श्री वैष्णोदेवी की कथा

श्री वैष्णोदेवी की कहानी कलियुग में भक्त बाबा श्रीधर को माता के कन्या रूप में प्रत्यक्ष दर्शन

वैष्णोदेवी की कथा

वैष्णोदेवी की कथा- कटरा से लगभग २ किलोमीटर की दूरी पर हंसाली नामक ग्राम है। कहा जाता है कि लगभग ७०० वर्ष पूर्व माता के परम भक्त श्रीधर जी हुए हैं जो इसी ग्राम के निवासी थे। वे नित्य नियम से कन्या पूजन करते थे।

सन्तान न होने के कारण वह दुःखी रहा करते थे। श्रीधर जी की सच्ची उपासना और दृढ विश्वास देखकर माँ वैष्णो को स्वयं एक दिन कन्या रूप धारण करके आना पड़ा। भक्त जी कन्या पूजन की तैयारी कर रहे थे, छोटी-छोटी कन्याएं उपस्थित थीं। उन्हीं में जगतमाता भी कन्या बनकर आ गई।

नियम के अनुसार पाव धोकर भोजन परोसते समय श्रीधर जी की दृष्टि उस महा दिव्यरूप कन्या पर पड़ी। भक्त जी विस्मय में डूब गये क्योंकि यह कन्या उन्होंने कभी देखी न थी और न ही उनके गांव की प्रतीत होती थी। अन्य कन्याएं तो दक्षिणा लेने पर चली गई पर यह दिव्यरूपा वहीं बैठी रही।

श्रीधर जी उससे कुछ प्रश्न करने वाले थे कि कन्या रूपी महाशक्ति स्वयं ही बोली मैं तुम्हारे पास एक काम से आई हूँ। छोटी सी कन्या के मुंह से ऐसी विचित्र बात सुनकर भक्त जी बहुत हैरान हुए। कन्या ने कहा कि आप अपने गांव में और आस-पास यह सन्देश दे आओ कि कल दोपहर आपके यहां महान भण्डारे का आयोजन है। इतना कहकर

वह कन्या वहां से लुप्त हो गई। श्रीधर जी विचारों में डूब गए।

आखिर यह कन्या कौन थी ?

हो, न हो यह जरूर कोई शक्ति थी, परन्तु भण्डारे वाली समस्या से श्रीवर जी परेशान हो गये। अन्त में उन्होंने कन्या की बात को ही मुख्य रखा और आस-पास के गांवों में भण्डारे का निमन्त्रण देने निकल पड़े।

श्रीधर जी मण्डारे का संदेश देने एक गांव से दूसरे गांव जा रहे थे तो मार्ग में साधुओं के एक दल को देखकर श्रीधर जी ने उन्हें प्रणाम किया और साथ ही उन्हें होने वाले भण्डारे में पधारने का निमन्त्रण भी दिया।

गोरखनाथ ने भक्त जी से उनका नाम पूछा और मुस्कुराकर बोले-ब्राह्मण ! ५ तू मुझे, भैरवनाथ और ३६० चेलों को भोजन का निमन्त्रण देने में भूल कर रहा है। हमें तो देवराज इन्द्र भी भोजन न दे सके। इस पर श्रीधर जी ने उन्हें कन्या के आगमन वाली सब कथा सुनाई। गोरखनाथ ने विचार किया कि ऐसी कौन सी कन्या है जो सबको भण्डारा खिला सकती है? परीक्षा करके देखना चाहिए। अतः उन्होंने श्रीधर जी से कह दिया हमें भोजन स्वीकार है, कल समय पर आ जायेंगे।

उस दिन तो श्रीधर जी गांव-गांव घूमते, थके-हारे रात को आकर सो गये। प्रातःकाल होते ही फिर पंडित जी इस विचार में खो गये कि मुझ में तो इतने बड़े भण्डारे की सामर्थ्य नहीं, प्रबन्ध कैसे हो ? न मालूम समय कब बीत गया और भीड़ एकत्रित होने लगी। उधर गोरखनाथ और भैरवनाथ भी अपने चेलों सहित आ गये।

श्रीधर जी चिन्ता में बैठे थे कि अचानक ही दिव्य-रूपी कन्या प्रकट हो गयी और पंडित जी के सम्मुख आकर बोली- अब सब प्रबन्ध हो जाएगा। उठिए, और जोगियों से कहिए कि कुटिया में चलकर भोजन करो । श्रीधर जी उत्साह से उठे और गुरुजी से भोजन के लिए कुटिया में पधारने को कहा तो गुरुजी बोले-‘हम चेलों सहित इस कुटिया में नहीं आ सकते क्योंकि स्थान बहुत छोटा है। इस पर श्रीधर जी बोले-जोगीनाथ उस कन्या ने ऐसा ही कहा है।

जिस समय योगी कुटिया में गये तो सबके साथ आराम से बैठ गए फिर भी जगह बची रही। बाहर भी सब लोग बैठे थे। कन्या ने जब अपने एक विचित्र पात्र से सबको भोजन देना आरम्भ किया तो श्रीधर जी प्रसन्न हुए और बाकी सब हैरान।

यह देखकर गोरखनाथ और भैरव ने परस्पर विचार किया कि यह कन्या अवश्य ही कोई शक्ति है। यह वास्तव में कौन है, इसका पता लगाना चाहिए। जिस समय कन्या सबको भोजन परोसती हुई भैरवनाथ के पास पहुँची तो भैरव ने कहा- कन्या! तूने सबको उनकी इच्छा का भोजन दिया है लेकिन मेरा मन कुछ और चाहता है। ‘बोलो योगीनाथ तुम्हें क्या चाहिए ? कन्या का उत्तर था। भैरव ने देवी से मांस और मदिरा मांगी तो कन्या ने जोगी को आदेश के स्वर में कहा-यह एक ब्राह्मण के घर का भण्डारा है। जो कुछ वैष्णव भण्डारे में होता है, वही मिलेगा।

भैरव हठ करने लगा, क्योंकि उसे तो कन्या की परीक्षा लेनी थी. लेकिन भैरवनाथ के मन की बात तो वैष्णवी देवी पहले ही जान चुकी थी। ज्योंही भैरव ने क्रोध करके कन्या को पकड़ना चाहा, वह कन्या रूपी महाशक्ति अन्तर्ध्यान हो गयी।

भैरवनाथ ने योगविद्या के बल से देखा कि वह दिव्यकन्या पवनरूप होकर त्रिकूट पर्वत की ओर बढ़ रही है। अतः योगीराज भैरव ने पीछा करना आरम्भ कर दिया। दर्शनी दरवाजा बाणगंगा, चरणपादुका आदि स्थलों से होकर आदिकुमारी वाले स्थान पर पहुँचकर गर्म-योनि गुफा में देवी ने नौ महीने तक विश्राम किया। भैरव फिर भी खोज करता रहा अन्त में किस प्रकार सुन्दर गुफा के समीप पहुँच कर देवी ने भैरव का वध किया।

उधर भक्त श्रीधर जी को कन्या के अचानक चले जाने से अत्यधिक बेचैनी थी। उन्होंने खाना-पीना भी त्याग दिया था। परन्तु माता तो अपने प्रत्येक भक्तों के दिल को जानती है। अतएव एक रात स्वप्न में वैष्णों माँ ने श्रीधर जी को दर्शन दिए और अपने घाम का दर्शन कराया स्वप्न में ही भक्त जी ने माता के साथ सम्पूर्ण यात्रा की। प्रातः काल श्रीधर जी उठे जो बहुत प्रसन्न थे। स्वप्न में देखे हुए स्थानों से उनका हृदय अब तक पुलकित था।

उसी दिन से पण्डित जी वैष्णवी देवी के साक्षात दरबार की खोज करने लगे। एक दिन स्वप्न में देखे अनुसार चलते-चलते गुफा का द्वार देख लिया और उससे प्रवेश करके माता के दरबार के साक्षात दर्शन करके जीवन सफल बना लिया।

श्रीधर जी ने हाथ जोड़कर जगदम्बे की आराधना की माता ने उन्हें चार पुत्रों का वरदान दिया और कहा कि तुम्हारा वंश मेरी पूजा करता रहेगा। सुख-शान्ति की प्राप्ति होगी। इसीलिए आज तक उन्हीं का वंश माँ की पूजा करता आ रहा है।

इसके बाद श्रीधर जी ने गुफा का प्रचार किया। भक्तों की मनोकामनाए पूर्ण होती रहीं, प्रचार बढ़ता रहा। हजारों-लाखों यात्री प्रतिवर्ष माँ के दर्शनों के लिए आने लगे और वैष्णो देवी नाम से तीर्थ प्रसिद्ध हो गया।

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