मातेश्वरी तू धन्य है

(धूमलोचन ,चण्ड मुण्ड, बीज वध वर्णन).

धूमलोचन दैत्य अरु, वीर चण्ड अरु मुण्ड। रक्तबीज वध की कथा, थे जो शक्ति कुण्ड।।

सभी देवता हिमाचल पर जगत् की जननी श्रीपार्वतीजी के पास पहुंचे

मातेश्वरी तू धन्य है – ऋषि बोले-शुंभ निशुंभ नाम के दो दैत्य परम पराक्रमी हुए। जिनके तेज से चराचर त्रिलोकी काँप उठी, दोनों से दुःखी होकर सभी देवता हिमाचल पर जगत् की जननी श्रीपार्वतीजी के पास पहुँच उन्हें प्रणाम स्तुति आदि करके बोले-हे भवानी महेशानी! आपको प्रणाम हो, हमारी रक्षा करें।

गौरी के देह से एक कुमारिका का प्रकट होना

तब देवताओं की स्तुति सुनकर गौरी बोलीं-तुम लोग किस की स्तुति कर रहे हो। इतना कहने के बाद उस गौरी के देह से एक कुमारिका प्रकट हो गई तब देवताओं के देखते-देखते गौरीजी से उसने कहा-हे मातेश्वरी! सभी स्वर्गवासी देवता मेरी स्तुति कर रहे हैं।

तब उस कुमारी का नाम शरीर कोश से निकलने के कारण कौशिकी तथा प्रकट होने के कारण मातंगी प्रसिद्ध हुआ। फिर उसने देवताओं से कहा-तुम डरो मत मैं अकेली ही तुम्हारा कार्य करूँगी। इतना कहकर देवी अन्तर्ध्यान हो गयी।

शुम्भ निशुम्भ के सेवको का देवी को देख कर मोहित होना

फिर शुंभ निशुंभ ‘के दो सेवकों ने ज्योंही उसके रूप सौन्दर्य को देखा तो मोहित हो गये। अपने राजा शुंभ निशुंभ के आगे उसके रूप की प्रशंसा करते हुए बोले-एक बड़ी सुन्दरी स्त्री हिमाचल के शिखर पर सिंह वाहिनी होकर निवास कर रही है। देव कन्याएँ तो उसके आगे सेविका रूप हैं।

त्रिलोकी में कोई भी उसके समान सुन्दर नहीं वह नारी रत्न है। हे राजन्! आप तो रत्न भोवत्ता हो वह नारी रत्न तो आपके महलों में होनी चाहिये।

शुम्भ निशुम्भ का सुग्रीव दैत्य को देवी को ले आने के लिए भेजना

यह सुनकर उन असुरों ने सुग्रीव दैत्य को बुलाकर उस सुन्दरी को ले आने के लिये तुषार पर्वत पर भेजा। तब वह हिमालय पर पहुँचकर मातेश्वरी जगदम्बा से बोला-हे देवीजी! इन्द्रादिक देवताओं को वश में करके सभी रत्नों के भोक्ता शुम्भ निशुम्भ नामक दो दैत्यों ने मुझे आपके पास भेजकर कहा है कि तुम स्त्री रत्न हो हम दोनों इतना सुन हम दोनों में से किसी एक के साथ आकर विवाह कर लो ।

सुनकर देवीजी ने कहा-जो वीर मुझे युद्ध में जीत लेगा मैं उसके साथ विवाह करूँगी

सुनकर देवीजी ने कहा-हे दूत! तुम सत्य कह रहे हो। शुम्भ निशुम्भ दोनों पराक्रमी वीर हैं किन्तु मैंने एक प्रतिज्ञा कर रखी है। जो वीर मुझे युद्ध में जीत लेगा मैं उसके साथ विवाह करूँगी। यह सन्देश तुम उन्हें पहुँचा दो।

तब आकर उस दैत्य ने शुंभ को सभी वृत्तान्त सुना दिया। उसको क्रोध उत्पन्न हुआ, अपने सेनापति धूम्राक्ष से बोला-तुम तुषार पर्वत निवासिनी नारी को ले आओ। यदि प्रेम से न आये तो युद्ध करके किसी न किसी प्रकार जबरदस्ती ले आओ।

धूम्राक्ष का मातेश्वरी से युद्ध

यह सुनकर धूम्राक्ष हिमाचल पर पहुंचकर मातेश्वरी से बोला-हे देवीजी! तुम प्रेम पूर्वक हमारे स्वामी के पास चली-चलो। नहीं तो मेरे पास इस समय साठ हजार दैत्य हैं। उनसे मैं तुमको पकड़वाकर ले चलूँगा। तब जगदम्बा बोली -हे वीर! मैं कैसे करूँ अपनी प्रतिज्ञा तो मैं तोड़ नहीं सकती हूँ, युद्ध करके मुझे भले ही ले जाओ।

 देवीजी के हुंकार शब्द द्वारा धूम्राक्ष को भस्म करना

तब धूम्राक्ष शस्त्र उठाकर मारने के लिये ज्योंही दौड़ा त्योंही देवीजी ने हुंकार शब्द द्वारा उसे भस्म कर दिया। उसके भस्म हो जाने पर देवीजी के वाहन सिंह ने क्रोध में आकर उसकी सेना के राक्षसों को भक्षण कर लिया और कुछ भाग गये।

‘जब उस शुंभ ने अपने सेनापति धूम्राक्ष का मारा जाना सुना तो उसे क्रोध हुआ तब चण्ड मुंड एवं रक्तबीज आदि दैत्यों को बुलाकर युद्ध के लिये भेज दिया।

तब सिंह सवार उस जगदम्बा को देखकर वे दैत्य बोले-हे देवी! तू प्रेम पूर्वक शुंभ निशुंभ में से किसी को अपना पति बनाकर शोभा प्राप्त कर। इतना सुनकर वह देवी बोली-जिनकी विष्णु आदि सभी देवता स्तुति करते हैं और जिनके तत्व को वेद भी नहीं जान सकते उस परब्रह्म परमात्मा की में सूक्ष्म प्रकृति हूँ।

फिर भला किसी और को किस प्रकार पति बनाऊँ। हे दैत्य लोगो! यदि कुछ शवित्त है तो मुझे विजयी करके ले जाओ। तब दैत्य बोले-हे देवीजी हम आपको एक अबला नारी समझकर मारना नहीं चाहते थे, किन्तु तू स्वयं ही मरना चाहती है इसलिये अब तैयार हो जा। यह कहकर बाणों की वर्षा करने लगे।

उन दैत्यों ने देवी के भक्तों की गति प्राप्त की।

तब युद्ध में देवी ने चण्ड, मुण्ड, रक्त बीज आदि सभी दैत्यों का अपनी खंग द्वारा वध कर दिया। देवी-शत्रु होते हुए भी उन दैत्यों ने देवी के भक्तों की गति प्राप्त की।

हे मातेश्वरी तू धन्य है

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