है, परन्तु हनुमान् समस्त सेवा कर रखते हैं।

भरतलाल, लक्ष्मणजी और शत्रुघ्नजी और श्रीसीताजी ने हनुमान जी को सेवा के लिए ना करने के लिए कहा

श्रीसीताजी ने कहा- तुम मुझसे कहते हो, परन्तु जब से हनुमान् आया तब से वह मुझे भी सेवा करने देता नहीं। इनको वह बहुत अच्छा लगता है। मेरी भी सेवा चली गयी। इन चारों जनों ने मिलकर निश्चित किया कि अपने को समस्त सेवा छीन लेनी चाहिये। हनुमान्जी के लिए कोई भी सेवा रखनी नहीं है। इन्होंने रामचन्द्रजी से कहा- आने वाले कल से हम लोगों को सेवा करनी है।

श्रीरामचन्द्रजी ने कहा- भले ही तुम करो। मैं क्या मना करता हूँ? सभी ने कहा-महाराज! हनुमान्जी सेवा करते हैं। इस कारण से हमको किसी को सेवा का लाभ मिलता ही नहीं। हम सबकी इच्छा है कि हनुमान्जी सेवा न करें, हम चार ही सेवा करेंगे।

प्रभु ने कहा- तुम भी सेवा करो और हनुमान्जी के लिये भी थोड़ी सेवा रखो। तब उन्होंने कहा- आज तक तो वानरों ने बहुत सेवा की है। श्रीहनुमान्जी महाराज क्या वानर हैं? अरे

रूपमात्रं तु वानरम् ।

श्रीहनुमान्जी के लिये ‘वानर’ शब्द का प्रयोग किया, वह प्रभु को सुहाया नहीं

श्रीहनुमान्जी के लिये ‘वानर’ शब्द का प्रयोग किया, वह प्रभु को सुहाया नहीं। प्रभु ने दृष्टि नीचे की ओर कर ली। उनको लगा कि मेरे हनुमान्जी को ये लोग अभी पहिचानते ही नहीं। हनुमान्जी मेरी आत्मा हैं। हनुमान् मेरे से पृथक् नहीं हैं।

इन चारों ने इधर निश्चय किया कि कल से समस्त सेवा हम सब ही करेंगे। दूसरे दिन, श्रीहनुमान्जी महाराज नित्य नियम के अनुसार, सूर्योदय के पूर्व ही स्नान- संध्यादि नित्यकर्म परिपूर्ण करके अन्तःपुर में सेवा करने के लिए आये।

जैसे ही रामजी की चरण पादुका उठाने लगे कि भरतजी आ गये, उन्होंने उनसे कहा- हनुमान्जी! यह सेवा बड़े भ्राता ने मुझे सौंपी है, अब पादुकाओं से हाथ लगाने की तुमको आवश्यकता नहीं। जब-जब आवश्यकता होगी तभी बड़े भाई को पादुका मैं अर्पण करूँगा। तुम पादुकाओं से हाथ लगाना नहीं। पादुका सेवा मेरी है। भरतजी ने हनुमानजी को सेवा करने को मना कर दिया।

श्रीरामचन्द्रजी स्नान करने को विराजे हुए थे तो हनुमान्जी ने विचार किया कि मैं पीताम्बर ले जाकर रामजी के हाथ में दूँ। उसी समय सीताजी ने आकर कहा कि ‘ए हनुमान्! पीताम्बर क्यों लेते हो? यह सेवा मेरी है। पीताम्बर प्रभु के हाथ में मैं दूंगी।’

इस प्रकार किसी समय माताजी निवारण करती, किसी समय लक्ष्मणजी निवारण करते, किसी समय भरतजी मना कर देते तो किसी समय शत्रुघ्नजी मना करते हुए कह देते कि यह सेवा मुझे दी हुई है। हनुमान्जी जो भी सेवा करने जाते कि उसी समय चारों में से कोई एक जना मना करके कह देता कि यह सेवा मेरी है।

हनुमान्जी तो रामजी की सेवा के लिए ही जीवित थे। सच्चा वैष्णव वह है, जिसे ठाकुरजी की सेवा बराबर न हो तो भूख लगती नहीं, जिसे परमात्मा की सेवा किये बिना पानी पीने की भी इच्छा होती नहीं। सेवा और स्मरण के लिए ही जीवित रहे वही वैष्णव।

हनुमान्जी महाराज तो भक्ति सम्प्रदाय के आचार्य हैं

वेष से वैष्णव होना थोड़ा सरल है, वैष्णव कहलवाना यह सरल है, वैष्णव होना कठिन है। वैष्णव तो वह है कि जिसे प्रभु की सेवा बिना एक क्षण भी सुहाता नहीं। हनुमान्जी महाराज तो भक्ति सम्प्रदाय के आचार्य हैं, सर्व वैष्णवों के आचार्य हैं। श्रीराम सेवा ही उनका जीवन है। श्रीराम सेवा के बिना वे रह सकते नहीं।

हनुमानजी ने हाथ जोड़े और माताजी से कहा- तुम सब मुझको सेवा करने से क्यों मना करते हो? तुम अप्रसन्न हो गये हो अथवा मुझसे कोई भूल हो गई है? मुझे सेवा क्यों नहीं करने देते?

श्रीसीताजी ने कहा- भाई! यह तो कल तीनों भाइयों ने निश्चय किया और प्रभु ने उनको सेवा दी है। हनुमान्जी ने पूछा- माताजी, मेरे लिये कोई सेवा रखी है या नहीं ? श्रीसीताजी ने कहा- तुम्हारे लिये कोई सेवा नहीं रखी है। आज पर्यन्त तुमने बहुत सेवा की है। अब तुम्हारे लिये कोई सेवा नहीं। अमुक सेवा लक्ष्मणजी की है,

यह भरतजी की है, यह सेवा शत्रुघ्नजी की है। यह सेवा मैंने अपने लिये रखी है। श्रीसीताजी ने समस्त काम बतला दिया। हनुमान्जी के लिये कोई सेवा बाकी ही रही नहीं। हनुमान्जी व्याकुल हुए। वन्दन करके बोले-माँ! मेरे रामजी की जिस समय जँभाई आये उस समय चुटकी बजाने की सेवा किसकी है?

श्रीसीता माँ ने कहा- भाई! तुम्हारे लिये कोई सेवा रही ही नहीं। यह सेवा तुम्हें करनी हो तो करना। प्रभु को जँभाई आये तो चुटकी बजाना जँभाई आये उस समय चुटकी बजाना, यह सनातन धर्म की एक मर्यादा है। जँभाई आये अर्थात् आयुष्य

घटती है। चुटकी बजाये, प्रभु का स्मरण करे तो आयुष्य का नाश होता नहीं। हनुमान्जी ने निश्चय किया कि यह सेवा मुझे मिल गयी है। इसलिये जिस समय स्वामी को जँभाई आयेगी, उसी समय चुटकी मैं बजाऊँगा।

आज तक तो हनुमान्जी महाराज दरबार में पधराते थे, उस समय स्वामी के चरणों में दृष्टि रखकर खड़े रहते थे, आँख ऊँची करके सन्मुख कभी देखते ही नहीं थे। दास्य-भाव से हृदय दीन बनता है। उसमें ऐसी निष्ठा होती है कि अपने स्वामी को सन्मुख दृष्टि से देखने की मेरी हिम्मत नहीं।

ये मेरे अन्नदाता हैं, मेरे रक्षक हैं। मैं तो इनका सेवक हूँ। दास की नजर तो चरणों में होती है। दास्य भक्ति अधिकारी महात्मा को ही प्राप्त होती है। दास्य- भक्ति में चरणों पर ही दृष्टि स्थिर करनी पड़ती है। मर्यादा भक्ति में दास्य- भाव मुख्य है। दास्य- भक्ति के आचार्य श्रीहनुमान्जी हैं।

हनुमान्जी ने विचार किया कि आज तक तो मैं चरणों में नजर रखता था, मुझे मुखारविन्द पर नजर रखनी पड़ेगी। कारण कि माताजी ने कहा है कि जँभाई आये उसी समय चुटकी बजाना। इसलिये चरणों में दृष्टि रखूँगा तो जँभाई आने की खबर पड़ेगी नहीं।

प्रभु का मुखारविन्द तो अति मंगलमय और सुन्दर है।

इस कारण हनुमान्जी महराज आँख ऊँची करके, श्रीरामजी के मुखारविन्द को निहारते रहे। प्रभु का मुखारविन्द तो अति मंगलमय और सुन्दर है। हनुमानजी को अतिशय आनंद होता, दर्शन से तृप्ति होती ही नहीं थी।

दर्शन में जिसकी तृप्ति हो, दर्शन से जिसका मन भर जाय वह वैष्णव नहीं। हनुमान्जी महाराज प्रतिक्षण दर्शन करते हैं। हनुमान्जी तत्पर रहते। कब जँभाई आये और कब मैं चुटकी बजाऊँ।

दरबार में तो मुखारविन्द पर नजर रखी है, परन्तु हनुमान्जी ने विचार किया कि चलते-चलते में भी कभी जँभाई आ जाती है। रामजी चलते हों उस समय जँभाई आ जाय तो?

इसलिये रामजी चलते उस समय हनुमान्जी हाथ जोड़कर, उनके आगे चलते-चलते, मुखारविन्द देखते रहते। श्रीरघुनाथजी अब महलों में पधारे, भोजन करने के लिये विराजे। हनुमान्जी सामने बैठकर रामजी का मुखारविन्द निहारते रहे। श्रीसीतामाँ परोसने के लिये आई। उन्होंने कहा हनुमान्! अब जा न यहाँ से।

हनुमान्जी ने कहा- माँ! जीमते हुए यदि जँभाई आ जाये तो चुटकी कौन बजायेगा? मैं तो यहाँ से जाऊँगा नहीं।

श्रीसीताजी ने सोचा कि इसको मैंने यह सेवा क्यों दे दी?

सम्पूर्ण दिन हनुमान्जी ने यह लीला की। माताजी को एकान्त में रामजी के साथ पाँच-दस मिनट बात करनी हो तो भी हनुमान्जी बातों में खड़े रहे। सीताजी बारम्बार कहने लगीं, जा न अब। तब हनुमान्जी ने कहा-किस प्रकार जाऊँ? आपने मुझसे कहा हुआ है कि जँभाई आते ही चुटकी बजाना है।

इसलिये कदाचित् बोलते-बोलते जँभाई आ जाये तो? मैं यहाँ से नहीं जाऊँगा। सम्पूर्ण दिवस निष्ठा पर अडिग रहे। रामजी को आनन्द हुआ। बगल में हनुमान् हों तो मुझे ठीक शोभा देता है। इसके बिना मुझे शोभा नहीं देता।

रामजी ने कहा – मैं हनुमान् का ऋणी हूँ

रात्रि को श्रीरघुनाथजी शैय्या पर शयन करने गये। श्रीसीताजी के आने के पहिले ही श्रीहनुमान्जी वहाँ आकर खड़े हो गये। श्रीसीताजी आयीं। उन्होंने रामजी से कहा- यह तुम्हारा भगत किसी को समझता ही नहीं।

तुम इसको बहुत मान देते हो, इस कारण किसी को मानता ही नहीं। अब तुम इसको कहो कि यहाँ से जाये। रामजी ने कहा- मैं सबसे कह सकता हूँ, परन्तु हनुमान् से कहने का मुझे अधिकार नहीं। हनुमान् ने मेरी बड़ी सेवा की है। मैं हनुमान् का ऋणी हूँ।

एकैकस्योपकारस्य प्राणान्नित्यान्ते कपे॥ एकस्तेनोपकाराणां भवाम ऋणिनो वयम् ॥

जगत् रामजी के अधीन है, श्रीराम हनुमानजी के अधीन हैं।

जगत् रामजी के अधीन है, श्रीराम हनुमानजी के अधीन हैं। भगवान् रामावतार में हनुमान्जी के ऋणी रहे हैं और कृष्णावतार में गोपियों के ऋणी रहे हैं। गोपियों से श्रीकृष्ण भगवान् ने कहा था –

न पारयेऽहं निरवद्य संयुजां

स्व साधु कृत्यं विबुधायुषापि वः।

या सामजन् दुर्जर गेहशृंखला

संवृश्चये तद् वः प्रतियातु साधुना ॥

अरी सखियों! तुमने मेरे लिये घर-बारकी बेड़ियाँ तोड़ डाली हैं। ये बेड़ियाँ तो बड़े-बड़े योगीजन भी जल्दी तोड़ सकते नहीं। मेरा और तुम्हारा यह मिलन, निर्मल और निर्दोष है। यदि मैं अमर जीवन से अनन्त काल तक तुम्हारे प्रेम, सेवा और त्याग का बदला चुकाना चाहूँ तो भी चुका नहीं सकता।

मैं जन्म-जन्मांतर तुम्हारा ऋणी हूँ। श्रीरामचन्द्रजी ने हनुमान्जी से कहा

तवोपकारिणश्चाहं न पश्याम्यद्य मारुते । कर्तुं प्रत्युपकारं ते धन्योऽसि जगतीतले ।।

सेवा स्मरण के अतिरिक्त अन्य कोई वशीकरण नहीं।

हनुमान्जी ने रामजी की ऐसी ही सेवा की है। हनुमान्जी ने बदले में कुछ भी लिया ही नहीं। केवल निष्काम भाव से उन्होंने सेवा की है।

सेवा का फल

कितने ही लोग भक्ति करते हैं, परन्तु वे कुछ माँगते हैं। भोग यह भक्ति का फल नहीं। भक्ति का फल पैसा नहीं, प्रतिष्ठा नहीं। भक्ति का फल तो भगवान् है। सेवा का फल सेवा ही है, मेवा नहीं। भोग के लिए भक्ति नहीं, भगवान् के लिए भक्ति करो।

कितने ही लोग समझते हैं कि भक्ति करूँगा तो बहुत पैसा प्राप्त होगा। भक्ति करूँगा उससे मैं सुखी हो जाऊँगा। क्या भक्ति का फल लौकिक सुख है? भक्ति का फल तो अलौकिक भजनानन्द है। ब्रह्मानन्द भक्ति का फल है।

जहाँ भोगने की इच्छा है, वहाँ भक्ति रहती नहीं।

भोगने के लिए भक्ति करे उसको भगवान् अच्छे नहीं लगते, संसार अच्छा लगता है। लौकिक सुख के लिए भगवान् की प्रार्थना मत करो। संसार का लौकिक सुख तो प्रारब्ध के अनुसार मिलता है। जिस जीव के ऊपर भगवान् कृपा करते हैं उसको लौकिक सुख नहीं देते।

लौकिक सुख मिले तो जीव ईश्वर से विमुख होता है। कई बार तो प्रभु ऐसी भी लीला करते हैं कि वैष्णव की भक्ति में विघ्न करने वाले सुख को खींच लेते है और वैष्णव को अनेक दुःख होते हैं।

इसके पापों का विचार करके भगवान् निश्चय करते हैं कि इस जन्म के समस्त पापों का भोग पूरा कराकर मैं इसको अपने धाम में ले जाऊँ, इसको परमानन्द देना है। इस कारण इसके पापों को भस्म करने के लिए और इसकी भक्ति का विघ्न टालने के लिए प्रभु इसको अनेक कष्ट सहाते हैं।

एक वैष्णव दम्पत्ति थे। दो ही प्राणी थे। घर में तीसरा कोई भी नहीं। समस्त दिन ठाकुरजी की सेवा स्मरण करते, ठाकुरजी की मंगलमय लीलाओं का चिंतन करते और मन द्वारा गोकुल में ही निवास करते सम्पूर्ण दिन मन को भक्ति- रस में सराबोर रखते।

प्रभु को भी खूब आनन्द आता था। ठाकुरजी इनके घर अत्यन्त आनन्द में विराजते थे। बारह पन्द्रह वर्ष सेवा करने के उपरान्त इनके घर में बालक का जन्म हुआ। बालक का जन्म होने से दोनों बहुत राजी हुए कि ठाकुरजी ने बड़ी कृपा की है।

परन्तु बालक में स्नेह इतना अधिक बढ़ गया कि सारा दिन बालक के चिन्तन में ही लगने लग गया। बालक का लालन-पालन करते थे। बालक तोतली बोली बोलता था। माँ-बाप बहुत प्रसन्न होते थे। बालक को खिलाते थे। एक क्षण भी उसको छोड़ते नहीं थे।

धीरे-धीरे भक्ति का जो नियम था, छूटने लगा। अनेक बार अन्दर से आवाज आती कि इस बालक के जन्म लेने के उपरान्त पहले-जैसी भक्ति नहीं हो पा रही है-यह ठीक नहीं है। परन्तु पीछे वे मन को समझाते कि इस बालक में भी भगवान् ही तो हैं। इसकी सेवा भी भगवान् की ही सेवा है।

मनुष्य के मन में अनेक प्रकार की वासनाएँ भरी हुई हैं। मन ऐसा ही प्रयत्न करता है, जिसमें जीव ईश्वर से विमुख रहे। मन खोटी सलाह देता है। बालक में भी भगवान् हैं।

बालक में भगवद्भाव रखना यह ठीक है, खोटा नहीं। परन्तु बालक की सेवा से भगवान् बिल्कुल भुला दिये जायें, भक्ति को भूल जाय और मन निरन्तर बालक में पिरोया हुआ रहे-वह भगवान् को किस प्रकार सुहायेगा?

प्रभु ने विचार किया कि इस प्रकार तो इसका पतन हो जायेगा। मुझे इनको अब पुत्र का सुख अधिक नहीं देना है। मुझे अपना वास्तविक आनन्द देना है।

संसार का समस्त सुख संयोग पर्यन्त ही है।

वियोग में दुःख है। प्रभु ने ऐसी लीला की कि उस बालक को उठा लिया। पहले तो माता-पिता को दुःख हुआ। परन्तु पीछे भगवद्कृपा से उनका भगवद्भाव दृढ़ हुआ कि प्रभु ने जो कुछ किया, वह ठीक किया है। आज तक बहुत से छोकरों को मैंने गोद में खिलाया है।

ये सब पुत्र कहाँ गये? इस जीव ने अनेक जन्मों में अनेक सम्बन्ध किये। सब सम्बन्धी कहाँ गये? मेरा सम्बन्ध तो ईश्वर के साथ ही सच्चा है। प्रभु ने इनको अलौकिक आनन्द का दान दिया। नित्य-लीला सेवा में इनको बुला लिया।

सुख में विघ्न आये तो समझना कि प्रभु मुझे अलौकिक सुख का दान देने वाले हैं, इसी कारण विघ्न आया है। प्रभु का सेवा-स्मरण लौकिक सुख के लिये करना नहीं, ईश्वर से कुछ माँगना नहीं। माँगना तो व्यापार जैसा गिना जाता है।

प्रभु की सेवा करे और बदले में लौकिक स्वार्थ माँगे, यह तो एक प्रकार का व्यापार है। लौकिक स्वार्थ के लिये भक्ति करे, वह भक्ति नहीं। वणिक् बुद्धि है। बनिया वह जो थोड़ा देकर अधिक की अपेक्षा रखता है। अपने लिए ठाकुरजी को कोई परिश्रम न दो।

मेरा कोई काम करने ठाकुरजी आयें ऐसा विचार जो करे, वह वैष्णव किस प्रकार कहा जा सकता है? वैष्णव तो विचार करता है कि मेरा काम आप करो, यह भगवान् से किस प्रकार कहा जा सकता है? अपने लिए प्रभु को परिश्रम क्यों हो? मैं तो प्रभु का दास हूँ।

काम के लिये राम नहीं, वरन् राम के लिये ही काम है। प्रभु किसी को सुख भी देते नहीं और दुःख भी देते नहीं। मनुष्य के खोटे खरे कर्म ही मनुष्य के सुख-दुःख के कारण रूप होते हैं। फिर भी अज्ञानी जीव सुख प्राप्त होने की अथवा दुःख से मुक्त होने की लालसा से ही प्रभु के पास जाता है।

ऐसी ‘से स्वार्थवृत्ति से प्रभु बहुत अप्रसन्न होते हैं। प्रभु के पास सुख प्राप्त करने नहीं, अपितु प्रभु को प्राप्त करने ही जाना चाहिये। सच्चा भक्त प्रभु से कुछ माँगता नहीं, अपना सर्वस्व प्रभु को अर्पण करता है। उससे भगवान् ऋणी बन जाते हैं।

श्रीरामचन्द्रजी विचारते हैं कि हनुमान्जी ने मुझे ऋणी बनाया है। इनके एक-एक उपकार के प्रति, एक-एक प्राण दूँ तो भी इनका ऋण चुक सके, ऐसा सम्भव नहीं है। प्राण पाँच हैं, परन्तु हनुमान् के उपकार अनन्त हैं। मैं सबको कह सकता हूँ पर इनको कुछ भी कह सकता नहीं।

श्रीसीताजी ने हनुमान्जी से कहा- हनुमान्! बहुत हो गया। तू अब यहाँ से चला जा।

हनुमान्जी ने कहा- माताजी! मैं किस प्रकार जाऊँ? रात्रि में निद्रा में यदि किसी समय जँभाई आ गयी तो? मुझे तो पूरी रात्रि यहीं पर रहना है। अन्त में सीताजी ने आज्ञा दी कि अब तू यहाँ से चला जा। इनको जँभाई आयेगी तो तेरे बदले मैं चुटकी बजा लूँगी। परन्तु तू अब यहाँ से जा

माताजी की आज्ञा हुई इसलिये हनुमान्जी कुछ बोले नहीं, बाहर आये। हनुमान्जी को सेवा करने नहीं दी, इनको बाहर किया, इसलिये प्रभु आज नाराज हो गये। हनुमान्जी को भी दुःख हुआ कि मेरे लिए कोई सेवा छोड़ी नहीं। जँभाई आये उस समय चुटकी बजाने की सेवा मिली, इसमें मैं सन्तोष मानता था पर इस सेवा को भी मुझे करने नहीं देते। अब मैं कहाँ जाऊँ? सेवा बिना मेरा जीवन वृथा है।

वैष्णव परमात्मा के लिये ही जीवन धारण करते हैं, परोपकार के लिये जीते हैं।

हनुमान्जी इसके उपरान्त राजमहल की अग्गासी (गौंखों) में पधारे उन्होंने निश्चय किया कि कल प्रातःकाल मंगला के दर्शन हों तब तक, सम्पूर्ण रात्रि में ‘सीताराम सीताराम-सीताराम’ कीर्तन करता करता चुटकी बजाता रहूँगा। अन्दर किसी भी समय प्रभु को जँभाई आ सकती है, इसलिये मेरी सेवा तो रात भर चलती ही रहेगी।

भक्त जागता है तो भगवान् सो सकते नहीं।

भक्त की चिन्ता भगवान् को सदैव ही रहती है। प्रभु ने विचार किया मेरा हनुमान् जागे और मैं सो जाऊँ यह उचित नहीं। मेरा हनुमान् आज की सम्पूर्ण रात्रि जागरण करनेवाला है, इसलिये मैं भी सारी रात्रि जागरण करूँगा और सीताजी को भी जागरण कराऊँगा।

श्रीसीताजी चरणों की सेवा में थीं। रामजी ने विचार किया कि मुझे किसी भी समय में जँभाई आ जाय, केवल इस कारण से हनुमान्जी निरन्तर चुटकी बजा रहे हैं और कीर्तन कर रहे हैं, तो मैं भी अब बारम्बार जँभाई लेता रहूँ।

रामजी ने बारम्बार जँभाई लेना आरम्भ कर दिया। मुँह तनिक भी बन्द रहता ही न था। श्रीसीताजी पूछने लगीं-आपको कुछ हो गया है?

रामजी का मुख खुला हुआ था और आँखें भी खुली हुई थीं। हनुमान्जीकीर्तन् कर रहे थे, उसे रामजी सुन रहे थे।

सीताराम सीताराम सीताराम जय सीताराम सीताराम सीताराम सीताराम जय सीताराम॥

श्रीसीताराम जी का कीर्तन करते-करते, अति आनन्द में हनुमान्जी नाच रहे थे। कीर्तन करते-करते हनुमान्जी श्रीसीतारामजी के दर्शन कर रहे थे। अत्यन्त आनन्द में जीव नाचता है।

कुछ लोगों के लक्ष्मी हाथ में आती है तो नाचने लगते हैं। तो लक्ष्मीपति जिसके हाथ में आ जायँ, वह अति आनन्द में रामजी का कीर्तन करते-करते थेई- थेई नाचते रहे। हनुमान्जी का कीर्तन सुनकर रामजी को आनन्द हो रहा था। वैष्णव प्रेम से कीर्तन करे, उसको परमात्मा निश्चय ही सुनते हैं।

श्रीसीताजी रामजी से बारम्बार पूछती थीं, आपको कुछ परिश्रम हुआ है क्या? आपको क्या हो गया है? रामजी एक भी अक्षर बोलते न थे। श्रीसीताजी घबड़ा गईं। उन्होंने दौड़ते हुए जाकर कौसल्या माँ को कहा- उनका कोई श्वास चढ़ गया मालूम होता है, इससे बोलते ही नहीं हैं।

मुख बन्द ही नहीं हो रहा।कौसल्या माँ दौड़ती हुई आई। उन्होंने रामजी के मस्तक पर हाथ फेरा और पूछा-बेटा! तुम्हें क्या हो गया है?

बड़ों का ऐसा स्वभाव होता है कि इनको कुछ खोटा लगे अथवा दुःख हो जाये तो ये सहन कर लेते हैं, परन्तु बोलते नहीं। प्रभु कुछ भी बोलते ही नहीं थे। उनको शान्ति से निद्रा भी नहीं आ रही थी। कौसल्या माँ को भ्रम हो गया कि किसी राक्षस की नजर न लग गयी हो?

मध्य रात्रि के समय सेवक दौड़ते हुए वसिष्ठजी के आश्रम में गये। वसिष्ठजी से कहा- रामचन्द्रजी महाराज को निद्रा नहीं आ रही और श्वास चढ़ा हुआ है।

वसिष्ठजी दौड़ते हुए आए, श्रीरामचन्द्रजी से पूछने लगे-क्या हो गया है? रामजी तो जँभाई ले रहे थे। मुख बन्द होता ही नहीं था, बोलें किस प्रकार? परमात्मा के लाड़ले भक्त को कोई अकारण त्रास दे, वह प्रभु को सुहाता नहीं। भगवान् विचार करते हैं कि यह भोला है।

इसका हृदय शुद्ध है। यह मेरे लिए जीता है। अपने किसी भक्त का अपमान हो तो प्रभु को बहुत दुःख होता है। भक्त के कारण भगवान् दुःखी हो जाते हैं। आज स्वामी की आँखें बन्द नहीं हो रही थीं, मुख बन्द नहीं हो रहा था। स्वामी को तनिक भी निद्रा नहीं आ पाती थी।

वसिष्ठ ने विचार किया कि आज किसी भक्त का अपराध हो गया मालूम होता है।

उन्होंने सीताजी से पूछा- आज कुछ गड़बड़ तो नहीं ?

श्रीसीताजी ने कहा महाराज! अन्य तो कुछ गड़बड़ी नहीं हुई, परन्तु ये तीनों भाई कल एकत्रित हुए और इन्होंने जैसा निश्चय किया उसी प्रकार समस्त सेवा का आपस में बँटवारा कर लिया। हनुमान् के लिए कोई सेवा छोड़ी नहीं। इसलिए प्रातः काल से ही नाराज हो गये हैं। आज प्रेम से भोजन भी नहीं किया। उदास हो गये हैं।

वसिष्ठजी ने पूछा-हनुमान् कहाँ है? श्रीसीताजी ने कहा- वह आया था। उससे मैंने कहा- प्रभु को जब जँभाई आये तो तू चुटकी बजाने की सेवा करना। इस समय तू यहाँ से जा वसिष्ठजी नेत्र मूँदकर हनुमान्जी का ध्यान करने लगे।

ध्यान में वसिष्ठजीको दर्शन हुआ कि राजमहल के बरामदे में ‘सीताराम-सीताराम-सीताराम’ इस प्रकार कीर्तन करते हुए हनुमान्जी आनन्द में नाच रहे हैं।

वैष्णवों को ध्यान में, दर्शन में, जितना आनन्द होता है; उतना ही आनन्द कीर्तन में भी होता है। कीर्तन करते हुए हृदय पिघले, आँखें भीनी हों तो जगत्-विस्मृति होती है। वसिष्ठजी दौड़ते हुए बरामदे में गये और हनुमान्जी को साष्टांग वन्दन किया।

पवनसुत हनुमान् की जय। हनुमान्जी का जय-जयकार किया।

फिर वसिष्ठजी ने हनुमानजी से कहा-महाराज! आप चुटकी न बजाओ।

आप चुटकी बजाते हो उससे प्रभु की आँखें बन्द नहीं होती, मुख बन्द नहीं होता। उनको बहुत जँभाई आ रही है। वे तुम्हारे अधीन हो गये हैं। तुम कौन हो? हनुमान्जी ने कहा

देहबुद्ध्या तु दासोऽहं जीवबुद्धया त्वदेशकः । आत्मबुद्ध्या त्वमेवाहं इति में निश्चिता मतिः॥

देहबुद्धि से तो मैं सीतारामजी का दासानुदास हूँ। जीवबुद्धि से मैं रामजी का अंश हूँ।

मेरे भगवान् अति उदार हैं, इसलिए कृपा करके मुझे अपनाया हुआ है। आत्मदृष्टि से विचार करने पर रामजी से मैं पृथक् नहीं हूँ।

मेरे में और श्रीराम में भेद नहीं। अतिशय भक्ति बढ़ती है तो भक्त और भगवान् एक हो जाते हैं। भक्ति भेद का विनाश कर देती है। श्रीहनुमान्जी और रामचन्द्रजी एक ही हैं। शिवजी महाराज माता पर्वतीजी को यह राम कथा श्रवण कराते हैं।

रामजी के गुण अनन्त हैं और एक श्रीराम ही सब में रमण करते हैं।

रामजी के गुण अनन्त हैं। रामजी की कथा का परावार नहीं है। राम-चरित्र का एक-एक अक्षर वक्ता-श्रोता के पापों को भस्म करनेवाला है। श्रीराम कथा का वर्णन कौन कर सकता है? जीव अल्प बुद्धि है; परमात्मा के गुण अनन्त हैं।

यथामति संक्षेप में श्रीराम कथा श्रवण करायी है। इस कथा में जो किन्हीं दिव्य तत्त्वों का समावेश हुआ है, वह सद्गुरुदेव का प्रसाद है। कथा कहने में अनेक त्रुटि हुई है। आप सब श्रीसीतारामजी के ही स्वरूप हो। एक श्रीराम ही अनेक रूपों में विराजे हुए हैं। एक श्रीराम ही सब में रमण करते हैं। आप सब के चरणों में बारम्बार प्रणाम करता हूँ।

श्रीरामजी की सेवा करो, श्रीराम नाम का जप करो, परोपकार में शरीर को घिसाओ।

महापुरुष किसी भी दिन सत्कर्मों की समाप्ति नहीं करते। जिस क्षण इस शरीर की समाप्ति हो उस क्षण भले ही सत्कर्म की समाप्ति हो जाय, सत्कर्म जीवन के अंतिम श्वास तक करते रहना है। जीवन के अन्तिम श्वास तक प्रेम से श्रीरामजी की सेवा करो, श्रीराम नाम का जप करो, परोपकार में शरीर को घिसाओ। परमात्मा की कृपा से अपना यह ज्ञान यज्ञ आज परिपूर्ण होता है। ज्ञान -यज्ञ में वक्ता पाप करता है, श्रोता भी पाप करता है। इसलिए ज्ञान यज्ञ परिपूर्ण सफल नहीं होता।

एक आज्ञा की गई है। ज्ञान यज्ञ में जो पाप हुआ हो, उसका विनाश करने के लिए वक्ता श्रोता प्रायश्चित्त करें। प्रायश्चित्त दूसरा कोई नहीं करना। अपने इष्टदेव का प्रेम से स्मरण करो। परमात्मा के चरणों में भावपूर्वक प्रणाम करते हुए नमः ‘बोलो। यह पाँच अक्षरों का मंत्र है।

सद्भाव से वन्दन करके इस ‘हरये नमः’ मन्त्र को तीन बार मन में नहीं, जोर से बोलने की आज्ञा की गई है। हरये नमः इति उच्चैर्विमुच्यते सर्वपातकात्।

यह महामंत्र भगवान् के चरणों में भावपूर्वक वन्दन करते करते तीन बार बोलोगे, तो जाने-अनजाने में यज्ञ में कुछ भी प्रमाद हो गया होगा, भूल हुई होगी, उस सबको परमात्मा क्षमा कर देंगे, अपना ज्ञान यज्ञ परिपूर्ण सफल होगा। श्रीसीतारामजी सबका मंगल करेंगे।

हरये नमः ! हरये नमः! हरये नमः ! सियावर रामचन्द्र भगवान् की जय।

श्रीगोवर्धननाथ की जय। श्रीगिरिराजधरण की जय।

द्वारकाधीश की जय। श्रीबालकृष्णलाल की जय।

सद्गुरुदेव की जय।

ॐ नमः पार्वतीपतये हर हर महादेव ॥ एवं कृता येन विचित्रलीला मायामनुष्येण नृपच्छलेन । तं वै मरालं मुनिमानसानां श्रीजानकीजीवनमानतोऽस्मि ॥

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