Shri Ram Stuti -श्री रामचन्द्र कृपालु भजुमन- श्री राम स्तुति

Shri Ram Stuti ( श्री राम स्तुति)

“राम स्तुति” एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ होता है “राम जी की प्रशंसा” या “राम जी की स्तुति” करना । इसका मतलब होता है किसी भी रूप में भगवान राम की महिमा, गुण, और दिव्यता की प्रशंसा करना या उन्हें श्रद्धापूर्वक याद करके उनका ध्यान करना।

Shri Ram Stuti ( श्री राम स्तुति)

राम जी की स्तुति अक्सर विभिन्न संस्कृत ग्रंथों, कविताओं, और धार्मिक साहित्य में पाई जाती है। इनमें भगवान श्री राम की लीलाएं, उनके दिव्य गुण, और उनकी प्रेरणादायक कथाएं होती हैं।

ये स्तुतियां भक्ति और श्रद्धा की भावना को उत्तेजित करती हैं और श्रद्धालुओं का भगवान श्री राम के प्रति भक्ति बढाने का प्रयास करती हैं।

भगवान राम की काव्य रूप में महिमा को व्यक्त करने वाली श्रीरामचरितमानस, रामायण, और अन्य संस्कृत ग्रंथों में श्री राम जी की स्तुतियां मिलती हैं।

राम स्तुति, भगवान श्रीराम की महिमा और दिव्यता को व्यक्त करती है जो भक्तिभाव से भरी होती है। इस स्तुति में श्रीराम के गुण, लीलाएं, और उनकी दिव्य प्राकृति की महत्ता का स्मरण किया जाता है।

राम स्तुति का प्रारंभ होता है श्रीरामचन्द्र के कृपालु रूप की महिमा के साथ, जिससे भक्त कहता है कि वह श्रीराम की भक्ति में रत है और उनके चरणों में अपना मन लगा हुआ है। इसके बाद, स्तुति में भगवान के रूप, लक्षण, और उनकी दिव्य लीलाएँ वर्णित हैं।

राम स्तुति एक भक्तिपूर्ण रूप से रची गई है जो भगवान श्रीराम के आदर्श चरित्र, धर्म, और प्रेम को गाने का एक उत्कृष्ट उदाहरण प्रदान करती है। इसमें रमणीय संस्कृत भाषा का प्रयोग हुआ है जो भक्ति और प्रशंसा की भावना को सुंदरता के साथ व्यक्त करती है।

Shri Ram Stuti ( श्री राम स्तुति)

॥दोहा॥

श्री रामचन्द्र कृपालु भजुमन हरण भवभय दारुणं ।

नव कंज लोचन कंज मुख कर कंज पद कंजारुणं ॥१॥

कन्दर्प अगणित अमित छवि नव नील नीरद सुन्दरं ।

पटपीत मानहुँ तडित रुचि शुचि नोमि जनक सुतावरं ॥२॥

भजु दीनबन्धु दिनेश दानव दैत्य वंश निकन्दनं ।

रघुनन्द आनन्द कन्द कोशल चन्द दशरथ नन्दनं ॥३॥

शिर मुकुट कुंडल तिलक चारु उदारु अङ्ग विभूषणं ।

आजानु भुज शर चाप धर संग्राम जित खरदूषणं ॥४॥

इति वदति तुलसीदास शंकर शेष मुनि मन रंजनं ।

मम् हृदय कंज निवास कुरु कामादि खलदल गंजनं ॥५॥

मन जाहि राच्यो मिलहि सो वर सहज सुन्दर सांवरो ।

करुणा निधान सुजान शील सेह जानत रावरो ॥६॥

एहि भांति गौरी असीस सुन सिय सहित हिय हरषित अली।

तुलसी भवानिहि पूजी पुनि-पुनि मुदित मन मन्दिर चली ॥७॥

॥सोरठा ॥

जानी गौरी अनुकूल सिय हिय हरषु न जाइ कहि ।

मंजुल मंगल मूल वाम अङ्ग फरकन लगे।

रचयिता: गोस्वामी तुलसीदास ll

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