श्री हनुमान चालीसा – जय हनुमान ज्ञान गुण सागर

हनुमान चालीसा

माता अंजनी पूर्व जन्म में इंद्र राज महल की अप्सरा थी उनका नाम पूंजीकस्थला था। उनका रूप बहुत ही आकर्षक और सद्भाव बहुत चंचल था ।

चंचलता के कारण उन्होंने एक ऋषि के साथ अभद्र व्यवहार किया ।जिस कारण उन्हें वानर रूप होने का श्राप मिला था । पूंजीकस्थला को आत्मग्लानि हुई और अपना रूप वापस लेने के लिए विनती की ।

तब ऋषि जी ने कहा आप का यह रूप भी तेजस्वी होगा और बहुत ही कीर्तिमान तेजस्वी पुत्र को आप जन्म दोगी ।

निश्चित स फिर पुंजिकास्थला इंद्र के पास वापस चली गई तब सारी बात जाकर उसने इंद्र को बताई तो इंद्र ने उसको धरती पर जाने के लिए कहा ।

धरती पर आने के बाद उसका राजकुमार पवन से विवाह हुआ और उनको शिवजी जी के अवतार श्री हनुमान जी का जन्म पुत्र रूप में हुआ।

चालीसा

हनुमान चालीसा एक भक्ति गीत है जो भगवान हनुमान, जो कि एक आदर्श भक्त के रूप में जाने जाते है, पर आधारित है।

यह चालीसा गोस्वामी तुलसीदास द्वारा अवधी भाषा में लिखी गई एक कविता है। चालीसा शब्द हिन्दी में चालीस से लिया गया है, जिसका अर्थ 40 है, क्योंकि हनुमान चालीसा में 40 छन्द होते हैं।

श्री हनुमान चालीसा
॥ दोहा ॥

श्री गुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुर सुधारि। बरनउं रघुबर विमल जसु, जो दायकु फल चारि ॥
बुद्धिहीन तनु जानिकै,सुमिरौं पवन-कुमार। बल बुद्धि विद्या देहु मोहिं, हरहु कलेश विकार ॥

॥ चौपाई ॥

जय हनुमान ज्ञान गुण सागर। जय कपीस तिहुँलोक उजागर॥

राम दूत अतुलित बल धामा अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा॥

महावीर विक्रम बजरंगी । कुमति निवार सुमति के संगी॥

कंचन बरन बिराज सुवेसा । कानन कुण्डल कुंचित केसा॥

हाथ वज्र औ ध्वजा बिराजै।काँधे मूँज जनेऊसाजै ॥ शंकर सुवन केसरीनन्दन । तेज प्रताप महा जग वन्दन॥

विद्यावान गुणी अति चातुर । राम काज करिबे को आतुर ॥

प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया।राम लखन सीता मन बसिया॥

सूक्ष्म रुप धरि सियहिं दिखावा । विकट रूप धरिलंक जरावा॥

भीम रूप धरि असुर संहारे। रामचन्द्र के काज संवारे ॥

लाय सजीवन लखन जियाये । श्रीरघुवीर हरषि उर लाये॥

रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई । तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥

सहस बदन तुम्हरो यश गावैं । अस कहि श्री पति कंठ लगावैं ॥

सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा। नारद सारद सहित अहीसा॥

जम कुबेर दिकपाल जहां ते । कवि कोबिद कहि सके कहां ते॥

तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा । राम मिलाय राजपद दीन्हा ॥

तुम्हरो मन्त्र विभीषन माना । लंकेश्वर भये सब जग जाना॥

जुग सहस्त्र योजन पर भानू । लील्यो ताहि मधुर फ़ल जानू॥

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं । जलधि लांघि गए अचरज नाहीं॥

दुर्गम काज जगत के जेते । सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते ॥

राम दुआरे तुम रखवारे। होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥

सब सुख लहै तुम्हारी सरना । तुम रक्षक काहू को डरना ॥

आपन तेज सम्हारो आपै । तीनों लोक हांक तें कांपै॥

भूत पिशाच निकट नहिं आवै । महावीर जब नाम सुनावै॥

नासै रोग हरै सब पीरा । जपत निरंतर हनुमत बीरा ॥

संकट ते हनुमान छुड़ावै । मन क्रम वचन ध्यान जोलावै॥

सब पर राम तपस्वी राजा । तिन के काज सकल तुम साजा ॥

और मनोरथ जो कोई लावै । सोइ अमित जीवन फ़ल पावै॥

चारों जुग परताप तुम्हारा। है परसिद्ध जगत उजियारा॥

साधु सन्त के तुम रखवारे। असुर निकन्दन राम दुलारे ॥

अष्ट सिद्धि नवनिधि के दाता। अस बर दीन जानकी माता॥

राम रसायन तुम्हरे पासा।सदा रहो रघुपति के दासा॥

तुम्हरे भजन राम को पावै । जनम जनम के दुख बिसरावै॥

अन्तकाल रघुबर पुर जाई । जहाँ जन्म हरि-भक्त कहाई॥

और देवता चित्त न धरई।हनुमत सेई सर्व सुख करई॥

संकट कटै मिटै सब पीरा। जो सुमिरै हनुमतबलबीरा ॥

जय जय जय हनुमान गोसाई । कृपा करहु गुरुदेव की नाई॥

जो शत बार पाठ कर सोई । छूटहिं बंदि महा सुख होई॥

जो यह पढ़े हनुमान चालीसा | होय सिद्धि साखी गौरीसा॥

तुलसीदास सदा हरि चेरा । कीजै नाथ ह्रदय महँडेरा ॥

॥ दोहा ॥

पवनतनय संकट हरन, मंगल मूरति रुप। राम लखन सीता सहित,ह्रदय बसहु सुर भूप ॥

आरती

आरती कीजै हनुमान लला की भगवान हनुमान की सबसे प्रसिद्ध आरती है।

यह प्रसिद्ध आरती भगवान हनुमान से सम्बन्धित अधिकांश अवसरों पर गायी जाती है।

श्री हनुमानजी आरतीआरती कीजै हनुमान लला की। दुष्ट दलन रघुनाथ कला की ॥

जाके बल से गिरिवर कांपे। रोग दोष जाकेनिकट न झांके॥

अंजनि पुत्र महा बलदाई । सन्तन के प्रभु सदा सहाई॥

दे बीरा रघुनाथ पठाए।लंका जारि सिया सुधि लाए॥

लंका सो कोट समुद्र-सी खाई।जात पवनसुत बार न लाई॥

लंका जारि असुर संहारे । सियारामजी के काज सवारे॥

लक्ष्मण मूर्छित पड़े सकारे।आनि संजीवन प्राण उबारे॥

पैठि पाताल तोरि जम-कारे । अहिरावण की भुजा उखारे ॥

बाएं भुजा असुरदल मारे । दाहिने भुजा संतजन तारे ॥

सुर नर मुनि आरती उतारें। जय जय जय हनुमान उचारें ॥

कंचन थार कपूर लौ छाई। आरती करत अंजना माई ॥

जो हनुमानजी की आरती गावे । बसि बैकुण्ठ परम पद पावे॥

चालीसा

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