Shri bankebihari ji ki katha

श्री बाँकेबिहारी जी कैसे प्रकट हुए ?

श्रीस्वामी हरिदास जी महाराज जी द्वारा कैसे प्रकट हुए बिहारी जी ?

bankebihari ji ki katha – श्री बिहारीजी महाराज के दर्शन तो आपने किये ही होंगे। मन्दिर के विशाल चौक में प्रवेश करते ही ऊंचे जगमोहन के पीछे निर्मित गर्भगृह में भव्य सिंहासन पर विराजमान -श्री बिहारीजी के दर्शन होते हैं।

उन्हें वामांग में उनकी प्रियतम परम दुलारी श्रीश्यामा प्यारी की गद्दी सेवा है और उन्हीं के बगल में छोटे से चित्रपट के रूप में विराजमान हैं श्री स्वामी। हरिदास जी

इन्हीं स्वामी श्रीहरिदासजी की कृपा से आज लाखों-करोड़ों भावुक भक्तों काहृदय श्रीबिहारीजी महाराज के दर्शनों का सौभाग्य प्राप्त करके परम संतृप्ति और अक्षय सुख-समृद्धि की उपलब्धि कर रहा है।

आइये, इन स्वामी हरिदासजी के विषय में कुछ जानें-समझें

श्रीगर्गाचार्य जी का नाम संभव है आपने सुना हो। वे सारस्वत ब्राह्मण और यादवों के कुलगुरु थे। श्रीकृष्ण और श्रीबलराम जी के जात-कर्म-उपनयन आदि सभी संस्कार इन्होंने ही सम्पन्न कराये थे।

इन्हीं गर्गाचार्य जी के वंशजों की एक शाखा ब्रज से हजारों वर्ष पूर्व उत्तर भारत, विशेषत: पंजाब प्रदेश में श्रीकृष्ण भक्ति का प्रचार करने के लिये गई थी। गर्गाचार्य के ये वंशज परम्परा से श्रीकृष्ण के अनन्य भक्त, भागवत पुराण के प्रवक्ता, श्रीराधामाधव के उपासक और भक्ति तत्व के उपदेशक थे।

मुलतान के उच्चग्राम को, जो अब पाकिस्तान में है, इन्होंने अपना केन्द्र बनाया। आगे चलकर सैकड़ों पीढ़ियों के बाद इसी वंश में स्वामी श्री आशुधीर जी महाराज का आविर्भाव हुआ।

इनकी पत्नी का नामगंगादेवी था। मान्यता है कि श्रीआशुधीर जी और गंगादेवी क्रमशः श्रीगिरिराज गोवर्धन और मानसी गंगा के अवतार थे। स्वामी श्रीहरिदास इन्हीं के आत्मज थे।

श्रीस्वामी हरिदासजी के जन्म से पूर्व स्वामी आशुधीरजी अनेक तीर्थों का भ्रमण-दर्शन करते हुए अलीगढ़ जनपद की “कोल” तहसील में व्रज की कोर पर आकर एक गाँव में ठहरे। वहाँ गाँववासियों के आत्मीयतापूर्ण मधुर व्यवहार और आग्रहको देखकर वे वहीं बस गये।

इसी गाँवमें रहते हुए गंगादेवी ने क्रमशः तीन पुत्रों को जन्म दिया श्री हरिदास, श्रीजगन्नाथ और श्रीगोविन्द यों तो तीनों ही भाई बड़े संस्कारी थे, किन्तु उनमें श्रीहरिदास जी का व्यक्तित्व बड़ा ही विलक्षण था।

वे बचपन से ही एकान्तप्रिय थे। अनासक्त भाव से भगवद् भजन में लीन रहने से उन्हें बड़ा सुख मिलता था। श्रीहरिदासजी का कंठ बड़ा मधुर था

जब वे कोई भजन गाते थे या कोई रागिनी छेड़ते थे तो गाँव भर के स्त्री- -पुरुष, बूढ़े बच्चे अपना काम छोड़कर उन्हें आ घेरते थे और गीत के मनोमुग्धकारी राग को सुनकर आनन्द-रस में निमग्न हो जाते।

धीरे-धीरे श्रीहरिदासजी के यश का प्रकाश आसपास के गांवों में भी फैलने लगा और किशोर वयस्क के होते-होते उनका यह प्रकाश इतना प्रखर हो गया कि उस गाँव के लोग श्रीहरिदासजी का गाँव कहकर पुकारने लगे, जो आगे चलकर “हरिदास” नाम से प्रसिद्ध हो गया। आज भी वह इसी नाम से जाना जाता है।

अभी तीनों भाईयों में यौवन की देहली पर पैर रखा ही था कि उनका विवाह हो गया। तीनों भाई गृहस्थ जीवन में प्रविष्ट हो गये, किन्तु श्रीहरिदासजी के लिये जैसे कुछ हुआ ही नहीं। वे अब भी पूर्व की भांति ही अपनी साधना में लीन रहे।

इस प्रकार एक लम्बा समय व्यतीत हो गया। ऊपर अन्य दोनों भाईयों ने सद्गृहस्थ की तरह अपना जीवन व्यतीत किया और उनकी संताने माताओं के अचिलों की छाया से निकलकर गांव के खेत-खलिहानों तक खेलने लगी।

इनमें श्री जगन्नाथ जी के तीन पुत्र थे विवि जी और श्रीकृष्णप्रसादजी”स्वामी हरिदासजी की आसक्ति तो अपने श्यामा कुंजबिहारी के अतिरिक्त अन्य किसी में भी नहीं।

किन्तु अपने धातू जो (भतीजों) के प्रति उनका स्नेह अवश्य था क्योंकि ये सब भी संस्कारी थे, श्रीहरि के प्रति उनकी निष्ठा थी और स्वामी हरिदासजी के प्रति से समर्पित थे। स्वामी हरिदासजी चाहते थे कि संसार की मिथ्या रंगीनियों में न उलझकर श्रीहरि के सच्चे प्रेम-रस-रंग की ओर ही आकृष्ट बने रहें।

इसलिये उन्हें वे सदा ऐसा ही सन्देश- उपदेश देते रहते थे। श्री आशुधीरजी ने हरिदासजी को वैष्णवी दीक्षा दी थी। एक दिन गंगादेवी ने बड़े प्यार से हरिदासजी की पत्नी हरिमती से कहा- “बेटी मैं तेरी पीड़ा समझती हूँ, पर क्या करूँ? कुछ कर नहीं सकती हूँ।

मैं इस भय से हरिदास से कुछ भी नहीं कह सकती कि कहा-सुनी करने से वह कहीं पर छोड़कर अन्यत्र न चला जाये। “हम ने गम्भीर भाव से कहा- “माताजी मुझे यह पीड़ा कतई नहीं है, जिसका अनुमान आप लगा रही हैं।

मैं तो कभी-कभी यह सोचकर अधीर हो जाती हूँ कि इन्होंने मुझे अपने मार्ग की बाधा समझ लिया; जबकि मैं हर प्रकार से इनकों इनके मार्ग पर आगे बढ़ने में सहयोग करने का संकल्प लेकर बैठी हूँ।”

“कभी अपने ये विचार तुमने अपने पति के सामने प्रकट भी किये हैं क्या?” गंगादेवी ने पूछा हरिमती बोलीं-“प्रकट तो तब करें, जब मौका मिले थे तो घर में आते ही किसी दूसरे लोक में चले जाते हैं, फिर मेरी हिम्मत ही नहीं होती कि कुछ कहूँ।”

गंगादेवी ने समझाया- आज तुम कोशिश करके देखना, ऐसे जिन्दगी कैसे कटेगी।रात्रि का समय था। चारों ओर चन्द्रमा की उज्ज्वल ज्योत्सना में नहाई हुई प्रकृति निस्तब्ध लेटी थी। उस समय स्वामीजी अपने कक्ष में साधनालीन थे। तभी हल्की-सी पदचाप के साथ किवाड़ खोलकर किसी के भीतर आने की आहट हुई।

हरिदासजी ने आंखें खोली तो उन्हें पास जलते दीपक के झीने प्रकाश में लाज में लिपटी एक परम रूप सौन्दर्यमयी युवती के दर्शन हुए। हरिदासजी ने पूछा- “इतनी रात व्यतीत हो जाने पर भी आप सोई नहीं ?

रात्रि के ये शान्त पल तो सांसारिक प्राणियों के विश्राम के हेतु होते युवती ने उत्तर दिया-“हेप्राणनाथ! मैं आपकी सहचारी हूँ, अनुगामिनी हूँ आप जागे और मैं सोऊँ-इसे मैं अपने लिये उचित नहीं समझती।”

“तो तुम भी अपने कक्ष में जाकर श्रीहरि की आराधना करो। श्रीहरि का भजन ही मानव जीवन का परमार्थ है”।हरिदासजी ने समझाया।

हरिमती से संशोधन किया “आपके जीवन की परमार्थता वस्तुतः श्रीहरि भजन में ही है; किन्तु मेरे जीवन की परमार्थता तो आपके श्रीचरणों की सेवा में है। आप जिस किसी भी लक्ष्य की ओर बढ़ेंगे, मैं आपको वचन देती हूँ कि मैं सदा आपके पीछे रहूँगी।

सदा आपका मार्ग प्रशस्त करूंगी। कभी आपके पथ की बाधा नहीं बनूंगी।”हरिदासजी ने एक क्षण सोचकर कहा- “इसका प्रमाण”

इतना सुनते ही हरिमती के मुखमण्डल पर एक अद्भुत तेज दीप उठा। उन्होंने वहाँ जलते हुए दीपक की ओर हाथ जोड़कर कहा- “हे अग्नि देव! स्वामी प्रमाण माँग रहे हैं, मेरी कुछ सहायता करो।”

कहते हैं कि उसी समय दीपक की लौ में से एक दिव्य ज्योति प्रकट हुई। उसने हरिमती की सुहाग सज्जित देह को अपने में समेटा और हरिदासजी के चरणों में विलीन हो गई। मणी को फणी से अलग करना सम्भव है; किन्तु सती को पति से दूर करना विधाता के लिये भी सम्भव नहीं है।

कुछ देर बाद परिवार के अन्य सदस्य भी वहाँ आ गये “क्या हुआ उनके पूछने पर स्वामी हरिदासजी ने यद्यपि सबको सच-सच बता दिया था; किन्तुस्वामी आशुधीर जी और गंगादेवी के अतिरिक्त किसी ने भी इस अनहोनी विलक्षण घटना पर विश्वास नहीं किया।

उन्होंने अनुमान लगा लिया कि हरिमती ने दोनों हाथ में हाथ भर-भरकर जो लाख की चूड़ियाँ पहन रखी थी उनसे असावधानीवन दीपक की लौ छू जानेके कारण ही संभवतः यह हादसा हुआ होगा।

तभी से परिवार की महिलाओं को लाख की चूड़ियाँ पहनना निषिद्ध कर दिया गया। आज भी गोस्वामी समाज की बहुऐं विवाह महोत्सव पर पहिने जाने वाली चूड़ियाँ लाख की नहीं धारण करती हैं।

वर्तमान में हरिमती की समाधि”विजय सती” की समाधि के नाम से वृन्दावन में विद्यापीठ चौराहे पर बनी हुई है। आज भी मुण्डन विवाह आदि पवित्र संस्कारोत्सवों पर गोस्वामी समाज की महिलायें गीत वाद्यों के साथ वहाँ जाती हैं और विशेष अर्चना पूजा करती हैं।

पत्नी के अन्तर्हित होने के उपरान्त वे अपनी मंजिल तक पहुँचने के लिये विशेष उतावले हो रहे थे कि एक दिन सुयोग पाकर उन्होंने अपने पिता के पास जाकर विनयपूर्वक कहा- “आप मेरे पिता ही नहीं गुरु हैं।

जैसे अनेकानेक अन्य साधकों को आप जगत के आपातरमणीय विषय-भोगों के भ्रमजाल से मुक्त करके श्रीहरि की ओर अग्रसर करते रहते हैं; उसी प्रकार आपने मुझे भी सांसारिक विस्तार का विनश्वर स्वरूप समझाकर इससे बचते हुए श्रीहरि की ओर जाने का उपदेश किया है।

आज उस पथ पर अग्रसर होने का अवसर आ गया है। वृन्दावन जू मुझे बुला रहे हैं। निकुंज बिहारी युगल किशोर का प्रेमानन्द मेरे प्राणों को आकृष्ट कर रहा है।

मैं संसार के कटीले बन्धनों से मुक्त होकर उस चिरन्तर प्रेम के पाश में बंधने जा रहा हूँ, जिसके मधुर वेणुनिनाद पर कोटि-कोटि ब्रह्माण्ड आनन्दामृतरस में डूबकर निरन्तर थिरकते रहते हैं। मुझे मेरे गन्तव्य पथ पर जाने की अनुमति देकर अनुगृहीत करने की कृपा करें।”

पुत्र की बात सुनकर स्वामी आशुधीरजी ने परम प्रसन्न होते हुए कहा-“जाओ! अनुमति है, कोटि-कोटि शुभकामनाओं के साथ अनुमति है।

जाओ, अपने आपको पहचानों, अपने आराध्य के स्वरूप को पहचानो और प्रेम तथा आनन्द के उस सनातन खेल को देखो, जिसका न आदि है और न अन्त। विश्व का जो कुछ भी विलास है वह उसी खेल का प्रतिबिम्व है। विश्व का जो कुछ भी आनन्द है उसमें उसी प्रेमामृत की मधुरिमा है। जाओ, तुम्हारा कल्याण हो।’

हरिदासजी माता-पिता की चरणधूलि मस्तक पर रखकर जैसे ही चलने लगे तो क्या देखते हैं कि न केवल उनके परिवार के सभी सदस्य, अपितु गाँव के अधिकांश लोग भी उनके साथ जाने को तैयार खड़े हैं।

हरिदासजी को हँसी आ गई, बोले- “मैं वृन्दावन जा रहा हूँ, देखा है तुम लोगों ने वृन्दावन ?

वहाँ घोर जंगल है, एक दूसरे में उलझे खड़े ऊँचे

वृक्ष, यमुना के कटे-फटे गहरे कछार, हिंसक जानवरों का जमवाड़ा और कुश कंटकों से भरी घरती न वहाँ रहने को कोई जगह है, न खाने-पीने का कोई सिलसिला। आप सब थोड़े दिन और यहीं रहें, जैसे ही वहाँ कुछ सुविधा हो जायेगी तब तुम सब भी वहाँ आ सकोगे। “

गोविन्द जी का बड़ा पुत्र विट्ठलविपुल उनके पीछे-पीछे चल दिया। इसके बाद हरिदासजी ने गोविन्द जी को अपने पास बुलाया और उनसे बोले- “देखो गोविन्द भैया, यों तो सबकी देख-रेख करने वाला कोई दूसरा ही है;

किन्तु लोक व्यवहार की दृष्टि से मैं कहरहा हूँ कि मेरे पीछे पिताजी की देखभाल और ठा. राधामाधव की अर्चापूजा का दायित्व तुम पर है, जो स्नेह और ममत्व तुम्हारा विट्ठल के प्रति है उसी स्नेह और ममत्व के साथ तुम माता-पिता की सेवा और संभार में संलग्न रहना। अच्छा तो हम चलते हैं। “

उनको जाता देख वहाँ खड़े लोंगों में से कुछ उदास हुए, कुछ ने आँसू बहाये, कुछ सिसके और पाषाण प्रतिमायने गुमसुम खड़े रहे। इसी बीच स्वामी हरिदासजी वृन्दावन की ओर जाने वाली डगर पर डग बढ़ाते हुए जल्दी-जल्दी चल पड़े।

पच्चीस वर्ष की अवस्था में में यमुनाजी को पार करके उसके किनारे पर ही वे वहाँ साधनारत हो गये जहाँ आज निधिवनराज अवस्थित हैं।

स्वामीजी के वृन्दावन पहुँचते ही वृन्दावन का दिव्यस्वरूप प्रकट हो गया।

यमुनाजी के उज्ज्वल निलाभ जल में रंग-बिरंगे कमल खिल उठे उन पर श्यामाश्याम की श्याम सच्चिकरण अलकावली के सदृश्य भंगावलियाँ गुंजारने लगीं। विविध प्रकार के जलचर उसमें कलरव करते हुए विचरण करने लगे।

हरी-भरी वृक्षावलियों से लिपटकर भाँति-भाँति की वल्लरियाँ सुन्दर सुखद कुंज-निकुंजों की रचना करने लगीं। कोकिल केकी-कीर चकोर आदि विहग-वृंद-आनन्द में झूमते हुए अद्भुत गीत-संगीत की सृष्टि करने लगे।

इसी मधुरिम मनोहर वातावरण में स्वामी हरिदासजी जब तानपुरा लेकर अपने संगीत की अलौकिक स्वर लहरियाँ बिखरते तब सम्पूर्ण वृन्दावन थिरकने लगता था, कुंजों के अभियंतर से निकलकर नूपुरों की रुनझुन विठ्ठलविपुल के किशोर हृदय को कौतूहल से भर देती।

वे सोचने लगते कि ये तानपुरे की झंकार तो है नहीं, फिर यह अतिशत कोमल नुपूर ध्वनि प्रवाह का उद्गम कहाँ है?

ये अपनी जिज्ञासा भी आँखें अपलक भाव से श्रीस्वामी के मुखारविन्द पर टिकाकर उसे समझने की कोशिश करते; किन्तु अन्ततः स्वामीजी के नेत्रों में तैरती भावभंगिमाओं के आकर्षण में डूबकर रह जाते।

एक दो बार उन्होंने स्वामीजी से इस विषय में जिज्ञासा भी की तो उन्होंने यह उत्तर दिया कि समय आने पर सब समझ जाओगे। स्वामीजी संगीत के माध्यम से अपने प्राणाराध्य श्यामा-कुंजबिहारी को रस विलासते हैं।

यह बात तब उनकी समझ में नहीं आई थी, किन्तु इतना तो वे विश्वासपूर्वक समझ गये थे कि स्वामीजी इस सृष्टि की वस्तु नहीं हैं, कोई अलौकिक विभूति हैं।

गोविन्द जी और उनकी पत्नी ने सोचा था कि बालक विट्ठविपुल घूमने फिरने के कौतूहल से श्रीहरिदासजी के साथ चला गया है कुछ दिन में ऊबकर परिवार में लौट आयेगा।

किन्तु कई वर्ष बीतने के बाद भी जब वह वापिस नहीं आया तो गोविन्दजी पुत्र वात्सल्य से व्याकुल होकर उसकी खोज खबर लेने को वृन्दावन जाने को उद्यत हुए। किन्तु स्वामी आशुधीरजी ने उन्हें रोक दिया-

“हरिदास ने तुम्हें ठाकुर राधामाधव की सेवा का भार कुछ सोचकर ही सौंपा है, तुम हरिदास को नहीं पहचानते, वे एक अवतारी विभूति हैं, किसी विशेष उद्देश्य से ही इस धराधाम पर उनका आविर्भाव हुआ है।

तुम देख नहीं रहे हो कि संसार के काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, द्वेष आदि विकार जो सभी मनुष्यों में सामान्य रूप से सहर्ष दिखाई देते हैं, उनका लेश भी हरिदास में नहीं है। यदि कुशल मंगल लाने का ही प्रश्न है तो मैं जगन्नाथ को भेज देता हूँ।

स्वामी आशुधीरजी श्रीहरि के प्रति अपनी अविचल अनन्य भक्ति के बल से संभवत: पहले से ही जानते थे कि इस परिवार का कौन सा सदस्य किस उद्देश्य से जन्मा है। उन्होंने जगन्नाथ जी को वृन्दावन भेज दिया।

जब से स्वामी हरिदासजी वृन्दावन आये थे, तब से कितनी ही बार उन्होंने स्वप्न में इस वन के दर्शन किये थे। वे और थोड़ा आगे बढ़े तो एक ललितललाम निकुंज के द्वार पर बैठकर तानपुरा बजाते हुए स्वामी हरिदासजी उन्हें दिखाई दिये।

पास ही विठ्ठलविपुलजी भी उपस्थित थे। दोनों के शरीर यमुना जी की रज से पुते हुए थे। और दोनों किसी अलक्षित दृश्य के आकर्षण में ऐसे खोए थे कि उन्हें किसी के आने-जाने का ध्यान ही नहीं था। जगन्नाथजी उनके पास आकर बैठ गये और संगीत का आनन्द लेते रहे।

कुछ समय बाद जब स्वामीजी की चेतना लोक में लौटी। तो उन्होंने जगन्नाथजी को स्नेहासिक्त दृष्टि से निहारते हुए कहा-

“स्थायी रूप से वृन्दावनवास के लिये कब आ रहे हो ? “

उत्तर में जगन्नाथजी उनके पैरों में लिपट गये, बोले- “गुरुदेव! अब मुझे जाने को न कहें, मैं अब तक किसी अज्ञान प्यास से तड़पता हुआ, उसकी तृप्ति के लिये तपते रेत से भरे रेगिस्तानों में भागता रहा हूँ, वहाँ थकन और जलन के अतिरिक्त और कुछ नहीं मिला।

वृन्दावन की इन हरीभरी कुंज-निकुंजों के मध्य आपके चरणों की धूल का स्पर्श पाकर आज भरे प्यासे प्राणों ने अमृत सिन्धु का किनारा देखा है। आशीर्वाद दें कि अब मैं आगे बढ़कर इस आनन्दामृतरस सिन्धु में आमूलचूल निमग्न हो जाऊँ। “

स्वामीजी ने जगन्नाथ को उठाकर कंठ से लगा लिया, आनन्द प्रवाह से दोनों की आँखें छलछला आई, स्वामीजी ने कहा- “जगन्नाथ! सारे प्राणियों की एकमात्र गति यह श्रीहरि का प्रेम समुद्र ही है।

मैं चाहता हूँ कि ये सब प्राणी जल्दी-जल्दी से इस रस वृन्दावन में आ जायें, ताकि ये अनन्तकाल से विभिन्न योनियों में चक्कर काटने से बच सकें।”

इसी बीच विठ्ठलविपुलजी जो अब तक शांतभाव से बैठे सब बातें सुन रहे थे, अचानक बोल उठे- “पर आपकी कृपा के बिना इस भीषण संसार सागर को पार करके कोई इस पार कैसे आ सकता है। “

स्वामी हरिदासजी के होठों पर हल्की सी मुस्कराहट फैल गई। उन्होंने कहा “जैसे तुम और जगन्नाथ आये हो वैसे ही ये सब भी आयेंगे।

धीरे-धीरे श्रीहरि की प्रेरणा पाकर स्वामी हरिदास की कृपा का तम्बू फैलता गया और बहुत से संस्कारी व्यक्ति इसके नीचे आकर संसार की तपन से मुक्त होने लगे।

इस जन-कोलाहल विहीन प्रदेश में थिरकता हुआ स्वामीजी का संगीत किसके लिये समर्पित है यह प्रश्न श्री विठ्ठलविपुल के भीतर निरन्तर स्पन्दन करता रहता था।

इसी प्रश्न के साथ एक प्रश्न और जुड़ गया कि स्वामी जी जिस निकुंज के द्वार पर बैठकर संगीत की रागिनी छेड़ते हैं, उसके भीतर कौन विद्यमान है। जिससे वे एकान्त में बातें भी करते रहते हैं।

विठ्ठलविपुलजी ने अनेक बार उसके भीतर झाँककर देखा था किन्तु उन्हें अंधेरे के अतिरिक्त और कुछ दिखाई नहीं दिया था। एक दिन तो वे उसमें घूमकर भी देख आये थे।

इस सम्बन्ध में उन्होंने जगन्नाथजी से भी पूछा था तो उन्होंने कहदिया था-“स्वामीजी की लीला स्वामीजी ही जानें। देख नहीं रहे हो यहाँ के सारे रंग-ढंग ही निराले हैं, तुमने ही तो उस दिन कहा था कि कुछ खाने-पीने को सामने होता है तभी यहाँ भूख-प्यास लगती है

-अन्यथा तो भूख-प्यास की अनुभूति तक यहाँ नहीं होती। मुझे लगता है कि उस विशिष्ट निकुंज में ही कुछ रहस्य छिपा है जो स्वामीजी की कृपा से ही ज्ञान-गोचर हो पायेगा।

” इसी बीच स्वामीजी ने विट्ठलविपुलजी को अपने पास बुलाया, पूछा- “तुमजानते हो आज किसका जन्मदिन है। “विठ्ठलविपुलजी ने कहा- “नहीं तो।

“ठीक है, न जानना ही अच्छा है। देखो, आज तुम्हारा ही जन्म दिन है, इस अवसर पर मैं तुम्हें कुछ सौगात देना चाहता हूँ। “

मुझे सौगात नहीं चाहिये। मेरी तो केवल एक ही चाह है, उस नित्य-नूतन लता-निकेतन का रहस्य जानना, आपके प्राणाराध्य श्यामा-कुंजबिहारी के स्वरूप की एक झलक पाना।

” वही तो, बड़ी सौगात मैं आज तुम्हें देना चाहता हूँ।’ “गुरुदेव!”विठ्ठलविपुल आनन्द से सिहर उठे। “हाँ, तो बुलाओ सब समाज को, जगन्नाथ को भी सबको।’

समाज जुड़ गया, स्वामीजी नेत्र मूंदे बैठे थे। हाथ तानपुरे पर था। सबके सब विमुग्ध थे। वहाँ ऐसा कौन था जो रस में न डूबा हो ।

संगीत के स्वरों के आरोह के साथ ही सबने अपने अन्तर में एक अद्भुत प्रकाश का अनुभव किया तभी उस नूतन निकुंज में भी नील-गौर-प्रकाश की कोमल किरणें फैलने लगीं। सब एकटक देख रहे थे।

कुछ दिव्य घटित होने जा रहा था। प्रकाश पुंज बढ़ता गया-बड़ारोमांचक बड़ा आनन्दमयी और तब उसके बीच परस्पर हाथ थामे मुस्कुरातेहुए श्यामा- कुंजबिहारी के दर्शन हुए, स्वामीजी ने गाया –

माई श्री सहज जोरी प्रकट भई-जू रंग की गौर श्यामघन-दामिनी जैसे।

प्रथम हूंहुती, अबहूँ आगेहूँरही है, न टरी है, तैसे।।

अंग-अंग की उजराई, सुधिराई, चतुराई, सुंदरता ऐसे

श्रीहरिदास के स्वामी श्यामा- कुंजविहारी सम वैसे-वैसे।।

प्रियाप्रीतम मुस्करा रहे थे। गीत समाप्त होते ही प्रियाजी बोलीं- “ललिते!”

स्वामीजी सकपकाये- “भूल हो गई किशोरीजी! आपका मुग्धकारी स्वरूप ही ऐसा है।

“बिहारीजी कहने लगे- “ललिते! तुम्हारी इच्छा पूरी हो, अब हम यहाँ इसी रूप में अवस्थित रहेंगे।” स्वामीजी कुछ विह्वल होते हुए बोले- “प्राणाधार!! आप ऐसे ही. .। निकुंज के बाहर आपकी सेवा कैसे होगी? विष्णु-शिव-इन्द्र आदि की सेवा का तो वैदिक विधान है। “

श्री बाँकेबिहारी जी – श्री बाँकेबिहारी जी का प्रकट होना

बिहारीजी मुस्कराये बोले- “सेवा तो लाड़ प्यार की होगी।” “समझ गया, समझ गया, प्रेम-सिंधु-मराल” -स्वामी जी ने निश्चिंत होकर कहा- “एक प्रार्थना और है, अभी-अभी मेरा ध्यान संसार की व्यवहारिकता की ओर चला गया था।

आप दोनों आप दोनों कैसी बाँकी छवि है? क्या इस अद्भुत रूप सौन्दर्य को जगत की आँखें झेल पायेंगी? आप दोनों एक ही रूप हो जायें। हाँ, एकरूप, जैसे घन-दामिनी । “

प्रिया-प्रियतम मुस्करा दिये। अनिवारे लोचनों से उन्होंने परस्पर कुछ संकेत किया और दोनों एक दूसरे समाहित होकर एकरूप हो गये। दामिनी की आभा सजल जलघर के रोम-रोम में रम गई।

वृन्दावन के नित्यनवल निकुंजों में नित्य रमण करने वाले श्यामा- कुंजबिहारी की युगल छवि स्वामीजी की प्रार्थना पर बाँकेबिहारी के रूप में प्रतिष्ठित गई। संतों, भक्तों और रसिकों का हृदय आनन्द ने नर्तन करने लगा।

“बाँकेबिहारी लाल की जय” के स्वर बारम्बार आवृत्त होकर निधिवन की सीमा को लाँघ दिग-दिगंत में गूंजने लगे।

बिहारीजी के दर्शनों के लिए दूर-पास के भक्तजन आने लगे। विरक्त साधकों को भी श्रीबिहारी के रूप सौन्दर्य ने आकृष्ट किया। वृन्दावन का एकान्त शान्त परिवेश उन्हें अपनी साधना की दृष्टि से अत्यन्त अनुकूल लगा।

वे वृन्दावन की कुंज-निकुंजों में यत्र-तत्र रम गये। स्वामीजी और श्रीबिहारीजी की महिमा जब हरिदासपुर के निवासियों तक पहुँची तो वे स्वामी आशुधीरजी महाराज की अगुवाई में भजन-कीर्तन करते निधिवनराज में आ पहुँचे।

इनमें जगन्नाथजी की पत्नी और उनके तीनों पुत्र श्रीगोपीनाथजी, श्री मेघश्यामजी और श्रीमुरारीदासजी भी थे।

इन्होंने स्वामीजी के चरणस्पर्श किये, बिहारीजी के दर्शनों का सौभाग्य पाया और विठ्ठलविपुल को देखकर गद्गद हो गए- स्वस्थ, सुन्दर, सुडौल, गोरा शरीर, चमकीली आँखें, मुंडित सिर, यमुनाजी की रज में रंगा अंग-अंग, प्रेमरस में भीगे चमकीले नेत्र और करूआ, कंथा, कोपिन की रहनी।

बड़ा मनोरथ था वह वेश और याना। गोपीन वजी, मेघश्यामजी, मुरारीदासजी ने तो उन्हें देखकर संकल्प कर लिया कि हम भी अब निधिवन-वृन्दावन का परित्याग कर अन्यत्र कहीं नहीं जायेंगे और स्वामीजी की अनुमति मिल जाने पर वे तीनों भी अपने भाई विठ्ठलविपुल और माता-पिता के साथ स्वामीजी के शरणागत होकर श्रीबिहारीजी की सेवा में जुट गये।

स्वामी हरिदासजी के लिए यह नितांत सहज था कि वे अपने अव्यक्त निकुंज बिहारी श्यामाश्याम को रसविलासने के साथ ही साथ उनके प्रकट स्वरूप श्रीबांकेबिहारीजी को भी लाड़लड़ाते रहें।

एक स्थान पर की गई उनकी सेवा दूसरे स्थान पर भी व्यक्त हो जाती थी। किन्तु उनके अतिरिक्त यह क्षमता अन्य किसी में नहीं थी।

इसलिए उन्होंने श्रीबिहारीजी महाराज को लाड़-लड़ाने की सेवा श्रीजगन्नाथजी को सौंप दी और जगन्नाथजी के तीनों पुत्रों को भी उनके साथ जोड़ दिया।

निकुंज बिहारी श्यामा-श्याम की सेवा का दायित्व स्वामीजी ने परमविरक्त हृदय और नैष्ठिक ब्रह्मचारी श्रीविठ्ठलविपुलजी को सौंप दिया। स्वामीजी की कृपा से श्रीविठ्ठलविपुलजी का उन्हीं के समान सहचरी स्वरूपहो गया था।

अब वे उन्हीं की तरहप्रिया प्रियतम के अंग-संग रहकर उन्हें रस विलासते थे, उनसे वार्तालाप करते थे और उनके अन्तरंग में उठती अनन्त तरंगों को नित्य नए रंगों से सजाते हुए उनकी लीलाओं को देखा करते थे और गाया करते थे।

श्रीस्वामीजी महाराज ने श्रीबिहारीजी की तीन आरतियों का क्रम निर्धारित किया था-सुबह श्रृंगार आरती, मध्यान्हमें राजभोग-आरती और रात को श्यान-आरती, प्रारम्भ में गोस्वामी जगन्नाथजी ही बिहारीजी महाराज की सम्पूर्ण सेवा किया करते थे।

पहले-पहल बिहारीजी महाराज की सेवा का अनुष्ठान निधिवन में तरु-लता-गुल्मो से निर्मित एक निकुंज भवन में ही प्रारम्भ हुआ था।

सेवा के अवसर पर श्रीस्वामीजी स्वयं उपस्थित रहते थे और वे श्यामाजू की गद्दी के पास बैठकर राग-रागिनियां सुनाते रहते थे तथा गोस्वामी जगन्नाथजी के साथ किन्तु सावधानीपूर्वक श्रीबिहारीजी का श्रृंगार किया करते थे।

सेवा का क्रम ऐसा है कि पहले श्रीकिशोरीजी की गद्दी सेवा होती है। बिहारीजी महाराज के स्वरूप में समाहित उनके रूप की भावना करते हुए उन्हें वस्त्र धारण कराये जाते हैं, चन्द्रिका आदि आभूषणों से उन्हें सज्जित किया जाता है, बाद में श्रीबिहारीजी महाराज का श्रृंगार होता है।

वृन्दावन आने के उपरान्त गोस्वामी जगन्नाथजी ने विरक्तों की-सी करूआ-कंधा-कोपीन वाली रहनी रीति अंगीकार कर ली थी। यहाँ तक कि बिहारीजी की सेवा करते समय भी वे गुदरी ही धारण किए रहते थे। इसी बीच एक रोमांचक अनूठी घटना हुई।

एक दिन गोस्वामी जगन्नाथजी दत्तचित्त होकर प्रियाजी का श्रृंगार करने में संलग्न थे। वे प्रियाजी को वस्त्रधारण कराने के उपरान्त चन्द्रिका उठाने के लिए जैसे ही नीचे झुके कि प्रियाजी ने प्रकट होकर उनकी गुदरी उतारकर दूर रख दी और अपनी चुंदरी उन्हें ओढ़ा दी।

गोस्वामी जगन्नाथजी ने अपने ऊपर चंदरी देखी तो हड़बड़ा गये यह कैसा अपराध हो गया?

उन्होंने ऊपर नजर उठाई तो क्या देखते हैं कि प्रियाजी मुस्करा रही हैं। उन्होंने अपना हाथ जगन्नाथ के सिर पर रखकर कहा- “ऐसे ही रहो” और पुनः प्रियतम के स्वरूप में विलीन हो गई। जगन्नाथजी ने स्वामीजी की ओर देखा।

वे भी मुस्करा रहे थे, बोले-“जैसा प्रियाजू ने कहा है, वैसा ही करो। आज से श्रीबिहारीजी महाराज के सेवा करते समय तुम गूदरी के स्थान पर यह चुंदरी ही ओढ़ोगे। नित्य बिहारिणी की प्रसादी-चूनरी पहिनने से जो अनुराग हृदय में उत्पन्न होगा, वही वस्तुतः उन्हें प्रिय है।

इस प्रसादी चूनर का एक धागा भी जिस किसी के कण्ठका स्पर्श कर लेगा, वहसमस्त रोग-शोक-सन्तायों से मुक्त होकर प्रियालाल की सेवा के उपयुक्त बन जायेगा।

जो भक्तजन श्रीबिहारीजी अथवा श्रीकिशोरीजी के प्रसादी वस्त्र के अपने कंठ का श्रृंगार बनायेंगे-उनकी सारी मनोकामनायें पूर्ण होंगी और उनका मन निश्चिन्त और स्थिर होकर श्रीयुगलकिशोर के चरणों में लगेगा। | अव श्रीबिहारीजी महाराज का श्रृंगार पूरा करके दर्शन खोलो। “

स्वामी हरिदासजी को केवल एक ही अभिलाषा रहती थी कि बिहारी जी की सेवा भाव से, हो लाड़ प्यार से हो, उत्तमोत्तम पदार्थों का उपयोग उनकी सेवा में हो।

सच्चे सन्तों, भक्तों और रसिकों के मन में भी उनकी कृपा से ही ऐसी ही प्रेरणा हुआ करती थी। वे उत्तमोत्तम पदार्थ लाकर बिहारीजी की सेवा के लिए प्रस्तुत करने लगे।

स्वामी जी स्वयं उस काल के सर्वोत्तम भोग लगाया करते थे और उन्हें मारे (नभचर), बन्दर (थलचर) तथा मछली (जलचर) आदि निधिवन और यमुनाजी में निवास करने वाले जानवरों को खिला दिया करते थे।

एक दिन एक भक्त बिहारीजी की सेवा के लिए बड़ा अच्छा और कीमती “चोआ “लाया। उस समय स्वामीजी यमुना पुलिन पर विराजमान थे। उनके भाव-लोक में प्रिया-प्रियतम होली खेल रहे थे।

सहसा प्रियाजी की पिचकारी का रंग चुक गया। स्वामी जी ने बिना आँखें खोले आगन्तक भक्त की ओर हाथ बढ़ाते हुए कहा-“लाओ!” और “चोआ की शीशी लेकर सारी सुगन्ध पुलिन में उडेल दी।

भक्त कुछ न समझा वह उदास होकर खड़ा रहा। सोचता रहा-” कितना कीमती चोआ लाया था, इन्होंने सारा का सारा मिट्टी में मिला दिया, पर रज में गिरने के बाद भी उसकी सुगन्ध वायुमण्डल में क्यों नहीं बिखरी?

क्या चोआ ही खराव था…….?

भक्त इस प्रकार के अनेक तर्क-वितर्कों में उलझा ही था कि स्वामीजी के नेत्र खुले, उन्होंने जगनाथ को बुलाकर कहा-‘ आगुत्तक भक्त को ले जाकर बिहारीजी के दर्शन करा दो।’

गोपाल गोस्वामी जगन्नाथ ने जैसे ही पट खोला तो चोआ की उत्कृष्ट की सुरभि – को यहाँ सर्वत्र व्याप्त देखकर वह हैरान रह गया। दर्शनों के बाद वह लौटकर आया और स्वामीजी के चरणों में लिपटकर रोने लगा।

स्वामीजी ने कहा-“रोओ मत, प्रसन्न होओ।। तुम भाग्यशाली हो जो तुम्हारी सेवा प्रिया- प्रियतम ने स्वीकार की है। “

इसी प्रकार किसी भक्त को पारसमणि मिल गई। पारसमणि जिसके स्पर्श से लोहा भी सोना हो जाता है। वह उसे लेकर स्वामीजी के पास आया और उनके चरणों में रखकर बोला-“यह पारस है, उसमें सम्पन्नता की अनन्त-अनन्त संभावनायें छिपी हैं।

इसके प्रभाव से बिहारीजी की सेवा का क्रम अक्षुण रूप से चलता रहेगा। आप इसे स्वीकार कीजिए और मुझे अपना शिष्य बना लीजिए। “

स्वामीजी पारस में गुथी उसकी आसक्ति को समझ गये, उन्हें उस पर दया आयी, कहने लगे-“शिष्य तो हम तुम्हें बना लेंगे; किन्तु इस पारस पत्थर को पहले यमुनाजी में विसर्जित करके आओ।”

भक्त परेशान हो गया-तर्क-वितर्क का एक अंघड़ उसके भीतर उत्पन्न हो गया था। पारसमणि जैसी अमूल्य और दुर्लभ वस्तु को यमुनाजी में फेंकने को औचित्य वह किसी प्रकार भी युक्ति-संगत नहीं ठहरा पा रहा था।

किन्तु स्वामीजी का शिष्यत्व पाने की उसकी ललक भी चरमोत्कर्ष पर पहुँच गई थी। अन्ततः उसे पारस पत्थर नदी में विसर्जित करके आना पड़ा। किन्तु इससे उसका अन्तर्मन खिन्नता से भर गया। कैसी अद्भुत अमूल्य वस्तु मैंने व्यर्थ गँवा दी।

यह पश्चाताप उसकी चेतना को ही जलाये डाल रहा था। ऐसी स्थिति में वह श्रीहरि की भक्ति का स्पर्श भी कैसे पा सकता था। स्वामीजी ने करुणासिक्त वाणी में कहा-“बहुत पछतावा है उस पत्थर का तो जाकर निकाल लाओ उसे जल में से, उसे तो तुमने किनारे पर ही गिराया है न ?”

भक्त का चेहरा आनन्द से खिल उठा, वह भाग उठा नदी की ओर वहाँ पहुँचकर उसने जैसे ही जल में हाथ डाला तो वह हैरान हो गया वह एक पत्थर पाकर बौरा गया था, यहाँ वैसे अनन्त-अनन्त पत्थर बिखरे पड़े थे।

उसकी आँख खुल गई वह जैसे ही चलने को मुड़ा तो उसने देखा कि स्वामीजी वहाँ खड़े हैं वे बोले-“इन मणियों में से अपनी मणि पहचान कर ले लो।

भक्त मूढ़ बना खड़ा था। स्वामीजी ने उसे समझाया-“मौत की आँधी आने की धन-सम्पदा की बात आने की बात तो दूर यह तुम्हारा शरीर भी तुम्हारा नहीं रहेगा।

तुम्हारी सच्ची सम्पत्ति तो श्रीहरि हैं वे जन्म से पहले भी तुम्हारे साथ थे, अब भी तुम्हारे साथ हैं और जब कोई भी तुम्हें अपना कहने को तैयार नहीं होगा तब भी वे तुम्हारे साथ रहेंगे..

स्वामीजी की कृपा से जो विवेक भक्त के हृदय में उदित हुआ उसके हृदय का सारा मैल धुल गया। उसका अन्तःकरण एकदम निर्मल हो गया। स्वामीजी ने उसे दीक्षा देकर भजन के मार्ग पर अग्रसर कर दिया। वस्तुतः श्रीस्वामी हरिदासजी के साथ ऐसे अनेक नानाविध प्रसंग जिन्हें रसिक भक्त रीझ रीझकर गाते हैं।

स्वामी श्रीहरिदासजी के श्यामा- कुंजबिहारीजी की रस-विलासमयी लीलाओं का मुख्य वाहक है संगीत। स्वामीजी के अद्भुत संगीत की गति पर यह विलास रस थिरकता है, क्रीड़ा करता है। “श्रीहरिदास के स्वामी श्यामाकुंज बिहारी संगीतसंगी हैं।”

प्रिया-प्रियतम रुचि के प्रकाश हैं। उनके रस विलासन में आलौकिक राग रागिनियां उत्पन्न होती रहती हैं। दरअसल नित्य बिहार का मुख्य आधार ही संगीत है। ललितावतार स्वामीहरिदासजी निकुंजलीला में “हरिदासी अथवा ललिता” हैं जो संगीत की अधिष्ठात्री हैं। राजे महाराजे जो स्वामीजी तो स्वामीजी के दर्शनों की चाह लेकर उनके दर्शनों को खड़े रहते थे। हरिदास जी राजाओं शाहों से ऊपर थे।

लोक में” येजू बाबरा ” और ‘तानसेन’ जैसे ख्यातनामा संगीतज्ञ स्वामीजी के शिष्य माने जाते हैं। तानसेन बादशाह अकबर के नवरत्नों में संगीतज्ञों का प्रतिनिधित्व करते थे।

एक दिन बादशाह अकबर ने तानसेन के गायन पर रीझकर कहदिया-‘तानसेन, तुम्हारे जैसा संगीतज्ञ आज इस दुनियां में कोई दूसरा नहीं है।’ तानसेन ने कान पकड़ लिए बोले-“खुदा के लिए ऐसा मत कहिए।

मेरे गुरु स्वामी हरिदासजी संगीत के महासागर हैं उनके सामने मेरी औकात तो एक बूँद के समान भी नहीं है।’

बादशाहने कहा-“उन्हें एक दिन हमारे दरबार में आने की दावत दो। हम उनका संगीत सुनना चाहते हैं”

“वे वृन्दावन छोड़कर कहीं नहीं जाते हैं।” तानसेन ने समझाया।

अकबर- “हम वहीं जाकर उनका दीदार करेंगे और संगीत सुनेंगे।” तानसेन-“बादशाही तामझाम के साथ वहाँ पर प्रवेश करना असम्भव है, फकीर अपनी मौज का शंहशाह होता है, उसे किसी भी ताकत से कोई भी काम करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।’

“तो फिर?” अकबर ने निराश होते हुए कहा।

तानसेन ने कहा- “एक उपाय है, आप मेरे खवास के रूप में तानपुरा उठाकर २ चलें तो शायद सफलता मिल जाये।”

बादशाह राजी हो गये। निधिवन निकुंज के द्वार पर बादशाह सलामत को खड़ा करके तानसेन ने स्वामीजी के पास पहुँचकर उनको प्रणाम किया।

स्वामीजी तानसेन की सारी लीला पहले ही समझ गये थे। उन्होंने बादशाहको अन्दर आने की अनुमति दी। ब्याज से उन्हें स्वामीजी का संगीत सुनने का मौका भी मिला। उसे सुनकर बादशाह कृतकृत्य हो गये।

उन्होंने कहा-“स्वामीजी! कुछ सेवा बताइये”स्वामीजी हँसे बोले-“सेवा करोगे?”

बादशाहने प्रसन्न होते हुए कहा-“जरूर करूँगा, खुशी के साथ ” स्वामीजी ने अपने एक शिष्य को बुलाया और बोले- “इन्हें बिहार घाट की उस सीढ़ी को दिखा दो जिसका एक कोना क्षतिग्रस्त हो गया है ताकि ये उसकी मरम्मत करवा दें।”

स्वामीजी ने कृपा करके अकबर को कुछ समय के लिए दिव्य दृष्टि भी दे दी जिससे वृन्दावन के नित्य स्वरूप को निहारने का सौभाग्य किसी-किसी सिद्ध रसिक सन्त को ही मिलता है। बिहार घाट पर जाकर देखा तो चकित रह गया।

सर्वत्र रंग बिखरा प्रकाश विकीर्ण करने वाले विविध प्रकार के हीरा जवाहरात, मणि-माणिक्य जुड़े हुए थे उन्होंने ऊपर से नीचे तक घाट के दर्शन किए तो उनकी दृष्टि सीढ़ियों के टूटे हुए कोने पर पड़ी। वहाँ जो रत्न जुड़े हुए थे उस किस्म का एक भी रत्न अकबर के खजाने में न था।

वह लौट कर स्वामीजी के पास आ गये और उनके चरणों में गिरकर, अपने ऐश्वर्य से दर्पित होने की क्षमा याचना की।

इन सब प्रसंगों के बाद एक बार फिर श्रीबाँकेबिहारीजी महाराज के सेवाक्रम पर आते हैं। गोस्वामी जगन्नाथजी के तीन पुत्रों में से श्रीगोपीनाथजी श्रृंगार सेवाके, श्रीमेघश्यामजी राजभोग सेवा के और श्रीमुरारीदासजी शयनभोग सेवा के अधिकारी थे।

इनमें राजभोग सेवाधिकाररी श्री मेघ श्यामजी के चार पुत्रों में से दूसरे पुत्र श्री बिहारीदास जी थे इन्होंने श्रीस्वामीहरिदासजी की कृपा से स्वामी विठ्ठलविपुलजी से दीक्षा लेकर आजन्म करुआ-कोपीन की रहनी रीति स्वीकार करके स्वामी हरिदासजी और बिहारी-बिहारिन की प्रशस्ति के गीत गाये।

स्वामी बिहारिनदास जी सतत स्वामी हरिदासजी के साथ ही रहते थे। उन्होंने स्वामीजी के प्रियलाल की लीलाओं में नित्य समुपस्थित स्वरूप को उजागर किया, उनकी

रसोपासना की विशद व्याख्या की और साथ ही साथ निकुंज बिहारी श्यामाश्याम की रह केलियों के बड़े रसीले-रंगीले दिव्य-भव्य चित्र प्रस्तुत किये। उनकी प्रशस्ति में भक्त मालकर ने उन्हें अमृत बाँटने वाला बताया है-“दासबिहारिनअमृतदा। “स्वामीहरिदासजी की विरक्त शिष्य परम्परा में इन्हें ‘गुरुदेव के नाम से स्मरण किया जाता है और इन्हें ही अपनी परम्परा का आद्याचार्य माना जाता है।

श्री गोपीनाथ जी का वंश दो पीढ़ी बाद उच्छिन्न हो गया और श्रृंगार सेवा का अधिकार भी गोस्वामी मेघश्यामजी और गोस्वामी मुरारीदासजी के वंशजों पर आ गया। पर्यायक्रम से एक-एक वर्ष तक दोनों के वंशज श्रृंगार सेवा का दायित्व सम्भालने लगे।

सेवा का यही क्रम आज भी चालू है। प्राकट्य के बाद कई वर्षों तक श्रीविहारजी महाराज की सेवा का क्रम निधिवन में ही चलता रहा। कालान्तर में आवश्यकता के अनुसार उन्हें संवत् 1826 के बाद यहाँ स्थानान्तरित कर दिया गया।

जहाँ वे आज विराजमान हैं। धीरे-धीरे एक भव्य विशाल मन्दिर की आवश्यकता सम्पूर्ण गोस्वामी समाज को अनुभव होले लगा। इसके लिए गोस्वामीगण अपने शिष्य सेवकों से मिलने वाले धन का शनैः शनैः संग्रह करते रहे।

कई वर्षों बाद पर्याप्त धन इकट्ठा हो जाने के बाद मन्दिर निर्माण का कार्य आरम्भ हुआ। इसके बनाने में सम्पूर्ण गोस्वामी समाज ने तन-मन-धन से सहयोग किया। कहते हैं कि मन्दिर का नक्शा और मन्दिर में सर्वत्र उकेरी गई लता और गुल्मों की डिजाइनें भी गोस्वामी समाज ने ही तैयार की थी।

इस प्रकार कठोर परिश्रम और लम्बे धैय के उपरान्त यह वर्तमान मन्दिर 1921 वि०-(सन् 1864) में बनकर तैयार हुआ। उस समय इसके निर्माण पर सत्तर हजार रुपये की लागत आई।

Shri bankebihari ji ki katha

आजकल श्रीबिहारीजी महाराज के दर्शन आप इसी मन्दिर में करते हैं। बिहारीजी को उत्सव बहुत प्रिय है यहाँ नित्योत्सव, नित्य मंगल का क्रम चलता ही रहता है। फिर भी यहाँ आयोजित होने वाले उत्सवों में

1) चैत्र शुक्ला प्रतिपदा (नवसंवतसर) पर स्वामी आशुधीरजी महाराज का उत्सव

(2) अक्षय तृतीया पर चरण दर्शन।

(3) गुरुपूर्णिमा का उत्सव ।

(4) हरियाली तीज पर हिंडोले में दर्शन।

(5) जन्माष्टमी पर मंगला आरती के दर्शन और फिर नन्दोत्सव।

(6) राधाष्टमी पर स्वामी श्रीहरिदासजी का प्राकट्योत्सव ।

7) शरदपूर्णिमा पर मुकुटमुरली धारण ।

(8) दीपावली पर दीपदर्शन।

(9) बिहार पंचमी पर श्रीबिहारीजी महाराज का प्राकट्योत्सव ।

(10) रंगीली होली और डोलोत्सव

-मुख्य हैं। इनके अतिरिक्त ग्रीष्म ऋतु में प्रतिदिन अक्सर फूलों के भव्य बंगले बनते हैं।

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