माँ का प्राकट्य

माँ का प्राकट्य

माँ की महिमा तो जितनी गाए उतनी कम है हममें इतनी शक्ति नहीं की हम उसकी लीला का गायन कर सके। माँ का प्राकट्य के बारे में जो भी यहाँ बताया जा रहा है यह सब उसकी शक्ति द्वारा ही जो असल में हुआ है वही लीला के बारे में बताया गया है क्यूंकि हममे इतनी शक्ति नहीं खुद से कुछ लिखें और बोले हमारे तो स्वांस भी अपने नहीं हमारा शरीर अपना नहीं

तो हम फिर किसकी शक्ति से बोलते है ? किसकी शक्ति से लिखते है ? किसकी शक्ति से चलते है ?

उस आदि शक्ति की शक्ति से हम बोलते चलते और लिखते है वो शक्ति जो हम सब में विध्य्मान है 

माँ के नवरात्रे 4 अक्तूबर 2005 को माँ के नवरात्रे शुरू हुए। दरबार में पहली बार अखंड ज्योत जगाई गई। माँ की ज्योत जगाई थी तो माँ का कीर्तन भी होता था।
रोजाना 3 से 5 बजे तक दोपहर को माँ का आनंद से भरपूर मस्ती भरा कीर्तन होता था। इतना आनंद आता की सभी माँ के रंग में रंग जाते थे कई सांगतो को तो  माँ ने अपने होने का एहसास भी दिला दिया था की में तो यही पर विराजमान हूँ- आदि शक्ति जो है – एहसास तो दिलाना ही था । वाह जी वाह ! क्या अदभुत नजारा था जो कभी देखा न था कभी सुना न था 

जब पांचवा नवरात्रा आया

नवरात्रो के नज़ारे में माँ की अनूठी मस्ती का संगते आनंद ले रही थी कोई माँ की महिमा गा रहा था कोई सेवा कर रहा था। जब पांचवा नवरात्रा आया 8 अक्टूबर सुबह के 10 बजे थे। माँ का भवन सजा हुआ था माँ की मूर्ति के पीछे लाल रंग की चुन्निया सजाई हुई थी। चौंकी के ऊपर लाल रंग के आसन पर माँ की मूर्ती विराजमान थी अखंड ज्योत जग रही थी फिर एक दम से भूचाल आया और सभी डर गए परन्तु माँ की कृपा से सब ठीक रहा

जो सांगत माथा टेकने आई थी उन्होंने माँ के ऊँचे स्वर में जयकारे लगाए – जयकारा शेरावाली दा बोल सांचे दरबार की जय

जय हो – जब सातवां नवरात्रा आया – तब देखो ! कैसे माँ ने एक घर को अपना धाम बना लिया

10 अक्टूबर 2005 ,सातवां नवरात्रा सुबह के 8:15 बजे थे दुर्गा स्तुति हो रही थी। अगले दिन(अष्टमी) के लिए भंडारे की तैयारी चल रही थी। सभी माँ की सेवा में व्यस्त थे क़ि एक अद्भुत नज़ारा देखने को मिला क़ि माँ की अखंड ज्योत में से ज्योतियाँ प्रकट होके खिल रही है धीरे धीरे ज्योतियाँ बढ़ती जा रही है – जयकारा ज्योतावाली दा बोल सांचे दरबार की जय !

ऐसा अदभुत नज़ारा जो पहले कभी न सुना था न देखा था समझ में नहीं आ रहा था कि हम क्या और कैसे और किसे देख रहे है
ज्योतियो का प्रकाश इतना था जो भी दर्शन करता निहाल हो जाता और मस्ती में झूम उठता

इतना अदभुत नज़ारा था कि समझ नहीं आ रहा था विश्वास नहीं हो पा रहा था फिर हमने एक दो संगतो को फ़ोन किया और जब वो संगते आई और इस अदभुत नज़ारे को देखा तो निहाल हो गई। जब उन्होंने माँ के ज्योतों के दर्शन किये तो वो माँ के ऊँचे स्वर में जयकारे लगाने लगी – जयकारा ज्योतावाली दा -बोल साँचे दरबार की जय – और माँ का कीर्तन शुरू कर दिया। फिर उन्होंने(जो संगते) आई थी उन्होंने बताया

अरे ! यह तो माँ के साक्षात् दर्शन है – जो मांगना है मांग लो-माँ आपके घर में ज्योति सवरूप में आई है

बस ! फिर क्या था जब हमे पता चला की ज्योति रूप में मैया हमारे घर आई है तो हमारे आनंद की सीमा न रही। हमारे पाँव ज़मीन पे नहीं लग रहे थे। ऐसा लग रहा था की हमने दुनिया की सबसे बड़ी दौलत को पा लिया हो। जो संगते आई हुई थी उन्होंने अपने रिश्तेदारों को फ़ोन करके दर्शनों के लिए बुला लिया।

फिर आगे से आगे संगतो ने एक दूसरे को बताना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे सारे शहर में यह बात पहुँच गई कि माँ की ज्योतियाँ प्रकट हुई है और दर्शन करने वालो की भीड़ लग गई। पता ही ना चला कहाँ कहाँ से प्रेमीजन दर्शन करने के लिए आ रहे थे संगते दर्शन के लिए आ रही थी साथ-साथ माँ का कीर्तन चल रहा था। रात तक संगते दर्शन के लिए आती रही और माँ से झोलियाँ भरती रही।

अष्टमी का दिन आया। सुबह कंजका पूजन किया गया। 11 से 1 बजे तक माँ का कीर्तन हुआ उसके बाद भण्डारा हुआ माँ ने भंडारे में इतनी रहमत बरसाई सारी सांगत के खाने के बाद भी इतना बचा की पास में बाजार था पूरे बाज़ार में माँ का भण्डारा बांटा गया। जयकारा शेरांवाली दा-बोल साँचे दरबार की जय।

फिर एक दो महीने बीते और हमे वही एहसास जो नवरात्रो में हुआ था प्रतिदिन होता। जिस स्थान पर माँ की ज्योत जगाई थी वहां पर रोज़ माँ की महिमा की बाते करके आनंद आता।

दिसम्बर आया और हमे एक दिन रात को घण्टीओ और छन छन की आवाज़े सुनाई दी। एक दिन – दो दिन……..और एक महीना बीत गया घण्टीओ और छन छन की आवाज़े रोज़ सुनाई देती। वो भी तक़रीबन रात 12 बजे के बाद 5 से 10 मिनट के लिए सुनाई देती थी।

फिर एक दिन घर के मुख्य भक्तानी जी बीमार हो गए उनसे पलंग से उठना मुश्किल हो गया। डॉक्टर को बुलाया और दिखाया उन्होंने बताया ठीक है। फिर भी हमने कई डॉक्टरों को दिखाया और इलाज करवाया परन्तु कोई फर्क नहीं पड़ा।

एक दिन उनकी सहेली उनको देखने आई और कहने लगी चल आज तेरे को एक देवा जी के पास लेके चलती हूँ उनसे तेरी सेहत के बारे में पूछते है…..।


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